भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

नदी के किनारे किनारे जीवनंद चले। जाते-जाते उसी पेड़ के नीचे नदी-तट पर देखा कि एक स्त्री की मृतदेह पड़ी हुई है और एक जीवित कन्या उसके पास है। पाठकों को स्मरण होगा कि महेंद्र की स्त्री-कन्या को जीवानंद ने एक बार भी नही देखा था। उन्होने मन में सोचा- हो सकता है, यही महेंद्र की स्त्री-कन्या हो ! क्योकि प्रभु के साथ ही उन्होने महेंद्र को देखा था। जो हो, माता मृत और कन्या जीवित है। पहले इनकी रक्षा का प्रयास ही करना चाहिए- अन्यथा बाघ-भालू खा जाएंगे। भवानंद स्वामी भी कही पास ही होगे, वह स्त्री का अंतिम संस्कार करेगे- यह सोचकर जीवानंद कन्या को गोद मे लेकर चल दिए। लड़की को गोद मे लेकर जीवानंद गोस्वामी उसी जंगल मे घुसे। जंगल पार कर वे एक छोटे गांव भैरवीपुर मे पहुंचे। अब लोग उसे भरूईंपुर कहते है। भरूईंपुर मे थोड़े-से सामान्य लोगो की बस्ती है। पास मे और कोई बड़ा गांव भी नही है। गांव पार करते ही फिर जंगल मिलता है। चारो तरफ जंगल और बीच मे वह छोटा गांव है। लेकिन गांव है। बड़ा सुंदर। कोमल तृण से भरी हुई गोचर भूमि है, कोमल श्यामल पल्लवयुक्त आम, कटहल, जामुन, ताड़ आदि के बगीचे हैं। बीच मे नील-स्वच्छ जल से परिपूर्ण तालाब हैं। जल मे बक, हंस, डाहुक आदि पक्षी, तट पर पपीहा, कोयल, चक्रवाक हैं, कुछ दूर पर मोर पंख फैलाकर नाच रहे हैं। घर-घर के आंगन मे गाय, बछड़े, बैल हैं। लेकिन आजकल गांव मे धान नही है। किसी के दरवाजे पर पिंजड़े मे तोता है, तो किसी के यहां मैना। भूमि लिपी-पोती स्वच्छ है। मनुष्य प्रायः सभी दुर्भिक्ष के कारण दुर्बल, क्लांत और मलीन दिखाई देते है, फिर भी ग्रामवासियो मे श्री है। जंगल मे अनेक तरह के जंगली खाद्य पैदा होते हैं। अतः गांव के लोग वहां से फल-फूल लाते है और वही खाकर इस दुर्भिक्ष मे भी अपने प्राण बचाए हुए हैं। एक बड़े आम के बगीचे के बीच एक छोटा-सा घर है। चारो तरफ मिट्टी की चहारदीवारी है और चारो कोनो पर एक-एक कमरा है। गृहस्थ के पास गौ-बकरी है, एक मोर है, एक मैना है, एक तोता है। एक बंदर भी था, लेकिन उसे खाना न मिलने के कारण छोड़ दिया गया हैं। धान कू टने की एक ढेंकी है। बाहर बैल बंधे हैं, बगल मे नीबू का पेड़ हैं। मालती जूही की लताएं हैं- अर्थात् गृहस्थ सुरुचि-सम्पन्न है। लेकिन घर मे प्राणी अधिक नही है। जीवानंद कन्या को लिए हुए घर मे चले गए। घर में पहुंचते ही जीवानंद ने आंगन के ओसरे में रखे को उठा लिया और भनन्-भनन् उसे चलाने लगे। छोटी लड़की ने चरखे की आवाज कभी सुनी न थी। विशेषतः माता के छूटने के बाद से वह रो रही थी। चरखे की आवाज सुनकर वह भयभीत हो और सप्तम स्वर मे गला ऊंचा कर रोने लगी। रोने की आवाज सुनकर एक कमरे से सत्रह-अठारह वर्ष की युवती बाहर आई। युवती बाएं बाएं हाथ पर बायां गाल रखे, गर्दन झुकाए ही खड़ी होकर देखने लगी। बोली-"यह क्या दादा! चरखा क्यो कात रहे हो? यह लड़की कहां से पायी दादा? तुम्हे लड़की हुई है क्या? दूसरी शादी की है क्या?" जीवानंद उठे और लड़की को उसकी गोद मे देकर चपत मारते चले। बोले-"बंदरी कही की! मुझे रंडुआ- भंडुआ समझ लिया है क्या? घर में दुध है?" इस पर युवती ने कहा-"भला दूध क्यो न होगा? आऊं पियोगे" जीवानंद ने कहा-"हां पिऊंगा!" व्यवस्त होकर युवती घर में दूध गरम करने लगी। तब तक जीवानंद बैठकर चरखा कातने लगे। लड़की ने युवती की गोद मे जाकर रोना बंद कर दिया था। उसने क्या समझा, नही कहा जा सकता। शायद इस युवती को खिले पुष्प देखकर सोचा हे, कि यही मेरी मां है। वह केवल एक बार रोई, वह भी शायद आग की आंच खाकर। लड़की का रोना सुनकर जीवानंद ने आवाज लगाई-"अरे निमी! अरी कलमुही बंदरी! तेरा दूध गरम नही हुआ क्या?" उसने भी कहा-"हो गया।" यह कहकर वह एक पथरी मे दूध ढालकर जीवानंद के पास