भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

किया, यह महेंद्र को कुछ मालूम न हुआ, पर यह जान गए कि उन्होने किसी से बातचीत की है। उनके लौट आने पर महेंद्र ने पूछा-“क्या परीक्षा करूं?” सत्यानंद-“तुम अभी कारागार से मुक्ति-लाभ करोगे?” उसके यह बात कहते-कहते कारागार का दरवाजा खुल गया। एक व्यक्ति ने घर के भीतर आकर कहा-“महेंद्र किसका नाम है?” महेंद्र ने उत्तर दिया-“मेरा नाम है।” आगंतुक ने कहा-“तुम्हारी रिहाई का हुक्म हुआ है, तुम जा सकते हो।” महेंद्र पहले तो आश्चर्य मे आए। फिर सोचा, झूठी बात है। अतः परीक्षार्थ वे बाहर आए। किसी ने उनकी राह न रोकी। महेंद्र शाही सड़क तक चले गए। इस अवसर पर आगन्तुक ने सत्यानंद से कहा-“महाराज! आप क्यो नही जाते? मैं आपके लिए ही आया हूं।” सत्यानंद-“तुम कौन हो? गोस्वामी धीरानंद?” धीरानंद -“जी हां!” सत्यानंद-“प्रहरी कैसे बने?” धीरानंद-“भवानन्द ने मुझे भेजा है। मैं नगर मे आने के बाद और यह सुनकर कि आप इस कारागार मे है, अपने साथ धतूरा मिली थोड़ी विजया ले आया था। यहां पहरे पर जो खां साहब थे, वह उसके नशे में जमीन पर पड़े सो रहे है। यह जमा-जोड़ा, पगड़ी, भाला जो कुछ मैंने पाया है, यह सब उन्हीं का है।” सत्यानंद-“तुम यह सब पहले हुए नगर के बार चले आओ। मैं इस तरह न आऊंगा।” धीरानंद-“लेकिन......ऐसा क्यो?” सत्यानंद-“आज सन्तान की परीक्षा है।” महेंद्र वापस आ गए। सत्यानंद ने पूछा-“वापस क्यो आ गए?” महेंद्र-“आप निश्चय ही सिद्ध पुरुष हैं। लेकिन मैं आपका साथ छोड़कर न आऊंगा।” सत्यानंद-“ठीक है! हम दोनो ही आज रात दूसरी तरह से बाहर होगे।” धीरानंद बाहर चले गए। सत्यानंद और महेंद्र कारागार मे ही रहे। ब्रह्मचारी का गाना बहुतो ने सुना। और लोगो के साथ जीवानंद के कानो मे भी वह गाना पहुंचा। महेंद्र की रक्षा मे रहने का उन्हे आदेश मिला था- यह पाठको को शायद याद होगा। राह मे एक स्त्री से मुलाकात हो गई। सात दिनो से उसने खाया न था, राह-किनारे पड़ी थी। उसे जीवन-दान देने मे जीवानंद को एक घंटे की देर लग गई। स्त्री को बचाकर, विलम्ब होने के कारण उसे गालियां देते हुए जीवानंद आ रहे थे। देखा, प्रभु को मुसलमान पकड़े लिए जाते हैं- स्वामीजी गाना गाते हुए चले आ रहे हैं। झरु́ ‘धीर समीरे तटिनी तीरे बसति बने बनबारी।’......... जीवानंद महाप्रभु स्वामी के सारे संकेतो को समझते थे। नदी के किनारे कोई दूसरी स्त्री बिना खाए-पीए तो नही पड़ी हुई है? सोच-विचार जीवानंद नदी के किनारे चले। जीवानंद ने देखा था कि ब्रह्मचारी मुसलमानो द्वारा स्वयं गिरफ्तार होकर चले जा रहे हैं। अतः ब्रह्मचारी का उद्धार करना ही जीवानंद का पहला कर्त्तव्य था, लेकिन जीवानंद ने सोचा-“इस संकेत का तो अर्थ नही है। उनकी जीवनरक्षा से भी बढ़कर है, उनकी आज्ञा का पालन- यही उनकी पहली शिक्षा है। अतः उनकी आज्ञा ही पालन करूंगा।”