भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९


तदा मां स मुनिः प्राह यदा त्वं वानरोत्तमान् । सीताशुद्धिं कथयसि तदा पक्षौ भविष्यतः ॥ १२८ ॥
पश्यतां निर्गतौ पक्षौ कोमलौ मां क्षणादिह । यदा नीता रावणेन पुरा सीता विहायसा ॥ १२९ ॥
मत्पुत्रेण तदा दृष्टा कथितं चापि मां तदा धिक्कृतः स मया क्रोधान्मा त्वया न विमोचिता ॥ १३० ॥
तदागम्य गतः क्रोधादद्यापि न समागतः । इत्युक्त्वा तान् कपीन् पृष्ट्वा स भवादिगतेस्तदा ॥ १३१ ॥
अथ ते वानराः सर्वं प्रोचुः स्वं स्वं बलं तदा । न कोऽपि गमने शक्तः शतयोजनसागरे ॥ १३२ ॥
तदा स जांबवान् वृद्धः स्तुत्वा तं मारुतिं मुहुः । जन्मकर्मादि संश्राव्य लङ्कां गंतुं दिदेश तम् ॥ १३३ ॥
सोऽपि श्रुत्वा समुद्योगं चकाराथ पवनसुतः । निजभंगद्भूमिसंगतं कृत्वा सस्मार राघवम् ॥ १३४ ॥
एवं गिरीन्द्रे प्रोक्तं किष्किन्धाविषये कृतम् । यत्नि रावरेणेशं पुरा पापप्रणाशनम् ॥ १३५ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( हनुमान्का लंकामें जाकर सीताका पता लगाना और लंका जलाना )

श्रीशिव उवाच

अथ उड्डीय हनुमान् ययावाकाशवर्त्मना । तद्दृष्ट्वा नभले ज्ञातुं सुरसां नागमातरम् ॥ १ ॥
प्रेषयामासुस्स्वर्गाः सा शीघ्रं तत्पुरो ययौ । तदा सा मारुतिं प्राह विश त्वं वदनं मम ॥ २ ॥
स प्राह रघुवीरस्य कार्यं कृत्वा विशाम्यहम् । दृष्ट्वा तस्यास्तु निर्बन्धं व्यवर्धत तदा कपिः ॥ ३ ॥
विवर्धितं तथाऽप्यास्यं तदा सूक्ष्मो बभूव ह । अङ्गुष्ठमात्रस्तन्मया स वक्त्रे गत्वा विनिर्गतः ॥ ४ ॥


पास जाकर प्रणाम किया और अपना वृत्तांत उन्हें सुनाया । १२५-१२७॥ तब मुनिने कहा कि जब तुम वानरोंको सीताकी खबर सुनाओगे । उसी समय तुम्हारे पांख पुनः जम जायेंगे। १२८। देखो, मेरे शरीर-से ये कोमल पांखे क्षणभरमें निकल आयीं उस समय जब रावण सीताको आकाशमार्गसे ले जा रहा था ॥ १२९॥ उसी समय मेरे पुत्रने उनका देखा था और मुझसे कहा। तब मैंने उसका बहुत धिक्कारा और कहा--अरे दुष्ट ! तूने सीताको छुड़ाया क्यों नहीं ? १३०॥ तब वह कुपित होकर मेरे पाससे चला गया और आजतक नहीं लौटा। इतना कह तथा वानरसे पूछकर संपाती भी वहांसे चला गया ॥ १३१ ॥ तब वानरलोग परस्पर एक दूसरेसे अपना-अपना बल पूछा तो पता लगा कि सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघनेके लिये कोई समर्थ नहीं है । १३२ । तब वृद्ध जाम्बवान्ने हनुमान्को बारंबार प्रशंसा की। उनका जन्म तथा बल कह सुनाया और उन्हें लङ्का जानेकी आज्ञा दिया ॥ १३३॥ हनुमान्जी भी जाम्बवान्के वचन सुन तथा अपना पुरुषार्थ स्मरण करके पर्वतपर चढ़कर कूदनेको उद्यत हुए । अपने भारसे उन्होंने पर्वतको जमीनपर धसा दिया और रामका स्मरण करने लगे ॥ १३४ ॥ हे गिरिजेन्द्र, इस प्रकार पहिले किया हुआ रामचंद्रका किष्किन्धाचरित्र मैंने तुमको सुना दिया। जो कि श्रवणमात्रसे पापोंका नाश कर देता है ॥ १३५ ॥ इति वाशत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रे भाषाटीकायामष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

शिवजी बोले--तदनन्तर हनुमान् उड़कर आकाशमार्गसे लंकाको चले यह देखकर उनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये देवताओंने नागोंकी माता सुरसाको भेजा। वह शीघ्र मार्गमें हनुमान्जीके सामने आकर खड़ी हो गयी और मुख फाड़कर हनुमान्से कहने लगी कि तू आकर मेरे मुखमें प्रवेश कर मैं तुझे खाऊँगी ॥ १॥ २॥ हनुमान्ने उत्तर दिया कि मैं श्रीरामका कार्य संपादन करके फिर आकर तुम्हारे मुखमें प्रवेश करूँगा। परन्तु उसका अधिक आग्रह देखकर कपिने अपना शरीर बढ़ाया ॥ ३ ॥ यह देखकर सुरस ने भी अपनी काया और अधिक बढ़ायी । तब हनुमान् अंगुष्ठमात्रका सूक्ष्म रूप धरके उसके मुखमें प्रविष्ट होकर