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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

संप्रालब्ध्वा निजं वृत्तं स्वदूतं श्रोतुमद्यताः । ताम्पूज्य कथयामास चंतं वृत्तं तु योगिनी ॥१०२॥
हेमानाम्र्ना सुता विश्वकर्मणः सा महेश्वरम् । नृत्त्येन तोषयामास ददौ तस्यै पुरं महत् ॥१०३॥
अत्र स्थित्वा चिरं काल यदा गंतुं समुद्यता । मां मां प्राहात्र रामस्य प्रतीक्षां कुरु गच्छति ॥१०४॥
सभार्य्यश्चाथ रामस्य कृत्वा पूजनमुत्तमम् । इत्युक्त्वा सा दिवं याता राघव गम्यते मया ॥१०५॥
स्वयंप्रभेति नाम्नाऽहं हेमायाः परिचारिका। अधुना बत युष्माकं साहाय्यं किं करोम्यहम् ॥१०६॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मत्वा स्वोयदिनाव्ययम् । तामुचुर्वानराः सर्वे नस्त्वं कुरु गुहाद्बहिः ॥१०७॥
इत्युक्ता सा व्यनैषीत् तैः सहैव ययौ बहिः । तद्विलाच्छादितैयायैनयैर्नावर्तनान्मुदा । १०८॥
न ज्ञातं च तया केन मार्गेण च बहिः कृतम् । साऽपि गत्वा पूज्य रामं देहं त्यक्त्वा दिवं ययौ ॥१०९॥
ततस्ते वानरा ज्ञात्वा गुहाद्वा स्वदिनाव्ययम् । विषण्णाः सागरं दृष्ट्वा तस्थूः प्रायोपवेशने ॥११०॥
जटायोः कीर्तनं चक्रू गमकार्य्यं कृतं पुरा । तच्छ्रुत्वाऽथ म सपातिः तांन्दंत गः समुद्यतः ॥१११॥
तेभ्यः श्रुत्वा मुनिं वोचेद्दर्शनार्थमं जलोत्थित् तेषां श्रुत्वा पृथङ्कन मोतातून न्यवेदयत् । ११२॥
शतराजनमध्ये ऽथैलंकायां वर्ततेऽधुना । अशोकवनिकायां तु न.र्शाऽलंब तां प्रपश्यथ । ११३॥
अह पक्षविहीन ऽस्मि मया गन्तुं न शक्यते गृध्रत्वाद्दूरदृष्ट्वाऽहं सीता म' दृश्यते गिरौ ॥११४।
भ्रात्रा जटायुषा पूर्वमुड्डीयाहं बलाद्रविम् । प्रष्टुकामस्तदा तप्तश्भानो बंधुमथा मखे ॥११५॥
पक्षभ्यां भस्मसाञ्जातो मे पक्षी पतितावुभौ । जटायुः स मपक्षश्च गतो देशान्तरं पुनः ॥११६॥
अहं तदा वसन्हसँश्चन्द्रशर्माणमुत्तमम् । मुनिं नत्वा तदा तस्मै निजवृत्तं निवेदितम् । ११७।

दी ॥ १०१ ॥ उसके वृत्तान्तका सुनकर अभिप्रायमे वानरोंने कहा— अपना वृत्तान्त सुनाओ, तुम कौन हो और तुम्हारा क्या नाम है? यह वातिका उन सबका सम्मान करके कहने लगी—॥ १०२ ॥ विश्वकर्माकी हेमा-नामक प्रसिद्ध एक कन्या थी। उसने जब महादेवजीको तृप्तिकरके प्रसन्न किया, तब उन्होंने उसको यह बड़ा भारी नगर दिया ॥ १०३ ॥ वहां बहुत कालतक निवास करके जब वह जाने लगी, तब उसने मुझको कहा कि यहाँ बहुत कालतक निवास करती हुई तुम रामके आगमनकी प्रतीक्षा करो । १०४ ॥ उन रामका उत्तम प्रकारसे पूजन करके बाद तुम भी चले आना, इतना कहकर वह चली गयी। इसी कारण अब मैं भी रामके पास जाना चाहती हूँ ॥ १०५ ॥ तथा हेमाकी मैं स्वयंप्रभा नामकी दासी हूँ। अब आप लोग यह कहे कि मैं आप लोगोंका कौनसा सहायता करूँ ॥ १०६ ॥ उसको इस बातको सुन तथा बहुत दिन व्यय अर्थात हुआ देखकर वे सब उसी बोले कि हमको इस बिलसे बाहर कर दो ॥ १०७ ॥ यह सुनकर उसने उन सबको अथवा अपना आंख मून्दने किए कहा। उसो अवसर वानरोंका यह नहीं मालूम हुआ पाय कि उसने किस प्रकार किस मार्गमें बाहर कर दिया। वह भी रामके पास चली गयी तथा उनका पूजा करके स्वर्ग सिधारी ॥ १०८ ॥ १०९ ॥ उस बिलसे बाहर अपने अत्यधिक दिनोंका व्यय देख उदाम हो समुद्रके किनारे गये और अनशन करके बैठ गये ॥ ११० ॥ बानरोंका इसप्रकार शोक देख प्रायोपवेशके दरम्यान जटायुका चरित्र चल पढा। वहा रहनेवाला संपाती जो उनका चचेरा भाई (पितृव्य-पुत्र) था, वह उनके मुखसे रामके कार्यके लिये जटायुका मरण तथा प्रशंसा सुनकर भाई संपाती, रूपान्तरित होकर समुद्रतटपर गया। पश्चात् उन वनेचरोंका वृत्तान्त सुनकर अपकार्य तथा समाचार कह सुनाया और वह ॥ १११ ॥ ११२ । यहाॅसे समुद्रको पार करके सौ योजनपर लङ्कामें तुम उन्हें देख सकते हो । ११३ । मैं पंख-रहित हूँ। इस कारण वहाँतक नहीं जा सकता, गृध्रकी दृष्टि तेज होती है। अतएव मैं सौ क्या पर्वतपर बैठी हुई लङ्कामें यहाँसे देख रहा हूँ ॥ ११४ ॥ मेरे पंख न होनेका कारण यह है कि मैं एक बार अपने बलके दर्पसे भाई जटायुके साथ उड़कर सूर्यका स्पर्श करनेके लिए आकाशमें उड़ा। रश्मि सूर्यका प्रभाव जटायु जलने लगा। तब मैंने अपनी पांखोंसे ढककर उसकी रक्षा की। जिससे कि मेरे दोनों पांख भस्म हो गयीं और मैं तथा जटायु दोनों उसरस गिर पड़े, जटायु उस ओर सपक्षा था। उससमय दुःखीने मैंने चन्द्रशर्मा नामक मुनिके

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ७९


तदा मां स मुनिः प्राह यदा त्वं वानरोत्तमान् । सीताशुद्धिं कथयसि तदा पक्षौ भविष्यतः ॥ १२८ ॥
पश्यतां निर्गतौ पक्षौ कोमलौ मां क्षणादिह । यदा नीता रावणेन पुरा सीता विहायसा ॥ १२९ ॥
मत्पुत्रेण तदा दृष्टा कथितं चापि मां तदा धिक्कृतः स मया क्रोधान्मा त्वया न विमोचिता ॥ १३० ॥
तदागम्य गतः क्रोधादद्यापि न समागतः । इत्युक्त्वा तान् कपीन् पृष्ट्वा स भवादिगतेस्तदा ॥ १३१ ॥
अथ ते वानराः सर्वं प्रोचुः स्वं स्वं बलं तदा । न कोऽपि गमने शक्तः शतयोजनसागरे ॥ १३२ ॥
तदा स जांबवान् वृद्धः स्तुत्वा तं मारुतिं मुहुः । जन्मकर्मादि संश्राव्य लङ्कां गंतुं दिदेश तम् ॥ १३३ ॥
सोऽपि श्रुत्वा समुद्योगं चकाराथ पवनसुतः । निजभंगद्भूमिसंगतं कृत्वा सस्मार राघवम् ॥ १३४ ॥
एवं गिरीन्द्रे प्रोक्तं किष्किन्धाविषये कृतम् । यत्नि रावरेणेशं पुरा पापप्रणाशनम् ॥ १३५ ॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रोऽष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

( हनुमान्का लंकामें जाकर सीताका पता लगाना और लंका जलाना )

श्रीशिव उवाच

अथ उड्डीय हनुमान् ययावाकाशवर्त्मना । तद्दृष्ट्वा नभले ज्ञातुं सुरसां नागमातरम् ॥ १ ॥
प्रेषयामासुस्स्वर्गाः सा शीघ्रं तत्पुरो ययौ । तदा सा मारुतिं प्राह विश त्वं वदनं मम ॥ २ ॥
स प्राह रघुवीरस्य कार्यं कृत्वा विशाम्यहम् । दृष्ट्वा तस्यास्तु निर्बन्धं व्यवर्धत तदा कपिः ॥ ३ ॥
विवर्धितं तथाऽप्यास्यं तदा सूक्ष्मो बभूव ह । अङ्गुष्ठमात्रस्तन्मया स वक्त्रे गत्वा विनिर्गतः ॥ ४ ॥


पास जाकर प्रणाम किया और अपना वृत्तांत उन्हें सुनाया । १२५-१२७॥ तब मुनिने कहा कि जब तुम वानरोंको सीताकी खबर सुनाओगे । उसी समय तुम्हारे पांख पुनः जम जायेंगे। १२८। देखो, मेरे शरीर-से ये कोमल पांखे क्षणभरमें निकल आयीं उस समय जब रावण सीताको आकाशमार्गसे ले जा रहा था ॥ १२९॥ उसी समय मेरे पुत्रने उनका देखा था और मुझसे कहा। तब मैंने उसका बहुत धिक्कारा और कहा--अरे दुष्ट ! तूने सीताको छुड़ाया क्यों नहीं ? १३०॥ तब वह कुपित होकर मेरे पाससे चला गया और आजतक नहीं लौटा। इतना कह तथा वानरसे पूछकर संपाती भी वहांसे चला गया ॥ १३१ ॥ तब वानरलोग परस्पर एक दूसरेसे अपना-अपना बल पूछा तो पता लगा कि सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघनेके लिये कोई समर्थ नहीं है । १३२ । तब वृद्ध जाम्बवान्ने हनुमान्को बारंबार प्रशंसा की। उनका जन्म तथा बल कह सुनाया और उन्हें लङ्का जानेकी आज्ञा दिया ॥ १३३॥ हनुमान्जी भी जाम्बवान्के वचन सुन तथा अपना पुरुषार्थ स्मरण करके पर्वतपर चढ़कर कूदनेको उद्यत हुए । अपने भारसे उन्होंने पर्वतको जमीनपर धसा दिया और रामका स्मरण करने लगे ॥ १३४ ॥ हे गिरिजेन्द्र, इस प्रकार पहिले किया हुआ रामचंद्रका किष्किन्धाचरित्र मैंने तुमको सुना दिया। जो कि श्रवणमात्रसे पापोंका नाश कर देता है ॥ १३५ ॥ इति वाशत्कोटिरामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे सारकाण्डे किष्किन्धाचरित्रे भाषाटीकायामष्टम सर्गः ॥ ८ ॥

शिवजी बोले--तदनन्तर हनुमान् उड़कर आकाशमार्गसे लंकाको चले यह देखकर उनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये देवताओंने नागोंकी माता सुरसाको भेजा। वह शीघ्र मार्गमें हनुमान्जीके सामने आकर खड़ी हो गयी और मुख फाड़कर हनुमान्से कहने लगी कि तू आकर मेरे मुखमें प्रवेश कर मैं तुझे खाऊँगी ॥ १॥ २॥ हनुमान्ने उत्तर दिया कि मैं श्रीरामका कार्य संपादन करके फिर आकर तुम्हारे मुखमें प्रवेश करूँगा। परन्तु उसका अधिक आग्रह देखकर कपिने अपना शरीर बढ़ाया ॥ ३ ॥ यह देखकर सुरस ने भी अपनी काया और अधिक बढ़ायी । तब हनुमान् अंगुष्ठमात्रका सूक्ष्म रूप धरके उसके मुखमें प्रविष्ट होकर

८० | आनन्दरामायणे | [सर्गः २

ज्ञात्वा साऽपि बलं तस्य स्तुत्वा तं प्रययौ दिवम्. अथाब्धिवचनान्मार्गे मैनाकः पर्वतो महान् ॥ ५ ॥
जलमध्यात्प्रादुरभूद्विश्रान्त्यर्थे हनूमतः । नानामणिमयैः शृङ्गैरभ्रम्पोषपरि नगत्कुतिः ॥ ६ ॥
धृत्वा यान्तं हनूमन्तं प्राह मैनाकपर्वतः । आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि च ॥ ७ ॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् पुरा गिरीणामिंद्रेण युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥ ८ ॥
तदा दशरथेनाहं मोचितोऽस्म्यत्र संस्थितः अतस्तदुपकारं हि निस्तर्तुं निर्गतोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥
गच्छतो रामकार्यार्थं तव विश्रान्तिहेतवे तदा तं हनुमानाह रामकार्ये न मे श्रमः ॥१०।
विश्रामः स्वामिकार्येऽत्र न कर्तव्यश्च भक्षणम् । मैनाकस्त्वं पुनः प्राह स्वस्पर्शात्पावयस्व माम् ॥११
तथेति स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः । किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥१२
सिंहिकानाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता मदा। आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षती ॥१३।
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ।.१४।
एवं विचिन्त्य हनुमानधो दृष्टिं प्रसारयन् । तत्र दृष्ट्वा सिंहिकां तां तदस्ये न्यपतत्कपिः । १५।
तस्यांत्रजालं निष्कास्य तां हत्वाऽग्रे ययौ पुनः ततोऽब्धेर्दक्षिणे कूले लंकां कृत्वा तु पार्श्वतः ॥१६॥
पपात पर्लकार्या तत्र तां रावणस्वसाम् । क्रौञ्चा हन्त्वा सिंहिकावल्लङ्कां रात्रौ विवेश सः ।।१७।
तदा लङ्कापुरी नाम्नी राक्षसी तं व्यतर्जयत् । हनुमानपि तां वाममुष्टिनाऽजयदाहनन् १८॥
तदा स्मृत्वा ब्रह्मवाक्यं सा प्राहाश्रुमुखी हरी । ब्रह्मणोक्ता पुरा चाहं यदा त्वां धर्षयेत्कपिः १९।
तदा रामो रावणस्य वधार्थमत्र यास्यति । ज्ञातं मया रावणस्य वधं रामः करिष्यति ।.२०॥
निर्विघ्नया गच्छ लंकामशोके पश्य जानकीम् ततो विवेश हनुमाल्लङ्कां पश्यन्ययौ तदा । २१॥

पार बाहर निकल आये ॥४। तब सुरसा उनका बल जान और स्तुति करके स्वर्गको चली गयीं।
पश्चात् समुद्रके कहनेसे महान् मैनाक पर्वत जलके बीचमेंसे हनुमान्के विश्रामके लिये आधसर द का उठ
खड़ा हुआ। नाना मणिमय शिखरोंक ऊपर मनुष्यका रूप धारण करके मैनाक पर्वत शाल द्वार हनुम त्सं
बोला कि आइए और मरे अमृतकल्प फलोंको खाइए । ५-७। तब ओसू क्षणभर विश्रामकरके सुखपूर्वक
आगे जाइयेगा। पूर्वसमय पर्वतोंका इन्द्रके साथ दारुण युद्ध हुआ था ॥ ८ । उस समय राजा दशरथने मुझे
बचाया था तबसे मै यहाँ आकर रहता हूँ। मै उनके उपकारके उऋण होनेके लिये ही आपके सामने
उपस्थित हुआ हूँ । ९। सो इसलिये कि रामकार्यके लिये जाते हुए आप मेरे ऊपर विश्राम करके जायें तब
मम हनुमान्ने कहा कि क्या रामके कार्यमें मुझे श्रम होगा ? और स्वामीके कार्यमें तो सदा विश्राम ही
रहता है। इसलिये मैं यहाँ ठहरकर भोजन आदि नहीं कर सकता । तब फिर मैनाकने कहा-अच्छा, कृपया आप
अपने हाथसे स्पर्श करके तो मुझे पवित्र कर दे १०, ११। 'तथास्तु' कह हनुमान्‌ह ने उसके शिखरका छूकर
चल पड़े। जब कुछ दूर आये बहत उनकी छायाको किसी छायाग्रहने पकड़ लिया । १२। वह सिंहिका
नामकी घोर राक्षसी थी। जो सदा जलमें रहा करती थी और आकाशमार्गसे उड़ते हुए पक्षियोंकी छाया
पकड़कर खींच लेती और खा जातीथी १३। उसके पकड़नेपर बलवान् हनुमान् सोचने लग कि किसने रामके
काममें विघ्न डालकर किया भंग कर रोक दिया । १४ । यह विचारकर हनुमान्ने नीचे दृष्टि की ता सिंहिका
राक्षसीको देखकर उसके मुखम ही कूद पड़े ॥१५॥ उन्होने उसका आंत निकाल ली और उसे मार डाला।
यहाँसे आगे बढ़ तो समुद्रके दक्षिण किनारे स्थित लङ्काको बगलमें स्थित परलङ्कामे जा पहुँचे । यहाँ
रावणकी लड़की क्रौञ्चानां सिंहिकाके ही समान मारकर रात्रिके समय लङ्कामें प्रवेश किया ।। १६ ।। १७।
तब उन्ह लङ्का नामकी राक्षसी डाँटने लगी । हनुमन्तने उसको भी अवहेलासे बायें हाथका एक मुक्का मारा
॥ १८ । उस समय ब्रह्माके वाक्यका स्मरण करके लङ्का आँखोस आँसू भरकर बोली कि पूर्वकालमें ब्रह्माजीने
मुझस कहा था कि जब कोई वानर तेरा अपमान करेगा ॥ १९ ॥ तब राम रावणका वध करनेके लिए यहाँ

सर्ग ९] सारकाण्डम् [८१


ददर्श लङ्कां तां रम्यां गोपुराट्टालमण्डिताम् । दृढवीथीचतुष्काढ्यां त्रिकूटशिखरस्थिताम् ॥२२॥
पश्यन्ममन्ततः सीतां प्रतिगेहं स मारुतिः । गुहायां निद्रितं कुम्भकर्णं दृष्ट्वा भयानकम् ॥२३॥
दृष्ट्वा विभीषणं रामकीर्तने हृष्टमानसम् । दृष्ट्वा सुलोचनायुक्तं निद्रितं मेघनिःस्वनम् ॥२४॥
ययौ राजगृहं रात्री रावणं मदमि स्थितम् । दृष्ट्वा स्वयं वायुपुत्रो दीपराजीव्र्यलोकयत् । २५॥
अकरोद्वख्रहीनांस्तान् रावणादीन्त्स मारुतिः । उल्मुकेनाकरोद्दग्धं कूर्चं च रावणस्य च । २६ ।
राक्षसीः कोटिशो नग्नाः कृत्वा तोयघटान्कपिः भभंज लीलया तूष्णीं दृप्तान्पुच्छेन तर्जयन् ॥२७॥
महाऽनिविह्वलाः सर्वे प्रोचुस्तेऽथ परस्परम् । क्रुद्धाऽद्य जानकी सत्यं नः प्राणान्तमुपागतम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वा तुष्टचित्तः स ययौ रावणमन्दिरम् । अदृष्ट्वा जानकीं तत्र ययौ पुष्पकमुत्तमम् । २९।
रावणं निद्रितं दृष्ट्वा वेष्टितं स्त्रीकदम्बकैः । दृष्ट्वा मन्दोदरीं तत्र सीतेयमिति शंकितः ।' ३०।।
लक्ष्मणोक्तानि चिह्नानि पर्यस्तस्यां ददर्श न, तथापि सीतासदृशीं दृष्ट्वा व्यग्रमनास्त्वभूत् ॥३१॥

पार्वत्युवाच
कथं मन्दोदरी सीतामदृशी राक्षसीपिता । मानांशांशांशजाः सर्वाः स्त्रियश्चेति श्रुतं मया ॥३२॥

श्रीशिव उवाच
शृणुष्व कारणं देवि सीतेयं विष्णुना चिता । तेनैव विष्णुना पूर्वमियं मन्दोदरी चिता ॥३३॥
एकदा कैकसी माता रावणं प्राह दुःखिता । क्षेपोच्छुन्मोन तल्लिङ्गं गत चाद्य रसातलम् । ३४॥
शिवाराधाय मां देहि आत्मलिंगमनुत्तमम् । तन्मातृवचनं श्रुत्वा गाण्णादरदोन्मुखम् । ३५॥
मामाह रावणो वाक्यं द्वौ वरौ देहि मां प्रभो । आत्मलिंगं च मन्मात्रे पन्त्यर्थं पार्वतीं मम ॥३६ ।


आया । सो अब मैंने जान लिया कि राम रावणका नारंग ।. २० ।। तुमने लङ्काको जीत लिया। जाओ, लङ्कामे घुसकर अशोकवाटिका में जानकीको देखो। तब हनुमान् सीताको खोजते हुए लङ्कामे घुसे ।। २१ ।।
उन्होंने पुरद्वार तथा अटारियोंसे मण्डित रम्य लङ्कानगरीको देखा। वह त्रिकूट पर्वतके शिखरपर स्थित बाजारों, सड़कों तथा चौराहोंसे रमणीक लग रही थी ।। २२ ।। हनुमान् सब ओर प्रत्येक घरमें सीताको ढूँढकर गुफामें सोता हुए कुम्भकर्णको देखा ॥ २३ ॥ उन्होंने रामनामक कीर्तनसे प्रसन्नमना विभीषणको और सुलोचनाके साथ सोए हुए मेघनादको देखा ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजभवनमें जाकर रात्रिके समय सभामें स्थित रावणको देखा; यह देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने दीपकोंको बुझा दिया ।। २५ ।। हनुमान्जीने उन रावणादिको नग्न करके रावणकी दाढ़ी-मूंछ आदिको लुआठोंसे जलाकर भस्म कर दिया ।। २६ ।। करोड़ों राक्षसियोंको नग्न कर दिया; सिकवेलमे रक्खे घड़ोंको फोड़ डाला और सुपीसे उद्धतर सिपाहियोंको पूंछसे खूब पीटा ।। २७ ।।
अतिशय विह्वल होकर वे सब परस्पर कहने लगे कि सचमुच सीताजी हम लोगोंपर रुष्ट हुई है। अब हम लोगोंका प्राणान्तकाल निकट आ गया है ॥ २८ । यह सुना तो संतुष्टचित्त होकर हनुमान् रावणके महलमें गये । वहाँ भी जानकीको न देखकर पुष्पकविमानपर गये ।। २९ । वहाँ रावणको स्त्रियोंके समूहसे वेष्टित होकर सोता हुआ देखा । साथ ही मन्दोदरीको देखकर 'यही सीता है क्या ?' ऐसी शङ्का करने लगे । ३० ।। परन्तु जब लक्ष्मणके कथनानुसार सीताका मुखाकृति मिलाने लगे तो नहीं मिली । फिर भी उसको सीताके समान देखकर आश्चर्यचकित हुए । ३१ । पार्वतीजीने पूछा - हे सदाशिव ! राक्षसी मन्दोदरी सीताके सदृश कैसे थी ? मैंने तो सुना है कि संसारकी सब स्त्रिये सीताके अंशांशसे उत्पन्न हुई हैं ।। ३२ ।। श्रीशिवजी कहने लगे - एक बार रावणकी माता केकसीने दुःखित होकर रावणसे कहा कि शोपनामके उच्छ्वाससे मेरा नित्य पूजा करनेका शिवलिंग पातालमें चला गया है ।। ३३ ।। ३४ ।। सो तुम एक उत्तम शिवलिंग लाकर मुझे ला दो । माताके बचनको सुना न अपने गाननसे वरदान देनेके लिए राजी करके मुझसे रावणने कहा - हे प्रभो ! मुझको दो वर दीजिए । एकतो मेरी माताके लिए आत्मलिंग और दूसरेसे

८२ आनंदरामायणे [ सर्ग ९

ततस्त्य वचनं श्रुत्वा त्वं दत्ताऽसि गिरीन्द्रजे । दत्त्वाऽऽत्मलिङ्गं संप्रोक्तो मया त्वं यदि रावण । ३७।
मार्गे लिङ्गं भूमिसंस्थं करोषि नह्यहं पुनः । नाग्रे गच्छामि तत्रस्थानान्येव च गमास्यहम् ॥३८
तथेति रावणश्चोक्त्वा देव्या लिङ्गेन सो ययौ । तदा त्वया स्मृतो विष्णुस्तेनाङ्गचन्दनादिना । ३९
कृत्वा मन्दोदरी नारी मयदन्त्येऽर्पिता शुभा । मां निनाय मयः शीघ्रं पाताले स्वीयमद्गृहम् ॥४०॥
ततो द्विजस्वरूपेण विष्णुः प्राह दशाननम् । प्रतारितः शिवेन त्वं दत्त्वा दुर्गां तु कृत्रिमाम् ॥४१।
पाताले मयगेहे सा गोपिताऽस्ति शिवेन हि । विचिन्वंस्ति त्वं स्वर्गलोकं भूलोकं चेति शंकया । ४२॥
स्वीयं मत्वा तु पाताल तत्र त्वं न गवेष्यसि । त्यजेमां कृत्रिमां दुर्गां पश्य तां मयमन्दिरि । ४३॥
गिरीन्द्रजां महाभाग्यां पत्नीं कृत्वा सुखं भज । तद्विप्रवचनं सत्यं मन्वा भामेत्य वै पुनः । ४४।
विहस्य रावणः प्राह ज्ञातं तेऽन्तर्गतं मया । अर्पिता कृत्रिमा देवी मांतां गोप्य स्थात्तले ॥४५॥
त्वयैवास्त्वधुना चेयं त्वहं नेष्यामि गोपिताम् । इत्युक्त्वा त्वां विसृज्याथ पाताल गन्तुमुद्यत ॥४६॥
तावन्मार्गे ह्युपशकायन्तः प्राह द्विजं तदा । आत्मलिंग क्षणं हस्ते धुरुं ध्व वचनान्मम ॥४७॥
यावन्निवर्त्य शकां स्वामहमेष्यामि वेगतः । द्विजवेषधरो विष्णुस्तदा प्राह दशाननम् । ४८
अतिक्रांते मुहूर्तेऽथ लिङ्गं स्थाप्य व्रजाम्यहम् । तथेति रावणश्चोक्त्वा तत्करे लिंगमर्पयत् । ४९।
ततो मूत्रस्य सा धाराऽखण्डिताऽभूच्चिरं प्रिये अतिक्रान्ते मुहूर्तेऽय लिंगे मार्गरगेधसि । ५०
पश्चिमे स्थाप्य भूम्यां स ययौ स्वीयम्थल हरिः ततः स रावणश्चापि मूत्रं कृत्वा यथाविधि । ५१।
लिंगं दृष्ट्वा भूमिस्यं तच्चिञ्चचालयत्तदा । तदा भूम्यां गतं लिङ्गं शिरः किंचित्चचाल न ५२॥
अभूद्गवां कर्णप्रमदर्शी तच्छिद्रस्थले । गतायां तच्छिलाश्चापि कर्णशंकूपमं कृतम् । ५३।

पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती को दे दीजिए ॥ ३५ । ३६ ॥ हे पार्वतीजी ! उसकी वरप्रार्थना सुनकर मैने तुमको उसे दे दिया और आत्मलिङ्ग भी देकर उससे कहा—हे रावण ! देख यदि तूने इस लिङ्गको मार्गमे कही भी रख दिया तो मै आगे न जाकर वही रह जाऊँगा ॥ ३७ । ३८ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर रावण देवी पार्वती तथा लिङ्कको लेकर चला गया उस समय तुमने विष्णुभगवान्का स्मरण किया तब उन्होने अपने अङ्गके चन्दन आदिसे मन्दोदरीका सुन्दरी स्त्री बनाकर मय दानवको दिया। उसे लेकर मयदानव पातालके अपने मनोहर भवनको चला गया ॥ ३९ । ४० । तब विष्णुभगवान्ने ब्राह्मणका रूप धारण करके रावणसे कहा-हे दशानन ! शिवजीने तुमको ठग लिया उन्होने यह नकली पार्वती तुमको दी है ॥ ४१ ॥ असलको तो शिवजीने पातालमे मयदानवके घरमे छिपा दिया है। उन्होंने यह सोचा कि तुम स्वर्ग तथा भूलोकमे ही खोजोगे ॥ ४२ । अपना समझकर पातालमे न खोजोगे इस कारण तुम इस कृत्रिम दुर्गाको छोड़ दो और मय-दानवके घर जाकर यथार्थ पार्वतीको ढूँढ़ निकालो । ४३ । उस अत्यन्त सुन्दर पार्वतीको पत्नी बनाकर सुख भोगो । विप्रके इस वचनको सच मानकर पुनः रावण मेरे पास आया ॥ ४४ ॥ वह हँसकर बोला कि मैने आपका हृदयगत अभिप्रायको जान लिया है। आपने असली पार्वतीको पातालमे छिपाकर मुझे नकली पार्वती दे दी है ॥ ४५ । इसको अब अपने पास ही रखिए । मै तो उस छिपी हुई पार्वतीको ही ले जाऊँगा इतना कह तथा तुमको यही छोड़कर वह पातालमे जानेके लिए उद्यत हुआ ॥ ४६ ॥ रास्तेमे लघुशङ्का करनेकी इच्छावश उसने ब्राह्मणसे कहा —हे द्विज मेरी प्रार्थना स्वीकार करके क्षणभरके लिए इस शिवलिङ्गको अपने हाथमे लिये रहो ॥ ४७ ॥ मै लघुशङ्का करके तुम्हारे पास आ रहा हूँ । द्विजवेष धारण करनेवाले विष्णुने कहा—हे दशानन ! यदि अधिक देर लगेगी तो मै लिङ्गको वहींपर रखकर चला जाऊँगा । अच्छी बात है, कहकर रावणने शिवलिङ्ग उनके हाथमें दे दिया ॥ ४८ । ४९ ॥ रावण जब लघुशङ्का करने लगा तो बहुत देर तक मूत्रकी अखण्ड धारा छूटती रही । अधिक समय बीत जानेपर मार्गके पश्चिम किनारे लिङ्गको रखकर विष्णुभगवान अपने स्थानको चले गये। उसके पश्चात् रावण भी विधिवत् मूत्रत्याग करके वहीं आया ॥ ५० ॥ ५१ । लिङ्गको जमीनपर रक्खा देखकर उसके सिरको हिलाया, परन्तु भूमिगत लिङ्गका सिर नहीं हिला

सर्गः ५ ] | सुन्दरकाण्डम् | ८३

सर्गः ५ ]सुन्दरकाण्डम्८३

सुतः कर्णोऽस्य लिंगे गोकर्णं तद्वदस्ति हि । ततः खिन्नमनाभूयो पातालं रावणो ययौ ॥५४॥
मयगेहे निरीक्ष्याय देवीं मन्दोदरीं वराम् । मयं संप्राथर्यामास ददौ तां रावणाय सः ॥५५॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य पाणिग्रहं ददौ मयः । रावणाय दृढां शक्तिममोघां शत्रुघातिनीम् ॥५६॥
दृष्ट्वा मन्दोदरा मन्द्यः प्राह मन्दोदरीमिति । तां नाम्ना रावणस्तुष्टस्त्वया स्वीयस्थलययौ ॥५७॥
ततो मात्रा धिकृतः स पुनस्तपुं मथान्वितः । गोकर्णं रावणो गत्वा तप्स्या लब्ध्वा विधेर्वरान् ॥५८॥
त्रैलोक्यं स्ववशे कृत्वा लङ्कायां राज्यमाप सः, तस्मान्सीतासमानेयं दृष्टा मन्दोदरा प्रिये ॥५९॥
लंकायां वायुपुत्रेण रावणाग्रे विनिद्रिता । मयोऽप्यासीच्च लंकायां गृहं कृत्वा यथासुखम् ॥६०॥
मयश्चैवांगयो नाम महान् वीरः प्रतापवान् । रात्रौ विनिद्रितो गेहे ब्रह्मदत्तवरन्सुधीः ॥६१॥
दशास्यहस्तात्तन्मृत्युर्विनिर्णिक्तं विचित्य च । तस्य वस्त्रं मारुतिना हतं सद्मनि वै पुरा ॥६२॥
तन्क्षिप्तमूर्ध्वपर्यङ्के रावणस्य कपिस्तदा । विभीषणस्य पर्यङ्के वसनं रावणस्य च ॥६३॥
विचिन्वत्यथ जानकीं म लङ्काया च मुहुः कपिः । ययावशोकवनिकां वृक्षप्रासादपण्डिताम् ॥६४॥
ददर्श तत्र प्रांशुं च शिंशपानाम पादपम् । तन्मूले राक्षसीमद्ध्ये ददर्शाविदिकन्यकाम् ॥६५॥
एकवेणीं कृशां दीनां मलिनाम्बरधारिणीम् । भूमौ शयानां शोचन्तीं रामरामेति भाषिणीम् ॥६६॥
कृतार्थोऽहमिति प्राह दृष्ट्वा सीतां स मारुतिः । शिंशपानगशाखाग्रपल्लवाभ्यन्तरे स्थितः ॥६७॥
पुरा दृष्टानलंकारान् तस्य देहे ददर्श न । ततः किलकिलाशब्दैर्ययौ तत्र दशाननः ॥६८॥
ददर्श रावणः स्वप्ने कपिः कश्चित्समागतः । अशोकवनिकाया सा दृष्टा तेन विदेहजा ॥६९॥

५४॥ उसके शिश्नाकार जगह कानके छेदकी तरह गढ्ढा हो गया। उसका सिर भी कर्णशंकुकी तरह गोल हो गया। ५४। अतएव पृथ्याक कलंक स्वरूप यह लिंग गोकर्ण नामसे विख्यात हुआ। तब खिन्नमना होकर रावण सुतलपातालको चला गया ॥ ५४ ॥ मयके घरमें सुन्दरी मन्दोदरीको देखकर मयसे रावणने प्रार्थना की। तब मयने रावणको वह कन्या दे दी। ५५। इस प्रकार मयने कन्याका विवाह करके रावणको एकदम बहुत सा वस्त्र आभूषण आदि दिया और शत्रुघातिनी, अमोघ दृढ़ शक्ति भी दी ॥ ५६ ॥ उस दवाकी कृपा दृष्टि अर्थात् मुख्य देखकर रावणने उसका नाम मन्दोदरि रखा और उसके साथ सन्तुष्ट होकर रावण अपने स्थानको चला गया ॥५७। तहां माताके धिक्कारनेपर रावण फिर गोकर्णके पास जाकर तप करने लगा। असीम अपनी तपस्याके बलसे रावणने ब्रह्मासे वर प्राप्त करके तीनों लोक वशन कर लिया और लङ्कापर राज्य करने लगा, हे प्रिये पार्वती इसी कारण हनुमान्ने सीताके समान मन्दोदरीको रावणके आगे सुहाम सोई हुए देखा था । बादमें तो मय दानव भी लङ्कामें घर बनाकर सुखपूर्वक रहने लगा ॥५८-६०। प्रतापी मयके भाई मय रात्रिके समय अपने भवनमें सो रहा था । विचारशील हनुमान्ने इसके दस मुखके रावणके हाथसे मृत्यु जानकर विचारसे उसके सर्ववस्त्रोंके लेकर सम्मुखमें रावणके ऊपर और बादमें रावणके वस्त्र ले जाकर विभीषणके पलंगपर रख दिया ॥ ६१-६३ । पुन हनुमान् मुहुर्मुहु जानकीजीको खोजने लगे। खोजते-खोजते वृक्षों तथा पासादोंसे सुशोभित अशोकवनिकामें गये ॥ ६४ । वहां उन्हें एक उत्कृष्ट शिंशपा (प्रशाम) का वृक्ष दिखायी दिया। इसके नीचे राक्षसियोंके बीचमें अवनि-कन्या जानकी जीको विराजमान देखा। ६५। उस समय शुष्क तथा दीन मुख होकर मलीन वस्त्र धारण किये हुए भूमिपर सोयी हुई रोती दुःखित मनसे रामका नाम जप रही थीं । उनके सिरके बालोंमें तैल आदि पर जानेसे वेडुनि बंध गयी था ॥ ६६ । सीताके दर्शनसे अपनेको कृतार्थ समझते हुए हनुमान्‌जी उस शिंशपावृक्षकी एक शाखाके अग्रभागके पत्तोंमें छिपकर बैठ गये ॥ ६७॥ उस समय सीताके शरीरपर एक शृंगार नहीं दिखायी दिये, जिनको कि हनुमान्ने पहिले सुग्रीवके पास देखा था। इतनेमें कुछ कोलाहलके साथ रावण वहां जा पहुंचा। ६८ । क्योंकि रावणको स्वप्नमें दिखायी दिया कि कोई वानर आया है और उसने

८४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

रामहस्तान्मृतः शीघ्रं लब्धुं तां घर्षयास्यहम् । कपिर्दृष्ट्वा राघवाय निवेदयतु मत्कृतम् ॥७०॥
आगमिष्यति उल्लङ्घ्या मणौ मां निहनिष्यति । इति निश्चित्य स ययौ सीते मवेष्टितो मुदा ॥७१॥
नूपुराणां ध्वनिं श्रुत्वा सिंहलाऽऽसीद्विदेवता । रावणो जानकीमाह मा दृप्त किं विलम्बसे । ७२।
रामं वनेचरं राज्यभ्रष्टं त्यक्तगृहं जनम् । पित्रा हनं भोगहीनं यदा स्वगृहनिर्गतम् ॥७३॥
एकान्तवासिनं दिग्वस्त्रवल्कलाधारिणम् । तं त्यक्त्वा मां भजस्वाद्य त्रैलोक्येशं महाबलम् ॥७४॥
अमरौघैः सेवितं मां भवन्तं पदस्थितम् । प्रियो मन्दोदरीमुख्यास्त्वां भजिष्यन्त्यहर्निशम् ॥७५॥
मया राज्यं स्वदधीनं कृतमपि भजस्व माम् । मया स्वजीवनं वापि त्वदधीनं कृतं महत् ॥७६॥
इति नानाविधैर्वाक्यैः प्राथयामास रावणः उवाचाधोमुखी सीता निधाय तृणमन्तरे । ७७॥
राघवाद्बिभ्यता नूनं भिक्षुरूपं धृतं त्वया । रहिते राघवाभ्यां त्वं शुनीव हविराध्वरे ॥७८॥
हृतवानसि मां नीच तत्फलं प्राप्स्यसेऽचिरात् । यदा रामशराग्रविदारितवपुर्भवान् ॥
भविष्यसि रणे रामं जानीषे मानुषं तदा । ७९ ।
श्रुत्वा रक्षोधिपः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम् । वाक्यं क्रोधसमाविष्टः पुनर्वचनमब्रवीत् ॥८०॥
प्रविशो लङ्कायां त्रिदशवदनार्त्तिनिवारिणी गतोऽपि स्थाता न युधि पुरतो लक्ष्मणसहः ।
तथा यास्यन्पूर्वेष्विपदमसुनेशश्च झटिती जयः श्रीरामे स्यान्न मम बहुनाशीश्च तु भवेत् ॥८१॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा जानकी प्राह तं पुनः । षष्ठाक्षरमपादेषु चतुर्णं चरणेष्वपि ॥८२॥
सप्तमञ्चापि चत्वारि लोप लोकामुमुं पठ । एवं तया जितो वाक्यवाग्बाणैः स दशाननः ॥८३ ।

मम अवलम्ब जानकर रावण निरन्तर मुझ से प्रेम करता ही रहता है ६९ । 'रामके हाथसे शीघ्र मरनेके लिए मैं चलकर सीताका तिरस्कार करूंगा तो मेरी दुर्दशा देखकर वह वानर रामसे कहेगा ॥ ७० ॥ सो सुनकर राम यहाँ आवेंगे और मुझे मारेंगे' ऐसा विचार करके उस त्रिकूटकी शाखा लेकर सानन्द ऊपर चल पडा ॥ ७१ ॥
नूपुरोंकी ध्वनिश्रवण कर सीताजी घबडा गयीं और उन्होंने मुख बन्द कर लिया । तब रावणने सीतासे कहा- तू मुझसे लजाती क्यों है? ॥ ७२ । वनमें भ्रमण करनेवाले, राजपद सुखजनतासे रहित, पितृहीन, मात-हीन, सदा घर निष्कासित ॥ ७३ । एकान्तवासी दिगम्बर भोग बन्कल भण्डपण्डित वृत्तक (छिन्नवेषधारी) धारण करनेवाले रामको छोडकर तू त्रिजगत्पति और महाबलवान् मुझ रावणका आश्रय ले और मुझे सेवा कर ॥ ७४ ॥ मैं अमरगणोंसे सेवित और आद्यन्तहीन होकर महान् पदपर स्थित हूँ । मेरी सेवा करनेतु मेरी मन्दोदरी आदि स्त्रिये भी रात दिन तेरी दासी बनकर रहेंगी ॥ ७५ ॥ मैने अपना राज्य तथा अपना जीवन तुझको दे दिया है । तू मेरी बनकर रहे ॥ ७६ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके वाक्यद्वारा रावण प्रार्थना करने लगा ।
तब नीचमें तिनकेका त्राट करके तथा नीच मुख किये हुए सीताने कहा-॥ ७७ ॥ अरे पापी ! बडा ढोंग हाँकता है । रामके डरसे तू भिक्षुका रूप धारण करके और श्रीरामलक्ष्मणका अनुपस्थितिम यज्ञमें जैसे कुत्ता हवि अर्थात् हव्यनया सामग्री चुराकर आदि लेकर भागे, उस प्रकार तू मुझे लेकर भग आया है। अरे नीच ! उसका फल तुझको शीघ्र मिल जायगा । जब रामके बाणसे विदारितशरीर होकर तू गिरेगा तब तुझे यह पता लग जायगा कि राम मनुष्य है या और कोई यह सुनकर राक्षसाधिप रावण कुपित होकर जानकीको कठोर वचन कहता हुआ बोला ॥ ७८-८० ॥ 'इस लङ्कामें आकर स्वर्गओकके र्भ, सुख शान्ति हो जायँगे । लक्ष्मणसहित वह राम भी मत समक्ष युद्धमें नहीं खडे रह सकेगा । यहाँ आगतो प्रधुओके सहित बहुत बडी भारी विपत्तिमे पड जागा । यहाँ उस जटाधारी रामकी जीत नही होगी और मुझे भी आनन्द न प्राप्त होगा' ॥ ८१ ॥ रावण-की इस बातको सुनकर जानकीने कहा-चारो चरणोम छठे अक्षर तथा आनेवाले चारो सप्तम अक्षरोका लोप करके तुम इसी श्लोकको फिरसे पढो । वही हल तुम लागोका होगा । कहनेका आशय यह है कि ८१वें श्लोकमेंसे चारो चरणोके प्र वि और न ये चार अक्षर निकल जानेसे यह अर्थ होगा कि लङ्कामे दशवदन रावणके ऊपर शीघ्र ही विपत्ति आ येगी अर्थात् वह झूर जायगा । लक्ष्मणके साथ राम युद्धमें मा हटेंगे ।

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ८५


त्रपाथ भीषयन्तीनां बहुशुश्राव संमदः । धृत्वा करेण तत्पाणिं मन्दोदर्या निषेधितः ॥८४॥
नादृष्टाः सन्ति बहवस्त्यजैनं कृपणां कृशाम् । ततोऽब्रवीद्दशग्रीवो राक्षसीर्विकृताननाः ॥८५॥
यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना । तथा यतध्वं त्वरितं तर्जनादरणादिभिः ॥८६॥
यदि मासद्वयादूर्ध्वं मच्छय्यां नाभिनन्दति । तदा मे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुषीम् ॥८७॥
तदा सीता पुनः प्राह वचनं तं दशाननम् । बाल्येन्वहेह समानीता पेटिकास्था त्वया पुरा ॥८८॥
तदा मया यत् प्रोक्तं तच्च किं विस्मृतोऽसि हि । अधुनाऽहं गमिष्यामि यास्यामि त्वरितं पुनः ॥८९॥
त्वं च पुत्रांश्च बांधवांश्च निहन्तुं च मयैषिणीम् । तन्मयाद्य वचनं सत्यं कर्तुमत्रागताऽस्म्यहम् ॥९०॥
मां बन्धून् सम्पर्यावर्त्यहरामि रामहस्ततः । ततोऽयोध्यापुरीं गत्वा पुनर्यास्यामि त्वत्पुरीम् ॥९१॥
तच्छ्रुत्वा शङ्कुकं न मातामहगृहे स्थितम् । शतशीर्षं रावणं च द्वीपांतरनिवासिनम् ॥९२॥
तत्साहाय्ये पोतुकैस्तल्लयामागतं पुनः । अहं तृतीयवेलायां सर्वाभ्यां सह वातुधा ॥९३॥
ततः स्वीयस्थलं गत्वा पुनश्च स्थाप्यहं जनान् । कुम्भकर्णोद्भवं वीरं मूलकासुरनामकम् ॥९४॥
अथवा तुर्यवेलायामागच्छ पूर्वकेण हि । अहमेव हनिष्यामि शितबाणं रणांगणे ॥९५॥
अन्यच्चापि स्मरस्य त्वं पुरा बाह्वर्जुनादितम् । यत्प्रियाञ्च त्वया गत्वा कौसल्यानृपतेः पुरा ॥९६॥
पेटिकास्थौ पुनश्च्यक्ता नाज्ञत्वे दैवयोगतः । अनन्यत्र मतुकामोऽसि यतोऽहमाहृता त्वया ॥९७॥
गच्छ गेहे सुखं भुङ्क्ष्व रामः शीघ्रं हनिष्यति । इति सीतावाक्यवाणाभिन्नममंस्थलोऽपि सः ॥९८॥
यया तूष्णीं निजं गेहं लज्जानध्र दशाननः । एवं दशानने याते राक्षस्यो रावणाज्ञया ॥९९॥
जानकीं ताः स्वशब्दैश्च तथा क्रूरोक्तिभिर्मुहुः । आख्यादीर्घप्रमुखाद्यैर्भीषयन्त्यः करालाभिः ॥१००॥


अनुज सहित राम को पराभव प्राप्त होगा और उस समय मेरी विजय होगी, तब मुझे बड़ा हर्ष होगा। इस प्रकार वार्तालाप समाप्त करके मौन हो दशानन ने जान लिया ॥८३।८४॥ तब रावण तलवार उठाकर सीता को मारने के लिए उद्यत हुआ। उस समय मन्दोदरी ने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा कि तुम्हारे बहुत सी स्त्रियां हैं, इस कृपण कमजोर तथा दीन व मानुषी नारीको छोड़ दो। तब रावणने उन मुखवाली राक्षसियोंसे कहा कि जिस तरह से यह सीता मेरे वशमें हो, वैसा तुमलोग उपाय करो और इसे समझाकर मेरे अनुकूल कराओ ॥८५।८६॥ यदि दो महीनेके भीतर यह मेरे शय्यापर न आय तो इसे प्रातःकालके भोजनके लिए तैयार करना, तब मैं इसे खा जाऊंगा ॥८७॥ सीता फिर दशमुख राक्षससे कहने लगी- जब तू बाल्यावस्थामें मुझे पेटारीसहित यहाँ ले आया था ॥८८॥ उस समय जो बात मैंने कही थी, क्या उसे भूल गये? मैंने कहा था कि अभी मैं जाती हूँ परन्तु फिर यहाँ तुरन्त ही आऊंगी ॥८९॥ और वह इसलिए कि मैं भाई, पुत्र तथा सेना सहित तुझ मार डालूंगी। अब मैं अपना वचन सत्य करने आई हूँ ॥९०॥ रामके हाथों तुझको और तेरे बन्धुओं तथा सेनाको मरवा-कर अयोध्यापुरी जाऊंगी, फिर मैं तीसरी बार भी तेरी नगरीमें आऊँगी ॥९१॥ उस समय मातामह के कुलमें या घरमें स्थित निकुम्भक पुत्र पोलस्कथा तथा द्वीपायतनमें रहनेवाले सो शिरवाले रावणको कि जिसकी सहायताके लिए घूम आया, तीसरी बार आकर उन दोनोंको मारूँगा ॥९२।९३॥ पश्चात् अपने स्थानको जाकर फिर चौथी बार में फिर आऊँगी और कुम्भकर्णके पुत्र वीर मूलकासुरका वध करूँगी ॥९४॥ अथवा विश्रामसे यहाँ आकर मैं इसे रणांगणमें मारूँगी ॥९५॥ पूर्वकालमें महाबाहुर्जुनने कहा था, यह भी स्मरण कर ले। जिसके कहनेसे तूने कौशल्या और राजा दशरथका हरण किया था ॥९६॥ दैवयोगसे फिर तूने उन्हें अयोध्यामें छुड़वा दिया था। इससे पता लगता है कि तू मरना चाहता है। इसीलिए तूने मुझसे प्रेम करना चाहा है। ९७॥ अब घर जा और सुखमं भोजन कर। राम तुझे शीघ्र मारेंगे। इस प्रकार सीताके वाक्यरूपी बाणसे विद्धहृदय होकर दशानन लज्जासे चुपचाप अपने घर चला गया । दशाननके चले जानेपर उसकी आज्ञासे राक्षस्योंने अपने भयानक शब्दोंसे, क्रूर वाक्योंस, मुँह फाड़कर, बलकार तथा

८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

निवार्य त्रिजटानाम्नी विभीषणप्रियाऽनुगा। ताः सर्वा राक्षसीर्वग्दाद्वापयन्नाह सादरम् ॥१०१॥
न भीषयध्वं रुदतीं नमस्कुरुत जानकीम् सुचिह्नं राघवः स्वप्ने मया दृष्टोऽद्य जानकीम् ॥१०२॥
मोचयामास दृष्ट्वेमां लङ्कां हन्त्वा तु रावणम्। रावणो गोमयह्रदे तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥१०३॥
मयाऽद्य दृष्टः स्वप्ने हि तस्मादेनां न साहसम् कार्यं सेव्या सदा चेयं रामादभयदायिनी ॥१०४॥
युष्माभद्दुःखिता नेष्टा भयंयं चानायिष्यति। इति तत्रिजटावाक्यं श्रुत्वा तस्थुर्भयाकुलाः ॥१०५॥
तूष्णीमेव तदा माना दुःखान्किमिदुदाथ मा। इदानीमेव मरणं केनोपायेन मे भवेत् ॥१०६॥
दीर्घा वेणी ममान्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति। यन्मयाऽशौर्यवाक्यैर्लक्ष्मणस्ताडितः पुरा ॥१०७॥
तस्मादिनाः पीडयति भोक्ष्यते स्वकृतं मया। मया विनागः सौमित्रिर्नासितो गौतमीऽटे ॥१०८॥
प्रायश्चित्तं करिष्येऽद्य सस्य त्यक्त्वाज्यजीवितम्। एवं निश्चितबुद्धिं तां मग्नायाय जानकीम् ॥१०९॥
दृष्ट्वा मुनेर्वायुपुत्रो रामवृत्तं न्यवेदयत्। आभ्राकर्णानिगेमाच्च स्वसीतादर्शनावधि ॥११०॥
मविस्तारं क्रमेणैव सीतातोषाथमादरात्। सीता क्रमेण तन्मर्वं श्रुत्वा साश्चर्यमानसा ॥१११॥
कि मयेदं श्रुतं स्वप्मिन् व्यमो दृष्टोऽथवा निधि। येन मे कर्णपीयूषवचनं समुदीरितम् ॥११२॥
स दृश्यता महाभागः प्रियवादी ममाग्रतः। तच्छ्रुत्वा मन्पुत्रे गन्त्वा नत्वा नामनवीत्पुनः ॥११३॥
रामदूतो ददौ तस्यै राघवस्यांगुलायकम्। तां राममुद्रिकां दृष्ट्वा नत्वा नामब्रवीत्कपिम् ॥११४॥
सर्वं कथय तद्वृत्तं यथा दृष्टं त्वयाऽत्र हि। तदा तां सांस्वयामास रामो मन्स्कन्धसंस्थितः ॥११५॥
वानरैश्च समागत्य हन्त्वा रावणमाहवे। त्वां नेष्यति नय सानेत्यब्रवं दम वाक्पतः ॥११६॥

अंगुलियोंके संकेतसे सीताको डराने लगीं । ९८-१०० । उसी समय विभीषणकी प्रिया अनुगामना त्रिजटा राक्षसोंने उन सबको ऐसा करनेसे रोका और उन सबको समझाकर कहा कि इस रोती हुई जानकीजीको तुम लोग डराओ नहीं प्रत्युत नमस्कार करो । मैंने आज स्वप्नमें रामको सुन्दर चिह्नोंसे युक्त देखा है और यह भी देखा है कि उन्होंने जानकीको छुड़ाकर लङ्काको जलाया तथा रावणको मार डाला है। तेल लगाये हुए रावण गोबरके गड्ढेमें गिर गया है ॥ १०१-१०३ ॥ मैंने आज यह स्वप्न देखा है। इस कारण इन्हे सतानेका साहस नहीं करना चाहिए । रामसे अभय दिलानेवाली इस जानकीकी तुम्हें सेवा करना चाहिए । १०४ ॥ यदि तुम लोग इसे दुःख दोगी तो वह अप्रसन्न पान रामके द्वारा तुम्हें भयको प्राप्त होगी । त्रिजटाके इस वाक्यको सुनकर सब राक्षसियाँ व्याकुल होकर चुप हो गयीं । १०५ ॥ उन सबके चले जानेपर दुःखित होकर सीता धीरे-धीरे कहने लगीं कि इसी समय मेरा मरण किस उपायसे हो सकता है । १०६ ॥ हाँ, यह मेरे सिरकी दीर्घवेणी इसको दृढ़ फांसी लगानेके लिए बहुत अच्छा तरह काम आवगी । उस समय जो मैंने बचनरूपी बाणों-से लक्ष्मणको बींधा था । १०७ ॥ उसीके फलस्वरूप आज ईश्वर मुझे रुला रहा है। वह मैं अपने किये हुए कर्मोंका फल पा रही हूँ। मैंने गौतमी तटपर बिनाही अपराधके निर्दोष मुद्ध लक्ष्मणजी को धमकाया था ॥१०८॥ उसका मैं आज प्राण देकर प्रायश्चित्त करूंगी। इस प्रकार मरनेका निश्चय कियेहुए जानकीको देखकर वायुपुत्र हनुमान्ने धीरे-धीरे रामका वृत्तान्त सुनाना प्रारम्भ किया । उन्होंने रामके अयोध्यासे वनमें आगमनसे लेकर सीताको देखने तकका सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक क्रमसे ही सीताके सन्तोषके लिए सुना दिया। वह सब वृत्तान्त सुनकर सीता आश्चर्यचकित होकर सोचने लगीं कि क्या यह मैं कोई स्वप्न अथवा भ्रम देख रही हूँ अथवा रात्रिके समयका स्वप्न देख रही हूँ। जिसने मेरे कानोंके लिए अमृतके समान यह वचन सुनाया है । १०९-११२ ॥ वह प्रियवादी मेरे सामने आकर दर्शन दे । यह सुनते ही हनुमान् उनके सामने प्रकट हो गये और नमस्कार करके उन्हें रामका वृत्तान्त पुनः सुनाया । ११३ ॥ फिर विश्वास दिलानेके लिए रामकी अंगूठी निकाल-कर सीताको दी । रामकी मुद्रिकाको देख तथा नमस्कार करके सीता बोलीं ॥ ११४ ॥ हे कपि ! जैसा कि तुमने देखा है, सो सब हाल जाकर रामसे कह देना। तब हनुमान् सीताको आश्वासन देकर कहने लगे कि राम मेरे कन्धेपर सवार हो वानरसेनापतियोंके साथ यहाँ आकर युद्धमें रावणको मारेंगे और आपको

सर्गः ९] सारकाण्डम् ८७

सर्गः ९] सारकाण्डम् ८७

ततः सीताप्रत्ययार्थं रूपं स्वं दर्शयन् कपिः । ततः पुनः प्रत्ययार्थं सीतायै गद्यचोदितम् ॥११७॥ मनःशिलायास्तिलकं चित्रकूटगिरौ कृतम् । कपिस्तत्कथयामास पूर्ववृत्तं सविस्तरम् ॥११८॥ तच्छ्रुत्वा जानकी तं प्राह हर्षोद्रेकाद्वचोऽब्रवीत् । अनुज्ञां देहि मे मातस्तद्वाभिज्ञानं प्रदास्य माम् ॥११९॥ सा तं चूडामणिं पित्रा दत्तं केशान्तग्रन्थितम् । निष्कास्य हस्ततो दत्त्वा पूर्वं काकेन यत्कृतम् ॥१२०॥ चित्रकूटगिरौ वृत्तं कथयामास तत्कपिम् । ततो नत्वा रामपत्नीं चिंतयामास चेतसि ॥१२१॥ स्वामिकार्यं कृतं चैतदन्यत्किञ्चित्करोम्यहम् । इति निश्चित्य मनसा जानकीं पुनरब्रवीत् ॥१२२॥ मातर्मेऽतीव क्षुद्बोधस्त्वद्य विकल्पतो महान् । अस्मिन्वनेऽतिमधुरः फलचयोऽतिदुर्लभः ॥१२३॥ तवानुज्ञाऽद्य संनेऽहं करिष्ये भक्षणं ध्रुवम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा जानकी व्यग्रकंकणम् ॥१२४॥ निष्कास्य हस्तात् प्राह गृहीत्वेदं प्लवङ्गम । अनेन फलभागान् लब्ध्वाह्वाऽमृतञ्च वा ॥१२५॥ भुङ्क्ष्वेतिवच्गत्वात्वश्चवनेऽस्मिन्फलोद्ध्वंसं मा । तदा कपिः पुनः प्राह पत्रद्रुमफलानि हि ॥१२६॥ नाहं भुंजामि माते मे अनवाप्ति ब्रजाम्यहम् । व्रजन् मारुतः शृण्वा सीता वचनमब्रवीत् ॥१२७॥ भो बालक कपिश्चेष्ट गहणोऽस्ति वनाधिपः । न शक्तिर्न च शक्यं ते कथञ्च भक्षयिष्यसि ॥१२८॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मारुतिः प्राह जानकीम् । श्रीरामेशि परं भद्रराम मे हृदयांतरे ॥१२९॥ तन सर्वाणि रुंजामि तृणरूपाणि सांप्रतम् । तदा तं जानका प्राह पतितान्यत्र वै भुवि ॥१३०॥ सुस्वादूनि फलानि त्वं तूणीं मा घोटयात्र वै । तदातं मारुतिश्चोत्वा वृक्षान्पुच्छेन चालयन् ॥१३१॥ वृक्षान्दोलनमात्रेण निपेतुश्च फलानि हि भक्षयामास तान्येव सुफलानि क्षणेन सः ॥१३२॥ ततो वृक्षान्समुत्पाट्य लांगूलेन स मारुतिः क्षिप्त्वा तान्यग्रवृक्षेषु समस्नानि फलानि वै ॥१३३॥ पातयामास भूम्यां तु भक्षयामास तानि सः । भक्षितानि समस्तानि फलानि वनजानि हि ॥१३४॥


... न जाना। इतीन' मत कहनेसे आप निर्भय रह ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ तब हनूमान् सीताका विश्वास ... करनेके लिए अपना असली स्वरूप दिखाया । तत्पश्चात् सीताके विश्वासके लिए जानकी रामका कहा ... हुआ 'चन्द्रक' दिया मनःशिलका तिलक आदि का वृत्त या बतला दिया । साथ ही और भी पहलेका वृतान्त ... सीताको सुनाया । ११७ ॥ ११८ ॥ तब हर्षमें आ सीताजीसे हनुमानने कहा—हे माता अब आप मुझे ... जानेकी आज्ञा दे तथा अपना कोई चिह्न भी दे दें ॥ ११९ ॥ तब सीताने पिताकी दी हुई चूडामणि शिरके बालाम- ... में निकालकर उनके हाथ में दी और पूर्वम चित्रकूटगिरिका वह ( जयन्त ) का किया हुआ वृतान्त हनुमानको ... सुनाया । तत्पश्चात् रामजीकी संभाको नमस्कार करके हनुमान् मनम सोचने लगे—१२०। १२१॥ ... कि स्वामि का कहा हुआ काम ता कर दिया, पर और भी कुछ करत चलना चाहिए । ऐसा निश्चय करके वे ... जानकी से बोले—॥ १२२ ॥ हे माता ! आज थकावटके साथ बड़ी भूख लगी हुई है । इस वनम अतिशय ... दुर्लभ अति मधुर फलांका समूह लगा हुआ है । १२३ ॥ मैं आपकी आज्ञासे इनक अवश्य खाऊंगा । ... तब तो जानकीने हाथसे उतारकर अपना कंकण उनको दिया और कहा—हे प्लवङ्गम ! यह लो और ... दूर दुकानपरसे य नके ढेर खरीद लो और इसे खाकर जाओ परन्तु इस वनके फल न तोड़ना । ... तब मारुत कहा कि वृक्षोंके वे तोड़े फल मैं नहीं खाता । हे मात ऐसा मेरा व्रत है। आपकी बात ... है मैं ऐसे ही जाता हूँ । जाते हुए मारुतका देखकर सीताने कहा—१२४–१२७॥ हे बालक ! हे ... कयि वनेष कपि ! इस उपवनका अधिपति रावण है । तुम्हारी इतनी शक्ति नहीं है कि तुम उसका अंत ... करक फल कैसे खाओगे ? । १२८ । यह सुनकर मारुतिने जानकीसे कहा कि मेरे हृदयमें 'श्रीराम' ... इस प्रकारक अमोघ शक्ति विद्यमान है ॥ १२९ ॥ रामक प्रभावसे मैं इन सब राक्षसोंको तृणवत समझता हूँ । तब ... जानकीने कहा कि जा फल पृथ्वीपर गिर पड़े हो, ॥ १३० ॥ उनको तुम चुपचाप खा लो, पेड़वरसे न ताड़ना । ... बहुत अच्छा कहकर हनुमान्ने अपनी पूँछमे बाँधकर वृक्षोंको हिलाया ॥ १३१ ॥ वृक्षोको हिलानेसे सब ... अच्छे गिर पड़े । उन्होंने उन सब सुन्दर फलोको क्षणभरम खा लिया ॥ १३२ ॥ फिर हनुमानने उन वृक्षोंको

८८ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

दृष्ट्वा तं दुद्रुवुर्भर्त्तु भाषितुं वनरक्षकाः । राक्षसानागतान् दृष्ट्वा वृक्षान्नोत्पाटयत्कपिः ॥१३५॥ उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् । सीताश्रयतरुं त्यक्त्वा फलं मूलञ्च चक्षाम सः ॥१३६॥ चैत्यं चैत्यप्रासादं हत्वा तद्रक्षकान् सतान् । ततस्ता राक्षसाः सर्वा वनभङ्गं निवेद्य च ॥१३७॥ अपृच्छञ्जानकीं मन्दाः कोऽयं कस्य कुतस्त्विह । ताः सर्वा जानकी प्राह राक्षसाः कामरूपिणः ॥१३८॥ विचरंति मुदा भूम्यां वेद्यन्तं भित्तुमाश्रिताः । तदा हृता पञ्चवट्यां रावणेन हि तडनात् ॥१३९॥ तस्माज्ज्ञेयस्तु युष्माभिः कोऽयं यो पृच्छतेद्य किम्। इति दम्भाद्वचः श्रुत्वा राक्षस्यो भयविह्वलाः ॥१४०॥ दशाननं हि शरणं ययुः शीघ्रं निशाचराः । एतस्मिन्नन्तरे प्रातर्गन्धर्वे कश्चिद्धनम् ॥१४१॥ निरीक्ष्य रावणस्याथ शशंस चकितस्तदा । भुक्तां मंदोदरीं ज्ञात्वा तां हन्तुं खङ्गमाददे ॥१४२॥ तदा निवारितः स्त्रीभिः स्त्रीहत्यां माकरोन्नृपनिः । यदा तृद्धो ददर्श वस्त्रमुक्त्वा गन्त्वा गयगृहम् । १४३॥ अथधौतिद्रितं वीरं खङ्गेन स्वगृहं ययौ । तदा विभीषणः प्रातश्चन्द्रहासमवेक्ष्य वै ॥१४४॥ दृष्ट्वा तां स गवां हन्तुं दुद्रुवे बर्जितामदा । मारिषैर्हन्त्वया भव्य स्त्रीहत्या गर्हिता त्विति ॥१४५॥ विभीषणस्तदारभ्य वधोऽसावममन्यत । एवमामोक्षलक्षणं कौतुकं कपिणा कृतम् ॥१४६॥ अथ वेगेन राक्षस्यः समागम्य दशाननम् । द्रुतं निवेदयामासुः स्वलङ्काया विनाशम् ॥१४७॥ तच्छ्रुत्वा रावणः क्रोधात्कपिनात्पाटितं वनम् । वनपालं समाहूय जम्बुपालिनमब्रवीत् ॥१४८॥ राक्षसैर्नियुतैर्गत्वा कीशं धृत्वा समानय । तथेति स ययौ वेगादशोकवनिकां प्रति ॥१४९॥ दृष्ट्वा सैन्यं दीर्घनादं चकार कपिकुञ्जरः । ततस्ते राक्षसाः सर्वेनिजैरायुधैरैनमभिदुद्रुवुः ॥१५०॥

मूलम् बाँध-बाँधकर गिरा दिया। उन्हें देखकर उस वृक्ष को कपि ने न १३५। उन्हें देखकर सीभार वृक्षके समस्त फल खा लिए। ऐसा करके उन्होंने उस उपवनके सब फलोंको खा डाला ॥ १३६ ॥ यह देखकर वनके रक्षकगण उन्हें पकडने दौडे। वृक्षानुकूल राक्षस का सा बानकर वे हिंसकसे ही दौडना प्रारम्भ कर दिया ॥ १३७ । इस प्रकार क्षणभरमात्र में अशोकवनको पूर्ण नष्ट कर दिया। केवल सीताके आश्रयभूत एक वृक्षको छोड और सब उपवनको उजाड़ डाला ॥ १३८ ... अथवा उड़ान क्योंकि बडे-बडे महलोंको गिरा दिया और उनके रक्षकोंको मार भगाया। राक्षसन जानकिका कपि जानकर सीतासे पूछने लगी कि यह कौन है, किसका दूत है और कहाँसे आया है ? सीता सुन कर कहा कि बहुतसे यथेच्छ रूप धारण करनेवाले राक्षस पृथ्वीपर आनन्दसे घूमा करते हैं। मुझे क्या पता। इस बातका पता मुझे सबसे लगा है, जब पञ्चवटीमें रावण हरण कर मुझे ले आया तब राक्षस ही मुँह छुपा ॥ १३७-१३९ ॥ सो तुम्हीं लोग इसका पता लगाओ कि यह कौन है, मुझसे क्या पूछती हो ? सीताके इस वचन को सुनकर राक्षसि भयसे विह्वल हो गयीं ॥ १४० ॥ यह हाल पूछनेके लिए वे लोग रावणके पास दौडे । इधर प्रातःकालके समय रावण अपनी प्रासाद-शय्यापर कमण्डलु देखकर चकित हो गया । रावणने सोचा कि गयन यहाँ आकर मन्दोदरीका काम है। यह शङ्का करके उसको मारनेके लिए हाथमें तलवार उठायी ॥ १४१॥ १४२॥ तब इसने स्त्रियोंने "स्त्रीको इस प्रकार नहीं मारनी चाहिए" ऐसा कहकर उसको रोका। तब क्रुद्ध रावणने शुद्धरस गयके घर जाकर देखा हाथमें तलवार सम्हारते काट दिया और अपने घर लौटा। उधर विभीषणने प्रातःकाल मदन अपने भाई रावणका महल जाकर तलवार देखा ॥१४४॥ १४५॥ तब वह अपनी स्त्री रम्भाको मारने दौड़ा। तब अनेक स्त्रियोंने उसका हाथ पकड़कर रोका कि तुम वीर होकर स्त्री- हत्या करना, सदा भारी निन्दित कर्म है ॥ १४५॥ तथापि विभीषणने उस दिनसे अपने घरमे इसका जाना छोड़ दिया। इस प्रकार लङ्कामें हनुमान्ने बड़े-बड़े कौतुक दिखाये ॥ १४६॥ उन राक्षसियोंने भी दौड़ते हुए जाकर व्याकुलचित्त रावणको घबराहटके कारण टूटे-फूटे शब्दोंमें अशोकवनके विनाशका सब वृत्तान्त सुनाया ॥ १४७॥ कपिके द्वारा वनभङ्गका समाचार सुनकर क्रुद्ध रावणने उस वनके रक्षक जम्बुमालीको बुलाकर कहा- ॥ १४८॥ तुम लाख हजार राक्षसोंको लेकर जाओ और उस बानरको पकड़ लाओ। 'तथास्तु' कह कर वह शीघ्र अशोकवनमें

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ८९


तत उत्प्लुत्य हनुमान् तोरणेन समन्ततः । निष्पिपेप क्षणादेव मशकानिव यूथपः ॥ १५१॥
हत्वा तान् राक्षसान् सर्व्वास्ततो वेगेन मारुतिः । तालवृक्षं समुत्पाट्य जघान जम्बुमालिनम् ॥ १५२॥
तान् सर्व्वान्निहताञ्छ्रुत्वा पञ्चसेनापतीन्पुनः । रावणः प्रेषयामास हतास्ते तोरणेन च ॥ १५३॥
वायुपुत्रेण वेगेन लक्षराक्षससंयुताः । स तानापे मृताञ्छ्रुत्वाऽक्षं पुत्रं प्रेषयदत्तदा ॥ १५४॥
कपिना मारितः सोऽपि मर्सन्द्यो मुद्गरेण च । ततः स प्रेषयामास पुत्रमिन्द्रजितं पुनः ॥ १५५॥
ततः स रथमारूढः कोटिराक्षसवेष्टितः । युद्धं चकार कपिना शस्त्रैरस्त्रैः सुदुश्चरैः ॥ १५६॥
तदा पुच्छेन संवेष्ट्य कृत्वा प्राकारमुन्नतम् । निष्पिपेषाथ तोरणेन राक्षसान्मारुतिः क्षणात् १५७॥
ततो वृक्षं समुत्पाट्य मेघनादमताडयत् । वृक्षेण भिन्नसर्व्वाङ्गो मेघनादोऽविशद्गुहाम् ॥ १५८॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा प्रार्थयामास मारुतिम् । ब्रह्म त्वं मानयन्वेऽद्य त्वं लङ्कां याहि रावणम् । १५९॥
तथेत्यङ्गीचकारामौ मेघनादं ययौ विधिः विधिः प्राह मेघनादं क्व गतोऽद्य पराक्रमः । १६०॥
गच्छ मेऽस्त्रेण तं बद्ध्वा पितुरग्रे ममानय स ब्रह्मवचनं श्रुत्वा मेघनादः पुनर्ययौ । १६१॥
ब्रह्मास्त्रेणाथ बद्ध्वा समानयामास रावणम् । ततो रावणवाक्येन प्रहस्तः प्राह मारुतिम् १६२।
कस्त्वं कुतः समायातः प्रेषितः केन वा वद । ततः स रामवृत्तं हि कथयामास विस्तरात् ॥
ततस्तं बोधयामास रावणं वायुनन्दनः । १६३॥
विमुच्य मौर्थ्याद्धृदि शत्रुभावनां भजस्व रामं शरणागतप्रियम् ।
सीतां पुरस्कृत्य सपुत्रबान्धवो रामं नमस्कृत्य विमुच्यसे भयात् ॥ १६४॥
यादन्तगाभाः कपयो महाबला हरिंद्रतुल्या नखदंष्ट्रयोधिनः ।


गया । १४९ ॥ उसकी सेनाको देखकर कपिशिरोमणि कुञ्जर (हाथी) के समान वीर हनुमान् बहुत जोरसे गर्जन किया तब राक्षसोंने बाणोन्मत्त हनुमान्का अभ्यास मारना आरब्ध कर दिया ॥ १५० ॥ हनुमान् भी रणमें कूद पडे और समूहके समूह उन सेनापतियों तथा राक्षसोंको धारा राक्षस तारणके द्वारा क्षणभरमें पीस डाला । १५१ ॥ उन सबको मारनेके बाद मारुतिने वेगसे एक ताड़का वृक्ष उठा डकर उससे जम्बुमालीको समाप्त कर दिया ॥ १५२ ॥ उन सबको मार गये सुनकर रावणने पाँच और सेनापतियोंको भेजा हनुमान्ने तोरण मारकर से उन्हें भी मार डाला । १५३ । वायुपुत्र हनुमान्ने लाखा राक्षसके साथ उन पाँच सेनापतियोंको भी मार डाला, यह सुनकर रावणने अपने अक्षयनामक पुत्रको भेजा ॥ १५४ ॥ तब हनुमान्ने उसको भी मुद्गरसे मार डाला । अब रावणने अपने इन्द्रीजंत सुत मेघनादको भेजा । १५५ । वह एक करोड़ राक्षसस वेष्टित बनाया रथपर सवार होकर वहाँ आया। वह अपने दुर्धर्ष शस्त्रास्त्रोंसे हनुमान्के साथ युद्ध करने लगा ॥ १५६ ॥ हनुमान्ने उनको रोककर फिर अपनी पूंछका ही गढ़ बनाया और तोरणसे उन सबका क्षणभरमें पीस डाला ॥ १५७ ॥ बादमें एक वृक्ष उखाड़कर उससे मेघनादको मारा। जिससे घायल होकर वह एक गुफामें जा घुसा ॥ १५८ ॥ उस समय ब्रह्माने हनुमान्स प्रार्थना की कि तुम मेरे ब्रह्मास्त्र ब्रह्मपाश, का मान रक्खो और उसमं बंधकर लंकाम रावणके पास जाओ । १५९ ॥ उन्होने तथास्तु कहकर अङ्गीकार कर लिया । तब ब्रह्मा मेघनादके पास गये और कहा- हे मेघनाद ! तुम्हारा पराक्रम आज कहाँ चला गया ? ॥ १६० ॥ इस मेधास्त्रसे उन बानरको बाँधकर अपने पिताके पास ले जाओ ब्रह्माके बचनको सुनकर मेघनाद फिर वहाँ गया और हनुमान्को ब्रह्मास्त्रसे बाँधकर रावणके पास ले आया, तब रावणके कथनानुसार प्रहस्त उनसे पूछने लगा - । १६१ ।। १६२ .. बतला तू कौन है, कहाँसे आया है और तुझे किसने भेजा है ? तब विश्वास्स रामका वृत्तान्त सुनाकर हनुमान् रावणको समझाने लगे- । १६३ । आ रावण ! मूर्खतासे प्राप्त शत्रुभावको तू हृदयसे निकाल दे और शरणागतोंके प्रिय रामका भजन कर । यदि स ताको आगे करके पुत्र तथा बान्धवोंके साथ जाकर रामको नमस्कार करेगा तो तू निर्भय हो जायगा ॥ १६४ ॥ सिंहके समान महाबलवान्

९०आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

लङ्कां समाक्रम्य विधास्यति ने तावद्द्रुतं देहि रघूत्तमाय ताम् ॥१६५॥ जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं सुरैर्हरैर्वापि शंकरेण । न देवराजांकगतो न मृत्योः पाताळलोकानपि संप्रविष्टः ॥१६६॥ शुभं हितं पवित्रं च वायुपुत्रवचः खलः। प्रतिजग्राह नैवादौ म्रियमाण इवौषधम् ॥१६७॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा मारुतं प्राह रावणः। विनिर्जिता येन देवास्तस्य मे पौरुषं त्वया ॥१६८॥ न दृष्टं ह्यतस्ते व्यर्थं शृणु किंचिद्वदामि ते। पञ्चाङ्गपाठकश्चायं पश्य ब्रह्मा कृतो मया ॥१६९॥ प्रतीहारस्त्वयं सूर्यः शशी छत्रधरः कृतः। वरुणोऽयं जलप्रदो मार्जकः पवनस्त्विह ॥१७०॥ अग्निः कृतोऽयं रजको मालाकारः शचीपतिः। दण्डपाणिर्विधात्र दास्यश्चात्र सुरस्त्रियः ॥१७१॥ मार्तण्डो नापितश्चायं गणपः सूपनायकः। मङ्गलाद्या ग्रहाः सन् मे सोपानायतनामने ॥१७२॥ शिशुमेवान्तरेण षष्ठी देवी मया कृता आन्दोलितश्च कैलासः कुबेरोऽपि विनिर्जितः ॥१७३॥ कथं ममाग्रे विलपस्यभीतवत्स गतासामवमानि दूषको । क एष रामः कतमो वनेचरो निहन्मि मूत्रांश्चत नगरम् ॥१७४॥ इत्युक्त्वा ह्यसमुत्तस्थौ दशान्यः सभास्थितः। तदा निवारयामास रावणं च विभीषणः ॥१७५॥ परदूतो न हन्तव्य इत्यादिरचनैर्मन्दी। ततः क्रोधसमाविष्टो रावणो लोकरावणः ॥१७६॥ दूतानाज्ञापयामास छेदनीयं तु लांगूलम्। तद्रावणवचः श्रुत्वा राक्षसास्ते सहस्रशः ॥१७७॥ स्वायुधैश्छेदयामासुः कुठारक्रकचादिभिः। आयुधान्येव खण्डाःपुच्छचालनमात्रतः। ॥१७८॥ बभूवुः सुप्रचूर्णानि तस्य रोम्णोऽपि न व्यथा। तन्निस्वा दशान्यः सन्म,रुतिं वाक्यमव्रवीत् ॥१७९॥ न धीरा गोपयन्त्यत्र स्वांय मृत्युमपि क्वचित्। अतस्त्वं वद पुच्छस्य येन वानोड्य ते भवेत् ॥१८०॥

और तबके तथा होतेको लक्ष्मणवान् वानर आकर लंकाको दग्ध न करदे, तबतक उस सीताको ले जाकर रामको दे दे ॥ १६५ ॥ अब तुम राम जीवित नहीं छूटेगा। चाहे हरि रक्षा करेंगे, चाहे शंकर करें, चाहे तू अपना प्राण बचानेके लिये देवराजकी शरणमें जा, चाहे यमराज या पाताललोकमें जाकर छिप, चाहे कुछ कर ले ॥ १६६ ॥ किन्तु उस दुष्ट रावणने हनुमान्‌की शुभ हितकारिणी बात उस प्रकार नहीं मानी । जैसे मुमूर्षु पुरुष औषधि नहीं खाता । १६७ ॥ रावणने हनुमान्‌को बात सुनकर कहा कि मैने सब देवताओंको जीत लिया है । मेरे पुरुषार्थको तू नहीं जानता । इसलिये व्यर्थ बकवास कर रहा है, सुन मैं तुझ कुछ सुनाता हूँ । देख, ब्रह्माको मैंने पञ्चाङ्गपाठक बना दिया है ॥ १६८ ॥ १६९ । सूर्यको द्वारपाल, चन्द्रमाको छत्रधारी, वरुण को जल भरनेवाला, पवनको झाडू लगानेवाला, अग्निको धोबी, शचीपति इंद्रको माली, दण्डपाणि यमराजको द्वारपाल देवताओंकी स्त्रियोंको दासियां, मार्तण्डको नाई, गणपतिजीको पाकशालाध्यक्ष और मंगल-बुध आदि सातों ग्रहोंको मैंने अपने आसनकी सीढियां बना लिया है षष्ठी देवी सन्तानको मैंने बच्चोंकी मुख्यमेवाली धाई बनाया है। कैलासको मैंने ही हिलाया था। कुबेरको भी जीत लिया है । १७०-१७३॥ हे प्लवङ्गाधमे अधम वानर ! तू मेरे आगे क्यों वृथा प्रलाप करता है ? तू बड़ा ही गर्व दिखाता है। अरे ! वनवासी राम मेरे सामने क्या चीज है । मनुष्यमें नाम मात्रका भी मूत्रांश नगरके में मार डालूँगा ॥ १७४ ॥ इतना कहकर दशानन रावण बाज समान उनको मारने दौड़ा । तब विभीषणने समझा बुझाकर कहा कि विचारके दूतको मारना अन्याय है । पश्चात् क्रोधके वशमें आकर रावणने लोक रावण विभीषणको आज्ञा दी कि इस वानरकी पूंछ काट डालो । रावणकी आज्ञा पाकर हजारों राक्षस अस्त्र-शस्त्र युक्तहो और क्रकच ( आरा ) आदि हथियारोंसे उनका पूंछ काटने लगे । इसी समय हनुमान्जीने अंदर अपनी पूंछ हिला दी। उनके हिलनमात्रस उन हथियारोंके सैंकड़ों टुकड़े होकर गिर पड़े। १८० तक चूर्ण-चूर हो गये परन्तु हनुमानजीका बाल भी बाँका नहीं हुआ। यह देखकर दशानन मारुतिस कहने लगा- ॥ १७९ ॥ धीर पुरुष अपनी मृत्युके उपायको भी छिपाकर नहीं रखते। इसलिये साफ-साफ बता दे कि तेरी पूँछ किस उपायस नष्ट होगा ॥१८०॥

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९१


तदाऽपरत्वं स्वं प्राह कपिस्तन्नच मर्षित मः । मन्वा दशास्यस्तं प्राह पुनः सत्यं वदेति च ॥१८१॥
तदा स मारुतिस्तूष्णीं क्षणं चित्ते व्यचिन्तयत् । ममितुश्च सखा वह्निस्तस्मान्नास्ति भयं मम ॥१८२॥
तस्मात्पुच्छं दीपयित्वा लंकां दग्ध्वाऽऽगमेष्यहम्। ततस्तं रावणं प्राह मारुतिः सदसि स्थितः ॥१८३॥
पुच्छं मे वह्निना दाघं भविष्यति न चान्यतः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रावणो निजकिंकरान् ॥१८४॥
आज्ञापयामास पुच्छं दीपयित्वा प्रयत्नतः। लङ्कायां दर्शनीयोऽयं दुष्टेनं मद्भयं भवेत् ॥१८५॥
सर्वेषां मद्रिपूणां च तथा चक्रुस्त्वराऽन्विताः। तैलाक्तैः क्षणपट्टैश्च राक्षसा वसनैरपि ॥१८६॥
पुच्छं सवेष्टयामासुस्तदा पुच्छं व्यवर्द्धत । ततो वसनहर्तारस्त्वकोशान्विलुलुञ्च्य च ॥१८७॥
तत्पुच्छं देत्यः मानुगृहवस्त्रैरनेकशः । ततः पुरूषनारीणां लंकास्थानां नृपाज्ञया । १८८॥
बलादाच्छिद्य वस्त्राणि चक्रुः सर्वांन्दिगम्बरान् ततः शय्यामडर्याश्च कञ्चुकीः कञ्चुकानपि ॥१८९॥
पौराणां गजगेहानां च ने वस्त्राणि ममंनयन। दृष्ट्वाऽपूनिन्तु पुच्छस्य सभास्थानां नृपस्य च ॥१९०॥
वस्त्रमात्रैः समम्तैश्च लांगूलं वेष्टयस्तदा । ध्वजोल्लासपताकाभिश्चित्रित्राणां वसनैरपि ॥१९१॥
मंदोदर्यादिवर्सैश्च भिक्षूणां वसनादिभिः । वेष्टयन्कविलांगूलं ततः सीतां ययुश्चराः ॥१९२॥
तज्ज्ञात्वा मारुतिश्चापि पुच्छवृद्धिं न्यदर्शयत् । तदा कोलाहलश्चासीद्वस्त्रार्थे प्रतिमन्दिरि ॥१९३॥
तैलार्थं च घृतार्थे च स्नेहपाशं समंनयन् । नश्रीणिग्योर्दी पार्थं किंचूनामपि नो वृतम् ॥१९४॥
आमन्त्रीपुरूषा नया लज्जा नामीत्परस्परम् । ततस्तद्दीपयामासुर्व दना भक्तकपनेः ॥१९५॥
प्रदीपं नाभ्यागच्छत ततो मारुतिरब्रवीद् यदा स्वोन्मुखेनायं लज्जमानोऽद्य रावणः ॥१९६॥
वह्निं प्रज्वालयदत्र तदा ज्वाला भविष्यति । तन्मारुतिवचः श्रुत्वा ययवग्रे दशाननः ॥१९७॥
शाश्रुकम्कायवदनं तत्पुच्छमनलन्मने । तावर्त्ताच्छा जटाः श्मश्रुकूर्चा दस्थानदऽभवन् ॥१९८॥


इसपर जब हनुमान्ने अपना उत्तर बतलाया तब भी बालक मान न मानकर रावणने फिरसे कहा कि सच-सच बतला ॥ १८१ ॥ तब मारुति मनमे विचारने लगे कि अग्नि मेर पिताके मित्र हैं इसलिये मुझे उनका कोई बात नहीं है ॥ १८२ ॥ इसलिये अपनी पूँछ जलवाकर मैं लङ्काको ही जला डालूँगा । यह विचारकर सभामें स्थित रावणसे हनुमान्ने कहा- ॥ १८३ ॥ मेरी पूँछ अग्निसे जल सकती है, यह पक्की बात है यह सुनकर रावणने अपने नौकरोंको बुलाकर आज्ञा दी कि प्रयत्नपूर्वक इसकी पूँछ जलाकर इसे नगरभरम घुमाकर दिखला दो । जिससे कि समस्त शत्रुओंको मेरा डर लगन लगे । नौकरोंने भी वैसा ही किया और शीघ्र ही राक्षसमान सन तथा वस्त्राका तेलमे भिगोकर पूँछपर लपट दिया । वसन जब कुछ कम पड गये, तब बाजारके गोदामोंसे कपडे चुराकर धाक समय लाकर और राजाका आज्ञासे उन्होंने लङ्का- क नर नारियोंके वस्त्र छीनकर हनुमान्की पूँछम लपेटा ऐसा करके उन्होने सारे नगरके लोगोंको नंगा कर दिया । तथापि जब पूँछ नहीं ढंका ता शय्याके मुख्य ( मसहरी ) कंचुकयाक चोगे, पुरवासियो तथा राजाके हाथीक वस्त्र लाकर लपेट दिये । तिसपर भी जब पूरा नहीं पडा ता सभासदों तथा राजाके वस्त्र लाकर लपट दिये गये । ध्वजाएँ तथा पताकाएँ लाकर लपेटी गयीं। रानी मन्दोदरी, स धु-महात्माओ तथा भिक्षुओंके वस्त्र उतार-उतारकर लपट दिये और सीताकी भी साड़ी उतारनेके लिए कुछ दूत दौड़े ॥ १८४-१९२ ॥ यह देखकर हनुमान्ने पूँछ बढ़ाना बन्द कर दिया। तब प्रत्येक घरमे तेल आदिके लिए कोलाहल होने लगा । वे दैत्य सबके यहाँका घी तथ तैल उठा लाये । यहाँ तक कि किसी घरमें दीपकके लिए तेल और बत्तीके लिए भी घी नहीं बच पाया । १६३॥१९४॥ समस्त स्त्री-पुरुषोंको लज्जा छोड़कर नङ्गा होना पड़ा। इसके बाद हनुमान्की पूँछ चौतरफे बाँधकर अग्निके द्वारा जलाने लगे ॥ १९५ ॥ परन्तु अग्नि प्रदीप्त नहीं हुई उस समय हनुमान्ने कहा कि यदि लज्जित रावण स्वयं अपने मुखसे फूंककर जलाये तो अग्नि जल सकती है। हनुमान्की बात सुनकर रावण तुरन्त आगे बढ़ा । १९६ ॥ १९७ ॥ ज्यो ही उसने अपने मुखसे फूँकना प्रारम्भ किया, ज्यों ही उसके सिरोके बाल तथा दाढ़ी मूँछ जल गयी ॥१९८॥ रावण जब अपने

९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ९


तदा विंशद्भुजैः स्वांसमुखोपरि दशाननः। ताडयद्वह्नि शांत्यर्थं जहसू राक्षसास्तदा ॥१९९। हास्यं चकार हनुमान्सदा क्रुद्धः स रावणः। नीयतां मर्कटश्चायमिति दूतान्वचोऽब्रवीत् ॥२००। ततो दूताः कपिं निष्ठुर्लङ्कायां ते समंततः। शृंखलाभिर्दृढं बद्ध्वा भ्रामयामासुगुद्गतान् ॥२०१॥ वाद्यघोषैर्दीर्घशब्दैर्वेष्टितं शस्त्रधारिभिः। एवं दिवा सर्वलङ्कां दृष्ट्वैषां स मारुतिः ॥२०२॥ धृत्वाऽतिसूक्ष्मरूपं तु दृढबंधविनिर्गतः। यथास्थानं ब्रह्मणोऽस्त्रं तद्ययौ पूर्वमेव हि ॥२०३॥ ततः पश्चिमदिक्संस्थं लंकाद्वारं समाययौ। निष्कास्य तोरणं द्वाराज्जघान द्वाररक्षकान् ॥२०४॥ हत्वा स्वरक्षकांश्चापि प्रासादेषु समंततः। ददावग्निं स्वपुच्छेन लङ्कां दग्धां चकार सः। २०५। तदा कोलाहलश्चासीन्लंकायाः प्रतिमन्दिरे। निद्रितानपि बालांश्च त्यक्त्वा नार्यो गृहाद्बहिः। २०६। दुद्रुवुः प्राणरक्षार्थं दग्धवस्त्रकचास्तदा क्रमेण रावणादीनां प्रासादान् ज्वालयन कपिः। २०७॥ तां रावणसभां दग्ध्वा जनान् पुच्छेन ताडयन्। अभवन् राक्षसा दग्धा मुंचन्नादान्ति चक्रिरे ॥२०८॥ तदा स रावणः क्रुद्धो राक्षसैर्दशकोटिभिः। ययौ योद्धुं स मरुतिना तान् सर्वान् कोरणेन सः २०९॥ घातयामास पुच्छेन बद्ध्वा चैकत्र कोटिशः। तथैव लीलया पुच्छं रावणस्य च मस्तके ॥२१०॥ मंत्वाद्य त्वक्त्वचं दग्धामकरोन्मारुतिः क्षणात्। तन्पुच्छवह्निना दग्धो मूर्च्छितोऽभूद्दशाननः ॥२११। कपिः श्रीरामकीर्त्यर्थं रावणं न जघान सः। पतितं पितरं दृष्ट्वा दग्ध्वा रक्षांस्त्वगक्षयान्। २१२॥ आत्मनः प्राणरक्षार्थमिंद्रजिद्विवरं ययौ। कपिलक्ष्मणप्रीत्यर्थं मेघनादं जघान न ॥२१३। एवं सर्वांन्निशिनिर्जित्य गोपुरट्टालमंडिताम्। दग्ध्वा लङ्कां सविस्तारां ययौ भानामृनन्दनम् ॥२१४॥


बीसो हाथोंसे आग बुझानेके लिए अपने मुखोंपर थप्पड़ मारने लगा। तब राक्षस जोरोंसे खिलखिलाकर हँस पड़े॥ १९९॥ हनुमान् भी हँसने लगे। यह देखकर रावण बड़ा क्रुद्ध हुआ और आज्ञा दी कि इस दुष्ट वानरको पकड़ ले आओ॥ २००॥ तब दूत लोग हनुमान्‌को बड़ी मज़बूत सांकलीसे बाँधकर ले गये और नगरमें चारों ओर घुमाया॥ २०१॥ घुमाते समय उनके साथ बड़े बड़े वाजे बज रहे थे। बहुतसे बालक तथा शस्त्रधारी लोग उनको घेरे हुए थे। इस प्रकार दिनमें सारी लंका देखकर सायकालके समय हनुमान् सूक्ष्म रूप धारण करके झटपट बन्धनमेंसे निकल गये और कूदकर दरवाज़ेपर जा बैठे। उसके पूर्व ही ब्रह्मापाश भी अपने स्थानपर लौट गया॥ २०२॥ २०३॥ वहींसे चलकर वे पश्चिमी द्वारपर गये। वहाँ फाटकका खम्भा उखाड़कर उससे समस्त द्वारपालोंको मार डाला॥ २०४॥ अनेक रक्षक राक्षसोंको भी मार गिराया और अपना पूँछकी अग्निसे सब महलोंमें आग लगाकर सारी लंकाको जला दिया॥ २०५॥ उस समय लंकाके प्रत्येक घरमें बड़ा भारी कोलाहल होने लगा। स्त्रियां अपने बालकोंको सोते हुए छोड़कर ही घरोंसे बाहर निकल पड़ीं॥ २०६॥ उनके वस्त्रों तथा बालोंमे आग लगी हुई थी और वे अपने प्राण बचानेके लिए इधर-उधर भागने लगीं। हनुमान्‌ने क्रमशः आगे जाकर रावणके महलोंमें भी आग लगा दी! २०७॥ रावणकी सभाको जलाकर ब्लॉक राक्षसोंको अपनी पूँछसे खूब पीटा और सब राक्षस जलने तथा अनेक प्रकारके शब्द करके चिल्लाने लगे॥ २०८॥ तब रावण क्रुद्ध हो दस करोड़ राक्षसोंको साथ लेकर हनुमान्‌से लड़नेके लिए गया। हनुमान्‌ने उन सबको उसी लहिंके कशेसे मार डाला और करोड़ोंको एक साथ पूँछमे बाँधकर लीलापूर्वक रावणके सिरपर दे मारा॥ २०९॥ २१०॥ इस प्रकार मारनेसे उसकी चमड़ी क्षणभरमें जल उठी। उनकी पूँछकी अग्निमे जलकर दशानन मूर्च्छित हो गया॥ २११॥ परन्तु हनुमान्‌ने यह सोचकर उसको जानसे नहीं मारा कि यदि रामके हाथसे मारा जायगा तो उनका यश बढ़ेगा। पिताको गिरा हुआ तथा अपने राक्षसोंको जलते देख इन्द्रजीत मेघनाद अपने प्राणोंकी रक्षाके लिए एक गुफामें घुस गया। हनुमान्‌ने लक्ष्मणकी प्रसन्नताके लिए उसको भी जीवित छोड़ दिया-मारा नहीं॥ २१२॥ २१३॥ इस तरह सबको जीत तथा पुरद्वार और अटारियोंसे मंडित विशाल लंकाको जलाकर हनुमान् उसम

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९३

तटे पुच्छं स्थापयित्वा जलजन्तूरहंश्च कपिः। तत्तन्वैः शीतलं स्वं कृत्वा लाङ्गूलमुत्तमम् ॥२१५॥ निजकण्ठाच्च धृत्येण श्लैष्मणं साम्प्रडेऽक्षिपत्। ततः कपिः क्षणं तूष्णीं स्थित्वा सतीं विचिन्त्य च२१६ पाहयत्त्वाममं हृदये मत्वा दग्धां विदेहजाम् । आत्मानं गर्हयामास स्थित्वा सागररोधसि ॥२१७॥ धिग्विधुग्मां वानरं मूढं स्वामिपन्त्याश्च दाहकम्। निश्चयेन मया दग्धा जानकी रामतोषदा ॥२१८॥ न विचारः कृतः पूर्वं लङ्कादाहेऽविवेकितः। आत्मघातं करिष्याद्य पुच्छबन्धेन चात्र वै ॥२१९॥ किं रामयोरजं स्वास्यं दर्शयेऽद्य विगर्हितम्। रामस्तु श्रुत्वा सीताया वृत्तं शीघ्रं मरिष्यति ॥२२०॥ तद्दुःखेन स सौमित्रिर्मरिष्यति न संशयः। तयोर्दुःखेन सुग्रीवश्चदग्ने हा च वै रुषा ॥२२१॥ तं श्रुत्वा सोऽङ्गदश्चापि मरिष्यत्यभिलालितः। ताराऽपि पुत्रशोकेन नूरो नष्टेऽथ वानराः ॥२२२॥ प्राप्ते पंचदशे वर्षे मग्नोऽपि मरिष्यति। रामदुःखेन कौसल्या सुमित्रा पुत्रदुःखतः ॥२२३॥ सथा मा कैकेयी दुष्टा सबानर्थकरी तु या। शत्रुघ्नो बधूदुःखेन रामार्थे मुनयश्च ते ॥२२४॥ राघवा रामभक्ताश्च मत्रिणः सुहृदस्तथा। सीतापितुः कुल सर्वं कौसल्याः पितुः कुलम् । २२५॥ सुमित्रायाश्च कैकेय्यास्तेषां सबन्धनस्तथा। नष्टे राजकुले जाते प्रजा स्वच्छन्दानुवर्तिना ॥२२६। मरिष्यति न सन्देहस्ततः स्थावरजङ्गमम्। भूमिस्थाः प्राणिनः सर्वे यदा नष्टास्तदा दिवि॥२२७॥ हव्यकव्यविहीनास्त देवा नाशं गता इव। अकाले प्रलयं दृष्ट्वा नष्टां सृष्टिं स्वनिर्मिताम् ॥२२८॥ पश्चात्तापेन धाताऽपि मरिष्यति न संशयः। एवं क्रमेण ब्रह्माण्डं नक्ष्यत्येव न संशयः ॥२२९॥ एतदानिमित्तोऽहं विधिना निर्मितः पुरा। इत्युक्तवान खेदेन देहत्यागार्थमुद्यतम् ॥२३०॥ दृष्ट्वा माऽऽकाशलक्ष्मी वाणी बभूव बहुहर्षदा। मा कुरुष्व कपे खेदं न दग्धा जानकी शुभा ॥२३१॥


सागरके किनार गये ॥२१४॥ वही बैठकर पुच्छके बडे भागको किनारेपर रखकर जलजन्तुओके बचाते हुए हनुमान् समुद्रकी तरङ्गोमे अपनेको दर्द तथा उत्तम पुच्छको शीतल किया ॥२१५॥ वहीं उन्होंने धूऐंसे उत्पन्न श्रम कफका भी त्याग किया। तदनन्तर वे क्षणभर शान्त रहे। बादमे वे सीताका सोच तथा उनको जल गयी समझकर जोर-जोरसे छाती पीटने लगे। समुद्रतटपर खडे होकर उन्होने अपनी निन्दा की ॥२१६॥ २१७॥ स्वामीकी स्त्री सीताका जलानेवाला मुझ सरीखा मूख वानरको बारम्बार धिक्कार है। रामको संतोष देनेवाली जानकीको मैने आगमे जला दिया ॥२१८॥ अविवेकी मैने लङ्का जलानेसे पहिले यह विचार नहीं किया । अब मै अलग पूंछ बाँधकर आत्महत्या कर लूँगा ॥२१९॥ मैं अब अपने इस निन्दित मुखको कैसे दिखाऊँगा। राम सीताका यह हाल सुनते ही प्राण त्याग देंगे। २२०॥ उनके दुःखसे दुःखित सुमित्रापुत्र लक्ष्मण भी अवश्य मर जावेंगे। उन दोनोके दुःखसे सुग्रीव और सुग्रीवके दुःखसे उनका स्त्री रूमा भी प्राण त्याग देगी ॥२२१॥ यह समाचार सुननेके साथ ही अत्यन्त प्यारसे पला हुआ अङ्गद भी प्राण छोड़ देगा। तब पुत्रशोकसे तारा और राजाके वियोगसे सब वानर भी प्राण दे देंगे ॥२२२॥ १५पन्द्रह वर्ष बीत जानेपर भरत भी मर जावेंगे। रामके वियोगसे कौसल्या पुत्रवियोगसे सुमित्रा तथा भरतके वियोगसे वह अनर्थकारिणी तथा दुष्टा कैकेयी भी मर जायगी। भाईके दुःखस शत्रुघ्न, रामके दुःखसे मुनिलोग एवं रघुकुलणी रामके भक्त मन्त्रिजम तथा मित्रवर्ग भी प्राण दे देंगे। सीताके पिता जनकका कुल, कौसल्याके पिताका कुल, सुमित्राके पिताका कुल कैकेयीके पिताका कुल तथा उनके भी सारे सम्बन्धी लोग प्राण त्याग देंगे। राजकुल नष्ट हो जानेपर प्रजा स्वेच्छाचारिणी हो जायगी ॥२२३-२२६॥ तब वह निःसन्देह स्थावर जङ्गम सभी प्राणियोंका नाश करने लगेगा। जब पृथ्वोपर सब प्राणी मार डाले जायेंगे। तब स्वर्गलोकवासी देवता और पितर भी हव्यकव्यस रहित होकर मृतक सरीखे हो जायेंगे। असमयका प्रलय तथा अपनी रची सृष्टिका विनाश देखकर पश्चात्तापसे निःसन्देह विधाता भी मर जायगा। इस प्रकार क्रमशः समस्त ब्रह्माण्ड ही नष्ट हो जायगा। इसमें सन्देह नहीं है। २२७-२२६॥ ब्रह्माजीने इसके विनाशका कारण मुझे ही बनाया। हनुमान् ऐसा खेदपूर्वक कहने लगे और मरनेके लिए उद्यत हो गये । २३०॥ उसी समय यह आनन्ददायिनी आकाशवाणी हुई कि हे

९४आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

आत्मानं दर्शयित्वा तां शीघ्रं गच्छ गृहं प्रति । तां वाणीं हनुमाञ्छ्रुत्वा बभूव हर्षपूरितः ॥२३२॥ द्रुतं तां जानकीं दृष्टुमशोकवनिकां ययौ । तावद्ददर्श लङ्कायां सुवर्णवेष्टितां भुवम् ॥२३३॥ तत्कारणं वदाम्यद्य तच्छृणुष्व शिरोध्वजे । अस्तीद्रिशिखरे देवि त्रिकूट इति विश्रुतः ॥२३४॥ क्षीरोदेनावृतः श्रीमान्योजनायुतमुच्छ्रितः। तावन्न विस्तीर्णः पर्यंक त्रिभिः शृङ्गैः पयोनिधिम् २३५ दिशः खं रोधयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः । तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः ॥२३६॥ उद्यानमृतुमन्नाम आक्रोडं सुरयोषिताम् । तस्मिन्सरः सुविपुलं लसत्कांचनपंकजम् ॥२३७॥ कुमुदोत्पलगह्वारशतपत्रशियोर्जितम् । नैतत्कथंञ्चा पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ॥२३८॥ तस्मिन्सरसि दुष्टात्मा विरूपोऽभूज्जलाशयः । सामोऽभूद्ग्राहो गजेन्द्राणां दुराधर्षो महाबलः ॥२३९॥ अथ दंतोज्ज्वलमुखः कदाचिद्गजयूथपः । आजगाम तृषाक्रान्तः करेणुपरिवारितः ॥२४०॥ तृषितः पानकामोऽभूदवतीर्णश्च तत्र सरः । पिवतस्तस्य ततोयं ग्राहस्तमुपपद्यत ॥२४१॥ सुलीनः पंकजवृते यूथमुख्यतरः करी। गृहीतस्तेन नेत्रैव ग्राहणातिकलीयसा ।। गजो चाकर्षते तीरं ग्राह माकर्षते जलम् ॥२४२॥ पश्यन्तीनां करेणूनां क्रोशन्तीनां सुदारुणम् । नीयते पंकजवने ग्राहेणान्वक्तमूर्तिना ॥२४३॥ तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं सरसा बलीयसा। विचुक्रुशुर्दीनाभयोऽपरे गजाः पार्थिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥२४४॥ तयोर्युद्धमभूद्घोरं दिव्यवर्षसहस्रकम् । दारुणैः सवतः पार्थिनिष्प्रयत्नगतिः कृतः ॥२४५॥ वेप्यमानः सुपीरंस्तु पार्थनामैर्दढैस्तथा । विस्फूर्जितमहाशक्तिर्भक्तश्च महाबवान् ॥२४६॥

कपिश्रेष्ठ ! खेद न करो । कल्याणकारिणी जानक.जी यहाँ नहीं हैं ॥ २३१ ॥ उनसे मिलकर तुम शीघ्र रघुवृद्ध रामके पास जाओ। उस गगनवाणीको सुनकर हनुमान् बहुत प्रसन्न हुए ॥ २३२ ॥ वे जानकीको देखनेके लिए शीघ्र अशोकवनमें गये। वहाँ जाकर हनुमान्ने कुछ सुवर्णवेष्टित धरती देखी ॥ २३३ ॥ हे गिरीन्द्रजे ! उसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो-हे देवि ! त्रिकूट नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ पर्वत था ॥ २३४ ॥ वह चारों ओर क्षीरसागरसे घिरा हुआ सुन्दर आभूषण तथा दस हजार योजन ऊँचा था। वह उतना ही गहराई में भी था। वह चाँदी, लोह और मानिक तीन शिखरोंसे दसों दिशाओं तथा आकाशका व्याप्त किए हुए था। उसके एक भागमें महात्मा भगवान् वरुणका ऋतुमान् नामक दवस्त्रियोंका क्रीड़ास्थान एवं उद्यान था। उसमें विशाल सुवर्णकमलोंसे सुशोभित एक तालाब था ॥ २३५-२३७ ॥ जो कि कुईयां, लाल कमल श्वेत कमल तथा काष्ठपद्म जैसे कमलोंसे अतीव सुन्दर प्रतीत होता था। उसको कुत्सित, क्रूर और नास्तिक लोग नहीं देख सकते थे ॥ २३८ ॥ उसी जलाशयमें छिपा हुआ महाबलवान्, बड़ा कठिनाईसे पकड़ा जानेवाला तथा गजेन्द्रोंको भी त्रास देनेवाला एक दुष्ट मगरमच्छ रहता था ॥ २३९ ॥ किसी समय श्वेत दांत तथा श्वेत मुखवाला गजोंमे मुख्य एक गजराज प्याससे व्याकुल होकर हथिनियांस घिरा हुआ वहाँ आया ॥ २४० । वह पानी पीनेकी इच्छासे ज्यों ही पानीमं उतरा और पानी पीने लगा त्यो ही ग्राह उसके पास आ पहुँचा ॥ २४१॥ कमलवनसे ढके हुए हाथियोंके मुख्यके चरण स्थित उस हथियोको उस भयानक तथा अति बलवान् ग्राहने पकड़ लिया ॥ २४२॥ अब वह हाथी ग्राहको तीरकी ओर खींचत रहा। उसके माथकी हथिनियाँ देखती और दुखसे चिल्लाती ही रह गई और जलमें छिपा हुआ ग्राह हाथीको कमलके बनमें दूर खींच ले गया ॥२४३॥ जब घबराये हुए उस यूथपति गजको ग्राह अनूकूल बेगसे जलमें खींच रहा था, तब हथिनियों बलीन मुखसे क्रन्दन करने लगीं और दूसरे तथा पीछे रहनेवाले हाथी दीन होकर चिल्लाने लगे, पर कोई उसे बचा नहीं सका ॥ २४४ ॥ उस गज तथा ग्राह दोनोंमें देवताओंके हजार वर्ष तक घोर युद्ध होता रहा। अन्तमें गजराज जैसे दन्तपाश तथा अति भयानक एवं दृढ़ नागपाशमें बँधकर सर्वथा असमर्थ हो गया। तब उस्कण्ठ वर्ष तथा महाशक्तिसम्पन्न होता हुआ भी वह गजराज चिल्लाने लगा महाम् चीत्कार

सर्गः ९] सारकाण्डम् ९५


व्यथितः स निरुत्साहो गृहीतो घोरकर्मणा । परामापदमापन्नो मनसाऽचिन्तयद्धरिम् ॥ २४७ ॥
एकाग्रो निगृहीतात्मा विशुद्धेनान्तरात्मना । प्रगृह्य पुष्कराग्रेण कांचनं कमलोत्तमम् ॥ २४८ ॥
नैवेद्यं मनसा ध्यात्वा पूजयित्वा जनार्दनम् । आपद्मोक्षमभिप्रेप्सुन्प्रास्तौषीत् स्तोत्रमुदारधीः ॥ २४९ ॥
तत्कृतेन स्तवेनैव सुप्रीतः परमेश्वरः । आरुह्य गरुडं विष्णुर्गतवान् सुरोत्तमः ॥ २५० ॥
ग्राहग्रस्तं गजेन्द्रं च तं ग्राहं च जलाशयात् । उद्धहत्प्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ॥ २५१ ॥
जलस्थं दारयामास नक्रं चक्रेण माधवः । मोचयन्मत्तमातङ्गं पाशेभ्यः शरणागतम् ॥ २५२ ॥
आसीद्गजः पुरा पाण्ड्य इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः । एकदा मनसोन्योन्यो बभूव ध्यानतत्परः ॥ २५३ ॥
यदृच्छया ययौ तत्र कुम्भजन्मा नृपांतिकम् । ध्यानास्थं स नृपो नैव मुनिं वेद समागतम् ॥ २५४ ॥
ददौ शापं मुनिर्नृपं दृष्ट्वाऽऽसनं तु नोत्थितम् । तपोमदेनमत्प्राप्तौ स्तम्भान्नोत्थितोऽसि माम् २५५ ॥
अतो भव गजो भ्रांतो मदेन विपिनेऽचिरात् । सं श्रुत्वा नृपतिः शापं च प्रणम्य पुनः पुनः ॥ २५६ ॥
विशापं प्रार्थयामास मुनिः प्राह हरेः करात् । भविष्यति विमुक्तिस्ते यदा ग्राहो धरिष्यति ॥ २५७ ॥
पुरा तत्रैव गंधर्वस्त्वप्सरोगणसंयुतः । सम्प्राप्तो जलक्रीडां कर्तुं हूहूः समागतः ॥ २५८ ॥
मघस्यघमर्पणार्थं तं दृष्ट्वा स देवलं द्विजम् । मन्वित्तं च बहिश्चेत्कर्तुंगन्धर्वः सम्यचिन्तयत् ॥ २५९ ॥
स्वयं भूत्वा जले लीनस्सम्पाद्यो स्वकरेण हि । पदं धृत्वा कर्षयनं ज्ञात्वा तमशपन्मुनिः ॥ २६० ॥
ग्राहवन्मे गृही पादौ तस्माद्ग्राहो भवान् भुवि । तेन संप्रार्थितः प्राह हरिस्यामुद्धरिष्यति ॥ २६१ ॥
एवं तौ पूर्वशापेन पतितावतिसङ्कटे । हरिमुद्धृत्य तौ ताभ्यां ययौ स्वीयस्थलं पुनः ॥ २६२ ॥


करन लगा ॥ २४६ ॥ २४६ । उस आप परार्म ग्राहसेन न होकर गजराज दुःखी और निरुत्साह हो गया ।
उस समय इस प्रकारकी परम विपत्तिको प्राप्त होकर वह श्रीहरिका चिन्तन करने लगा ॥ २४७ ॥ तदनन्तर
इन्द्रियोंका निग्रह करके उसने एकाग्र मन तथा शुद्ध अन्तःकरणसे सुवर्णके समान उत्तम एक कमलपुष्प
शूंडके अग्रभागसे पकड़कर शान्त भावसे मन ही मन जनार्दन भगवान्का आवाहन, पूजन, ध्यान तथा नैवेद्य
अर्पण करके विपत्तिसे छुटकारा पानेके हेतु स्तुतिप्रारम्भ किया ॥ २४८ ॥ २४९ ॥ उसकी स्तुतिसे प्रसन्न परमे-
श्वर सुरोत्तम भगवान् विष्णु स्वयं गरुडपर सवार होकर वहाँ आये ॥ २५० ॥ उन अप्रमेय आत्मा मधुसूदन
भगवान्ने उस ग्राह हुए गजेन्द्रको जलसे शीघ्र ही बाहर निकाला ॥ २५१ ॥ उन्होंने जलमें रहनेवाले
ग्राहका अपने चक्रसे मार डाला और शरणागत गजराजको पाशोंसे छुड़ा दिया ॥ २५२ ॥ यह हाथी पूर्व
जन्ममें पाण्ड्यवंशी इन्द्रद्युम्न नामका राजा था । एक बार उसने ध्यान करके तप करना आरम्भ किया
॥ २५३ ॥ जब वह तप कर रहा था, तभी उसके पास अगस्त्य मुनि एकाएक जा पहुंचे । ध्यानमें स्थित
राजाको मुनिके आनेका कुछ पता न था ॥ २५४ ॥ मुनिने अपने आनेपर राजाको खड़े होते न देखकर
शाप दे दिया कि तपके घमण्डसे मेरे आनेपर भी तुम खड़े नहीं हुए ॥ २५५ ॥ इसलिए शीघ्र ही तुम वनमें
मदान्मत हाथी हो जाओ । यह सुनकर राजा इन्द्रद्युम्न बारम्बार मुनिको प्रणाम करके शापसे मुक्त
होनेकी प्रार्थना करने लगा । तब मुनिने कहा कि तुमको ग्राह (मगरमच्छ) पकड़ेगा, तब प्रभुके हाथसे
तुम्हारी मुक्ति होगी ॥ २५६ ॥ २५७ ॥ उन्हीं दिनों हूहू नामक गन्धर्व विशिष्ट अप्सराओंके साथ लेकर उस
सरोवरमें जलक्रीड़ा करनेके लिए आया ॥ २५८ । उसने देखा कि उस सरोवरके जलमें खड़े होकर देवल
मुनि बहुत देरसे अघमर्षण अर्थात् सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले मन्त्रका जप कर रहे हैं और अभी बाहर
निकलना नहीं चाहते । तब वह उनका बाहर निकालनेका उपाय सोचने लगा ॥ २५९ ॥ तदनन्तर स्वयं
जलमें डुबकी मारकर वह अपने हाथसे उनके पाँवोंको पकड़कर खींचने लगा । यह देखकर मुनि उसको
पहिचान गये और शाप दिया- ॥ २६० ॥ तूने ग्रहकी तरह मेरे पाँव पकड़े हैं, इसलिए तू यहाँपर मगर-
मच्छ बनेगा । पुनः गन्धर्वके प्रार्थना करनपर मुनिने कहा कि श्रीहरि तेरा इस शापसे उद्धार करेंगे ॥ २६१ ॥
इस प्रकार पूर्व जन्ममें प्राप्त शापके कारण अतिशय भीषण सङ्कटमें पड़े हुए उन गन्धर्वका भगवान्ने उद्धार

९६आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

क्षुधितेनाथ तार्थ्योऽथ प्रार्थितः प्राह तं हरिः। गच्छ भक्षय पत्तिने गजग्राहकलेवरे ॥ २६३ । ययौ तार्थ्यः सरः पुण्यं तत्रभूद्भृगुशृङ्गराट् । कलेवरंतिकं प्राप्तस्त निहत्य खगेश्वरः ॥ २६४ । पदेनैकेन भृङ्गमपरेण कलेवरं । धृत्वा तार्थ्यः शुद्धदेशं भक्षणार्थमपश्यत् ॥ २६५ । तावत्क्षीरार्णवे जांबूनदवृक्षं समैक्षय सः आयासविस्तृतोच्चैस्तु सहस्रयोजनं शुभम् ॥ २६६ । तच्छाखायां विशालायां यावत्तस्थौ न पक्षिराट् । तावद्भग्नं तच्छाखा बालखिल्यास्तपोयुताः ॥ २६७ ॥ षष्टिश्च पक्षिमाहर्ष्याश्चिकालं समश्रिताः । तांस्तान्दृष्ट्वाऽन्तरिक्षे वशाय तच्छाखामथशक्तिनः ॥ २६८ । धृत्वा स्वचञ्चुना शाखां वभ्राम गगने पुनः । ततो दृष्ट्वा कश्यपं स्वतातं नत्वा व्यजिज्ञपत् ॥ २६९ ॥ वद शुद्धां मुवं मंड्य कुर्याहं यत्र भोजनम् । तदा तं कश्यपः प्राह शतयोजनसागरे ॥ २७० । लंकानाम्नी शुद्धभूमिस्तत्र त्वं कुरु भोजनम् । तत्पितुर्वचनात्तूर्णं ययौ तार्थ्यः क्षणेन सः ॥ २७१ ॥ प्रोथयोः पक्षयोः शाखां स्थाप्य तानभक्षयन्मुदा । तस्य केऽस्थिसम्भूताश्शृङ्गाणि त्रीणि चाभवन् ॥ २७२ ॥ त्रिकूट इति नाम्ना स लङ्कायां गिरिराडभूत् । तेषु शृङ्गेषु तां शाखां तार्क्ष्यः संस्थाप्य संपयौ । २७३ । बालखिल्यास्तपोऽन्ते ते ययुर्विष्णोः परं पदम् । भावात्तच्छाखाऽन्तर्गते मा लङ्कायां शृङ्गमूत्रेपु ॥ २७४ ॥ प्राप्तभूतां क्षैत्रेणेन न विदुस्तां तु राक्षसाः । लङ्काऽग्निना द्रवीभूता मर्दयन्ती शवावगान् ॥ ७५ ॥ एषात्र तद्रसेनामील्लङ्काभूर्माद्दामयी । तां दृष्ट्वा चक्रितो वेगादग्रे सीतां ययौ कपिः ॥ २७६ ॥ दृष्ट्वाऽशोके पुनः सीतां तामाह कपिकुञ्जरः । मस्कन्धमंस्थिता गममय पश्यसि जानकि ॥ २७७ । सा प्राह मोषितामन्तर्मा रामो न सहिष्यति । नीत्वा पुनर्मुद्रिकां त्वं राघवाय समर्पय ॥ २७८ ॥


किया और दोनोंको साथ लेकर अपने धाम पधारे । २६२ तदनन्तर भूख सहन्त श्रीहरिसे आहारकी प्रार्थना की । श्रीहरिने कहा कि जाओ, सरोवर के तटपर पड़े हुए गज ग्राहके शरीरको खाओ । २६३ ॥ गरुड वहां गये तो उन कलेवरोंके पास भृगु नामक एक गृध्रराजको देखा । दशन दो पक्षिराज हंस गरुड़ने उसे मार डाला । २६४ । तत्पश्चात् एक टांगमे शृङ्गको तथा दूसरी टांगस गज ग्राहक शरीरोको पकड़कर उन्हें खानेके लिए कोई शुद्ध स्थान खोजने लगे । २६५ । इतनेमे गरुडको क्षीरसागरमे एक जाम्बूनद ( सुवर्ण ) का वृक्ष दिखाया दिया । वह लम्बाई चौड़ाई तथा ऊंचाईमे हजार योजन परिमाणवाला था और देखनेमे बड़ा ही सुन्दर लगता था ॥ २६६॥ पक्षिराज गरुड जाकर ज्यों ही उसकी एक शाखापर बैठे, वैसे ही उसकी वह शाखा टूट पड़ी । उसके टूटनस उसपर बहुत कालमे रहनवाले साठ हजार बालखिल्य ऋषि अधोमुख होकर गिरने लगे उनकी यह दशा देखकर पक्षिराज गरुडके मनमे ऋषियोंके शापकी शंका समा गया ॥ २६७ ॥ २६८ ॥ अतएव उस शाखाको चोंचमे पकड़कर वे आकाशमे फिर भ्रमण करने लगे । तभी उन्हें अपने पिता कश्यप दिखायी पड़े। तब नमस्कार करके उनसे निवेदन किया -॥ २६९ ॥ आप कई ऐसी पवित्र जगह बतलाइये, जहाँ मैं भोजन कर सकूँ । तब कश्यपने कहा कि सौ योजन विस्तृत लंका नामकी विशुद्ध भूमि है, वहाँ जाकर तुम भोजन कर सकते हो । अपने पिताका बात अनुमार करके गरुड क्षणभरमे लङ्का जा पहुंचे ॥ २७० । ॥ २७१ ॥ बालखिल्य ऋषियों सहित शाखाको अपनी ऊँची पाँखॉपर धरे हुए वे आनन्दसे उन मृत शरीरों- को खाने लगे, जिन्हें पंजोंमे पकड़ लाये थे । उन गज ग्राह तथा गीधके शरीरसे निकली हुई हड्डियोंसे वहाँ तीन बड़े भारी शिखर खड़े हो गये ॥ २७२ ॥ उन तीनोका लङ्कामे पवनराज त्रिकूट नाम पड़ गया । गरुड़ने उन्हीं शिखरोपर उस शाखाको रख दिया और चले गये ॥ २७३ ॥ वहीपर तपस्या पूरी करके वे बालखिल्य ऋषि विष्णूके परम पदको प्राप्त हो गये । लंकाम उन शिखरोक मध्यमे स्थित शाखा पाषाणके समान हो गया था । इसी कारण राक्षस लोग उसे नहीं पहचान पाये थे । जब हनुमानने लङ्काको अग्निसे जलाया, तब वह द्रवित होकर राक्षसोंका मर्दन करती हुई गिर पड़ी । उसके रससे लंकाकी भूमि सुवर्णमयी हो गयी । यह लीला देखकर हनुमान् चकित हो गये और शीघ्र ही सीताके समीप आये ॥ २७४-२७६ ॥ अशोकवनमे सीताको पूर्ववत् स्थित देखकर कपिकुञ्जर हनुमान् सीतासे बोले हे जानकी ! आप मेरे कन्धे-

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७

सर्गः ९ ] सारकाण्डम् ९७


इत्युक्त्वा तत्करे सीता ददौ श्रीराममुद्रिकाम् । ततस्तां मारुतिः पृष्ट्वा नत्वा शीघ्रं ययौ पुनः ॥२७९॥
आरुरोह सुवेलाद्रिं चूर्णं तमकरोद्द्रुतम् एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा ददौ पत्रं सविस्तरम् ॥२८०॥
यद्यत्कृतं मारुतिना रक्षार्थं तस्य सूचकम् । तद्गृह्य मारुतिर्गन्त्वा पृष्ट्वा विधिं पुनः ॥२८१॥
तत उड्डीय वेगेन ययावाकाशवर्त्मना । कुर्वन् शब्दं महाघोरं कपीनामूर्ध्वतस्तदा ॥२८२॥
उदग्दिश्यतग किंचिन्पपात भुवि मारुतिः । ततो दृष्ट्वा कपीन्द्रस्तं ददृशे मुनिसत्तमम् ॥२८३॥
किंचिद्भ्रममाविष्टस्तं मुनिं प्राह मारुतिः । मया श्रीरामकार्यं तु कृतमस्ति मुनीश्वर ॥२८४॥
पानीयं पातुमिच्छामि दर्शयस्व जलाशयम् । तर्जन्या दर्शयामास मुनिस्तस्मै जलाशयम् ॥२८५॥
ततः स मारुतिर्मुद्रां मणिं पत्रं मुनेः पुरः । संस्थाप्य नीरं पातुं वै ययो कासारमुत्तमम् । २८६॥
ततस्तत्र कपिः कश्चिन्मुद्रिकां मुनिसंनिधौ । कमण्डलौ प्रक्षिपन्म पयो तारञ्च मारुतिः ॥२८७॥
गृहीत्वा तं मणिं पत्रं मुनिं पप्रच्छ मुद्रिकाम् । मुनिर्नूनेत्रसंज्ञया तस्मै कमण्डलुमदर्शयत् ॥२८८॥
दत्तः कमण्डलीं तूर्णं मुद्रिकामवलोकयन् । तावद्ददर्शान्वनेयस्तस्मिन् भोगममुद्रिकाः ॥२८९॥
दृष्ट्वा सहस्रशस्तत्र चकितः प्राह तं मुनिम् । कुतस्त्विमा मुद्रिकाश्चवद का मम मुद्रिका ॥२९०॥
एतासु त्वं मुनिश्रेष्ठ तदा तं मुनिरब्रवीत् । यदा यदा वायुपुत्रः सीतां तां राघवाज्ञया । २९१॥
लङ्कां गन्त्वा समानीता शुद्दिमुद्राम्तदा तदा । मदग्रे स्थापितास्ताश्च कपिभिश्च कमंडलौ ॥२९२॥
निक्षिप्तास्तास्त्विमाः सर्वा पश्यताम् स्वमुद्रिकाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा गतगर्वस्तमब्रवीत् ॥२९३॥
कियंतो राघवाश्चात्र ममापाता मुनीश्वर । मुनिस्तं प्राह निष्कास्य गणयस्वाद्य मुद्रिकाम् । २९४॥


पर सवार हो जायें, तो मैं आपको ले चलकर आज ही रामका दर्शन करा दूँ ॥ २७७ ॥ जानकीने कहा—मुझे दूसरा कोई छुड़ाकर ले जाय, इस बातको भगवान राम सहन नहीं कर सकेंगे। इसलिए तुम इस अंगूठीको ले जाकर रामको दे दो । २७८ । इतना कहकर साताजीने हनुमानके हाथमें वह मुद्रिका दे दी । तब हनुमानजी सीताकी आज्ञा ले तथा नमस्कार करके शीघ्र ही लौट पड़े ॥ २७९ ॥ उन्होंने समुद्रके किनारे-वाले पर्वतपर चढ़कर उसे चूर्ण कर डाला । उस समय ब्रह्माने विस्तारपूर्वक एक पत्र लिखकर उन्हें दिया । २८० । जिसमें यह लिखा था कि लंकाम जाकर मारुतिने क्या-क्या काम किया है। उसको लेकर ब्रह्माकी आज्ञा ले तथा उन्हें नमस्कार करके हनुमान् पुन वहाँ से उड़कर आकाशमार्गसे घोर तथा महान् वानरोकी तरह शब्द करते हुए जोरसे चल पड़े ॥ २८१ ॥ २८२ ॥ उत्तर दिशाकी ओर कुछ दूर आगे जाकर नीचे उतरे या वहाँ उन्होंने एक मुनिको विराजमान देखा ॥ २८३ ॥ तब कुछ श्रमसे मारुतिने कहा हे मुनीश्वर ! मैं श्रीरामका काम करके आ रहा हूँ । २८४ । यहाँ मैं पानी पीनेकी इच्छासे आया हूँ मुझे कोई जलाशय बतलाइये । तब मुनिने उन्हें तर्जनी अंगुल से जलाशय बतला दिया । २८५ तदन्तर हनुमान् अंगूठी, चूडामणि तथा पत्र मुनिके पास रखकर उस उत्तम तालाबकी ओर जल पीने गये ॥ २८६ । इतनेमें किसी बन्दरने आकर रामकी मुद्रिकाको मुनिके पास रक्खे कमण्डलुमें डाल दिया । उधरस हनुमान्जी आ आ पहुंचे । २८७ ॥ चूडामणि तथा पत्रके विषयमें उन्होने मुनिसे पूछा कि मुद्रिका कहां गयी ? मुनिने भौंहोके संकेतसे कमण्डलु दिखाया ॥ २८८ ॥ जब हनुमान्ने कमण्डलुमें देखा तो उसमे श्रीरामकी हजारों मुद्रिकाएं दिखायी दीं । तब हनुमान्ने आश्चर्यचकित होकर मुनिसे पूछा कि इतनी अंगूठियें कहाँसे आयीं, सो बताइए ॥ २८९ ॥ २९० ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! आप यह भी कहिये कि इनमेंसे मेरी मुद्रिका कौन-सी है ? मुनिने उत्तर दिया कि जब-जब श्रीरामकी आज्ञासे हनुमान् लंकामें जाकर सीताका पता लगाया है और अंगुलियें मेरे सामने रक्खी हैं तब-तब बन्दरोंने उन्हें इस कमण्डलुमें डाल दी हैं। वे ही ये सब हैं। इनमेंसे तुम अपनी अंगूठी खोज लो । मुनिके इस वाक्यको सुनकर हनुमान्का गर्व खर्च हो गया । तब उन्होंने मुनिसे कहा— ॥ २९१ ॥ २९२ । हे मुनीश्वर ! यहाँ कियन राम आये हैं ? मुनिने कहा—कमण्डलुमेंसे अंगूठियें निकालकर