आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंलाकर रख बैठ गई। जीवानंद ने बनावटी क्रोध दिखाकर कहा-“मन करता है, यही गरम दूध की पथरी तेरे ऊपर उंडेल दूं। तूने क्या समझा कि मैं पियूंगा?” निमी ने पूछा-“तब कौन पिएगा?” जीवानंद-“यह लड़की पिएगी। देखती नही, अभी दूध पीनेवाली निरी बच्ची है!” यह सुनकर निमी पलथी मारकर कन्या को गोद मे लेकर चम्मच से दूध पिलाने बैठी। एकाएक उसकी आंखो से कई बूंद आंसू लुढ़क पड़े। बात यह थी कि उसे पहले एक बालक हुआ था, जो मर गया था। उसे इस तरह दूध पिलाने मे अपने बच्चे की याद आ गई। निमी ने तुरंत अपने आंसू पोछकर हंसते-हंसते जीवानंद से पूछा-“है दादा! बताओ, यह किसकी लड़की है?” जीवानंद ने कहा-“अरी बंदरी! तुझे क्या पड़ी है?” निमी ने कहा-“लड़की मुझे दोगे?” जीवानंद-“तू लेकर क्या करेगी?” निमी-“मै लड़की को दूध पिलाऊंगी, गोद मे लेकर खिलाऊंगी, बड़ी करूंगी।” कहते-कहते निमी की आंखो से आंसू ढुलक पड़े। आंसू पोछकर वह फिर दांत निकालकर हंसने लगी। जीवानंद ने कहा-“तू लेकर क्या करोगी? तुझे आप ही कितने बाल-बच्चे होगे।” निमी-“जब होगे तब होगे। अभी इस लड़की को मुझे दे दो! न हो, बाद मे फिर ले जाना।” जीवानंद-“तो ले ले, लेकर मर! मैं बीच-बीच मे आकर देख जाया करूंगा। यह कायस्थ की लड़की है। मैं अब चला....।” निमी-“वाह दादा! भला खाओगे नही? समय हो गया, तुम्हे मेरी कसम, खाकर तब जाना।” जीवानंद-“तेरी कसम टालकर तुझे खाऊं, या भात खाऊं!” फिर बोले-“रहने दे, तुझे न खाऊंगा, भात ही खाऊंगा, ला भात!” निमी कन्या को गोद मे लिए हुए खाना परोसने मे व्यस्त हो गई। पहले उसने जगह पानी से धो-पोछ दी इसके बाद पीढ़ा-पानी रखकर एक थाली मे भात, अरहर की दाल, परवल की तरकारी, रोहू मछली का रसा और दूध लाकर रख दिया। खाने के लिए बैठकर जीवानंद ने कहा-“निमाई बहन! कौन कहता है कि देश मे अकाल है? तेरे गांव मे शायद अकाल घुसा ही नही!” निमी बोली-“भला अकाल क्यो न होगा- भयंकर अकाल है! हमलोग दो ही प्राणी तो है, बहुत कुछ है, दे-दिलाकर भी भगवान एक मुट्ठी चना ही देते है। हमलोगो के गांव मे पानी बरसा था- याद नही है- तुम्ही तो कह गए थे कि वन मे पानी बरस रहा है, यहां भी बरसेगा! इसलिए हमारे गांव मे धान हो गया। गांववाले और लोग तो शहर मे चावल बेच आए, हमलोगो ने नही बेचा।” जीवानंद ने पूछा-“जीजाजी कहां है?” निमी ने गर्दन टेढ़ी कर कहा-“दो-तीन सेर चावल बांधकर क्या जाने किसको देने गए है। किसी ने चावल मांगा था।” इधर जीवानंद के भाग्य में ऐसा भोजन कभी मिला न था। व्यर्थ बातचीत मे समय न गंवाकर जीवानंद दनादन गपागप-सपासप आवाज करते हुए क्षण भर मे सारा भोजन उदरस्थ कर गए। श्रीमती निमाई मणि ने केवल अपने और पति के लिए पकाया था, अपना हिस्सा उसने भाई को खिला दिया था, थाली सूनी देखकर