आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहा-‘‘आप जरा भी मेरी सहायता करते, तो मैं इन पांचो दुष्टो को यमद्वार भेज देता।‘‘ सत्यानंद ने कहा-‘‘मेरे इस बूढ़े शरीर मे बल ही कहां है? मैं तो जिन्हे बुला रहा हूं, उनके सिवा मेरा कोई सहारा नही है। जो होना है- वह होकर रहेगा, तुम विरोध न करो। हम इन पांचो को पराजित कर न सकेगे। देखे, ये हमें कहां ले जाते हैं......... भगवान् हर जगह रक्षा करेगे!‘‘ इसके बाद इन लोगो ने मुक्ति की फिर कोई चेष्टा न की, चुपचाप सिपाहियो के पीछे-पीछे चलने लगे। कुछ दूर जाने पर सत्यानंद ने सिपाहियो से पूछा-‘‘बाबा! मैं तो हरिनाम कह रहा था, क्या भगवान का नाम लेने मे भी कोई बाधा है?‘‘ जमादार समझ गया कि सत्यानंद भले आदमी हैं। उसने कहा-‘‘तुम भगवान का नाम लो, तुम्हे रोकूंगा नही। तुम वृद्ध ब्रह्मचारी हो, शायद तुम्हारे छुटकारे का हुक्म हो जाएगा। मगर यह बदमाश फांसी पर चढ़ेगा!‘‘ इसके बाद ब्रह्मचारी मृदु स्वर से गाने लगे- ‘‘धीर समीरे तटिनी तीरे बसति बने बनबारी। मा कुरु धनुर्धर गमन विलम्बनमतिविधुरा सुकुमारी ॥........‘‘ इत्यादि। नगर मे पहुंचने पर वे लोग कोतवाल के समीप उपस्थित किए गए। कोतवाल ने नवाब के पास इत्तिला भेजकर संप्रति उन्हे फाटक के पास की हवालात मे रखा। वह कारागार अति भयानक था, जो उसमे जाता था, प्रायः बाहर नही निकलता था, क्योकि कोई विचार करने वाला ही न था। वह अंग्रेजो के जेलखाना नही था और न उस समय अंग्रेजो के हाथ मे न्याय था। आज कानूनो का युग हैं- उस समय अनियम के दिन थे। कानून के युग से जरा तुलना तो करो ! रात हो गई। कारागार मे कैद सत्यानंद ने महेद्र से कहा-‘‘आज बड़े आनंद का दिन है। कारण, हम लोग कारागार मे कैद है। कहो-‘‘हरे मुरारे!‘‘ महेंद्र ने बड़े कातर स्वर मे कहा-‘‘हरे मुरारे!‘‘ सत्यानंद-‘‘कातर क्यो होते हो, बेटे! तुम्हारे इस महाव्रत को ग्रहण करने पर तुम्हे स्त्री-कन्या का त्याग तो करना ही पड़ता, फिर तो कोई संबंध रह न जाता।........‘‘ महेंद्र-‘‘त्याग एक बात है, यमदण्ड दूसरी बात! जिस शक्ति के सहारे मैं यह व्रत ग्रहण करता, वह शक्ति मेरी स्त्री-कन्या के साथ ही चली गई।‘‘ सत्यानंद-‘‘शक्ति आएगी- मैं शक्ति हूं! महामंत्र से दीक्षित होओ, महाव्रत ग्रहण करो।‘‘ महेंद्र ने विरक्त होकर कहा-‘‘मेरी स्त्री और कन्या को स्यार और कुत्ते खाते होगे- मुझसे किसी व्रत की बात न कहिए!‘‘ सत्यानंद-‘‘इस बारे मे चिंता मत करो! संतानो ने तुम्हारी स्त्री की अन्त्येष्टि क्रिया करके तुम्हारी लड़की को उपयुक्त स्थल मे रख छोड़ा है।‘‘ महेंद्र विस्मित हुए, उन्हे इस बात पर जरा भी विश्वास न हुआ। उन्होने पूछा-‘‘आपने कैसे जाना? आप तो बराबर मेरे साथ हैं।‘‘ सत्यानंद-‘‘हम महामंत्र से दीक्षित हैं- देवता हमारे प्रति दया करते हैं। आज रात को तुम यह संवाद सुनोगे और आज ही तुम कैदखाने से छूट भी जाओगे।‘‘ महेंद्र कुछ न बोला। सत्यानंद ने समझ लिया कि महेंद्र को मेरी बातो का विश्वास नही होता। तब सत्यानंद बोले-‘‘तुम्हे विश्वास नही होता? परीक्षा करके देखो!‘‘ यह कहकर सत्यानंद कारागार के द्वार तक आए। क्या