भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 811 में से

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पृष्ठ 94
७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

संप्रालब्ध्वा निजं वृत्तं स्वदूतं श्रोतुमद्यताः । ताम्पूज्य कथयामास चंतं वृत्तं तु योगिनी ॥१०२॥
हेमानाम्र्ना सुता विश्वकर्मणः सा महेश्वरम् । नृत्त्येन तोषयामास ददौ तस्यै पुरं महत् ॥१०३॥
अत्र स्थित्वा चिरं काल यदा गंतुं समुद्यता । मां मां प्राहात्र रामस्य प्रतीक्षां कुरु गच्छति ॥१०४॥
सभार्य्यश्चाथ रामस्य कृत्वा पूजनमुत्तमम् । इत्युक्त्वा सा दिवं याता राघव गम्यते मया ॥१०५॥
स्वयंप्रभेति नाम्नाऽहं हेमायाः परिचारिका। अधुना बत युष्माकं साहाय्यं किं करोम्यहम् ॥१०६॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मत्वा स्वोयदिनाव्ययम् । तामुचुर्वानराः सर्वे नस्त्वं कुरु गुहाद्बहिः ॥१०७॥
इत्युक्ता सा व्यनैषीत् तैः सहैव ययौ बहिः । तद्विलाच्छादितैयायैनयैर्नावर्तनान्मुदा । १०८॥
न ज्ञातं च तया केन मार्गेण च बहिः कृतम् । साऽपि गत्वा पूज्य रामं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥१०९॥
ततस्ते वानरा ज्ञात्वा गुहाद्वा स्वदिनाव्ययम् । विषण्णाः सागरं दृष्ट्वा तस्थूः प्रायोपवेशने ॥११०॥
जटायोः कीर्तनं चक्रू गमकार्य्यं कृतं पुरा । तच्छ्रुत्वाऽथ म सपातिः तांन्दंत गः समुद्यतः ॥१११॥
तेभ्यः श्रुत्वा मुनिं वोचेद्दर्शनार्थमं जलोत्थित् तेषां श्रुत्वा पृथङ्कन मोतातून न्यवेदयत् । ११२॥
शतराजनमध्ये ऽथैलंकायां वर्ततेऽधुना । अशोकवनिकायां तु न.र्शाऽलंब तां प्रपश्यथ । ११३॥
अह पक्षविहीन ऽस्मि मया गन्तुं न शक्यते गृध्रत्वाद्दूरदृष्ट्वाऽहं सीता म' दृश्यते गिरौ ॥११४।
भ्रात्रा जटायुषा पूर्वमुड्डीयाहं बलाद्रविम् । प्रष्टुकामस्तदा तप्तश्भानो बंधुमथा मखे ॥११५॥
पक्षभ्यां भस्मसाञ्जातो मे पक्षी पतितावुभौ । जटायुः स मपक्षश्च गतो देशान्तरं पुनः ॥११६॥
अहं तदा वसन्हसँश्चन्द्रशर्माणमुत्तमम् । मुनिं नत्वा तदा तस्मै निजवृत्तं निवेदितम् । ११७।

दी ॥ १०१ ॥ उसके वृत्तान्तका सुनकर अभिप्रायमे वानरोंने कहा— अपना वृत्तान्त सुनाओ, तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है? यह वातिका उन सबका सम्मान करके कहने लगी—॥ १०२ ॥ विश्वकर्माकी हेमा-नामक प्रसिद्ध एक कन्या थी। उसने जब महादेवजीको तृप्तिकरके प्रसन्न किया, तब उन्होंने उसको यह बड़ा भारी नगर दिया ॥ १०३ ॥ वहां बहुत कालतक निवास करके जब वह जाने लगी, तब उसने मुझको कहा कि यहाँ बहुत कालतक निवास करती हुई तुम रामके आगमनकी प्रतीक्षा करो । १०४ ॥ उन रामका उत्तम प्रकारसे पूजन करके बाद तुम भी चले आना, इतना कहकर वह चली गयी। इसी कारण अब मैं भी रामके पास जाना चाहती हूँ ॥ १०५ ॥ तथा हेमाकी मैं स्वयंप्रभा नामकी दासी हूँ। अब आप लोग यह कहे कि मैं आप लोगोंका कौनसा सहायता करूँ ॥ १०६ ॥ उसको इस बातको सुन तथा बहुत दिन व्यय अर्थात हुआ देखकर वे सब उसी बोले कि हमको इस बिलसे बाहर कर दो ॥ १०७ ॥ यह सुनकर उसने उन सबको अथवा अपना आंख मून्दने किए कहा। उसो अवसर वानरोंका यह नहीं मालूम हुआ पाय कि उसने किस प्रकार किस मार्गमें बाहर कर दिया। वह भी रामके पास चली गयी तथा उनका पूजा करके स्वर्ग सिधारी ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ उस बिलसे बाहर अपने अत्यधिक दिनोंका व्यय देख उदाम हो समुद्रके किनारे गये और अनशन करके बैठ गये ॥ ११० ॥ बानरोंका इसप्रकार शोक देख प्रायोपवेशके दरम्यान जटायुका चरित्र चल पढा। वहा रहनेवाला संपाती जो उनका चचेरा भाई (पितृव्य-पुत्र) था, वह उनके मुखसे रामके कार्यके लिये जटायुका मरण तथा प्रशंसा सुनकर भाई संपाती, रूपान्तरित होकर समुद्रतटपर गया। पश्चात् उन वनेचरोंका वृत्तान्त सुनकर अपकार्य तथा समाचार कह सुनाया और वह ॥ १११ ॥ ११२ । यहाॅसे समुद्रको पार करके सौ योजनपर लङ्कामें तुम उन्हें देख सकते हो । ११३ । मैं पंख-रहित हूँ। इस कारण वहाँतक नहीं जा सकता, गृध्रकी दृष्टि तेज होती है। अतएव मैं सौ क्या पर्वतपर बैठी हुई लङ्कामें यहाँसे देख रहा हूँ ॥ ११४ ॥ मेरे पंख न होनेका कारण यह है कि मैं एक बार अपने बलके दर्पसे भाई जटायुके साथ उड़कर सूर्यका स्पर्श करनेके लिए आकाशमें उड़ा। रश्मि सूर्यका प्रभाव जटायु जलने लगा। तब मैंने अपनी पांखोंसे ढककर उसकी रक्षा की। जिससे कि मेरे दोनों पांख भस्म हो गयीं और मैं तथा जटायु दोनों उसरस गिर पड़े, जटायु उस ओर सपक्षा था। उससमय दुःखीने मैंने चन्द्रशर्मा नामक मुनिके

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