भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पीछे-पीछे गए हैं। फिर भी मैं एक बार नगर घूमने जाता हूं, मठ की रक्षा तुम्हे सौप जाता हूं।’’ यह कहकर भवानंद स्वामी ने एक अलग कोठरी मे जाकर कितने ही तरह के कपड़े निकाले। भवानंद जब उस कोठरी से निकले तो उन्हे पहचानना कठिन था। गेरुआ वस्त्रो के बदले इनके पैरो मे चूड़ीदार पायजामा, शरीर पर अचकन, माथे पर कंगूरेदार पगड़ी और पैरों मे नागौरी जूता था। अब उनके ललाट पर का चंदन-त्रिपुण्ड साफ हो गया था, उनका चेहरा अपूर्व शोभा पा रहा था। उन्हे देखने से किसी पठान जातीय मुसलमान का ही भान होता था। इस तरह से सशस्त्र होकर भवानंद मठ के बाहर हुए। मठ के कोई एक कोस उत्तर दो छोटी पहाड़िया बगल-बगल में थी। पहाड़ी जंगल से भरी हुई थी। वही एक निर्जन स्थान मे संस्थानों की अश्वशाला थी। भवानंद ने वहां से एक घोड़ा निकाला और जीन आदि कसवाकर उस पर सवार हो, सीधे राजधानी की तरफ चल पड़े। जाते-जाते एकाएक उनकी गति मे बधा पड़ी। उसी राह की बगल में नदी के किनारे वृक्ष के नीचे उन्होने आकाश से गिरी बिजली की तरह दीप्तिमान एक स्त्री को पड़ी हुई देखा। उन्होने देखा, उसमें जीवन के कोई लक्षण दिखाई नही पड़ते- विष की खाली डिबिया पास मे पड़ी हुई है। भवानंद विस्मित, क्षुब्ध और भीत हुए। जीवानंद की तरह भवानंद ने भी महेन्द्र की स्त्री-कन्या हो सकती है, भवानंद के सामने संदेह के लिए वे कारण भी न थे- उन्होने ब्रह्मचारी और महेन्द्र को बंदी रूप में ले जाते भी देखा न था। कन्या भी वहां न थी। केवल डिबिया देखकर उन्होने समझा कि इस स्त्री ने विष खाकर आत्म-हत्या की है। भवानंद उस शव के पास बैठ गए, बैठकर उसके माथे पर हाथ रखकर बहुत देर तक परीक्षा करते रहे। नाड़ी-परीक्षा, हृदय-परीक्षा आदि अनेक प्रकार से और दूसरे अपरिज्ञात तरीको से परीक्षा कर मन-ही-मन कहा-‘‘अभी मरी नही है-अभी भी समय है- बचाई जा सकती है। लेकिन बचाकर करना भी क्या है? इस तरह कुछ क्षण तक विचार करते रहे और इसके बाद वे उठकर एकाएक वन के अंदर चले गए। वहां से वे एक लता की थोड़ी पत्ती तोड़ लाए। उसी पत्ती को हथेली पर मसलकर उन्होने रस निकाला और अंगुलियो से दांत खोल रस को मुंह मे टपकाया कान मे डाला और थोड़ा मस्तक पर मल दिया। इसके बाद थोड़ा रस उन्होने नाक मे भी डाल दिया। इसी तरह उन्होने बार- बार किया और बीच-बीच में नाक के पास हाथ ले जाकर देखते जाते थे कि कुछ श्वास चली या नही। पहले- पहल तो भवानंद को निराशा होने लगी, लेकिन इसके बाद उनका मुंह प्रसन्नता से खिल उठा- अंगुली मे निश्वास की हलकी अनुभूति हुई। उत्साहित हो उन्होने बारम्बार वही प्रक्रिया की, अब श्वास मजे मे आने-जाने लगी। नाड़ी देखी चल रही थी। इसके बाद ही क्रमशः प्रभात-कालीन अरुणोदय की तरह, प्रभात के समय कमल खिलने की तरह, प्रथम प्रेमानुभव की तरह कल्याणी अपनी आंखे खोलने लगी। यह देखकर भवानंद ने कल्याणी के अर्धजीवित शरीर को घोड़े पर रखा और स्वयं पैदल ही नगर की तरफ निकल गए।’’ संध्या होने के पहले ही सन्तान सम्प्रदाय के सभी लोगो ने यह जान लिया कि महेन्द्र के साथ सत्यानन्द स्वामी गिरफ्तार होकर नगर की जेल मे बन्द है। इसके बाद ही एक एक दो-दो दस-दस सौ-सौ हजार-हजार की संख्या मे आकर संतानगण उसी मठ की चहारदीवारी से संलग्न वन मे एकत्रित होने लगे। सभी सशस्त्र थे। सबकी आंखो से क्रोध की अग्नि निकल रही थी, चेहरे पर दृढ़ता और होठो पर प्रतिज्ञा थी। उन लोगो के काफी संख्या मे जुट जाने पर मठ के फाटक पर हाथ में नंगी तलवार लिए हुए स्वामी ज्ञानानन्द ने गगन भेदी स्वर मे कहा- “अनेक दिनो से हम लोग विचार करते आते हैं कि इस नवाब का महल तोड़कर यवनपुरी का नाश कर नदी के जल मे डुबा देगे- इन सूअरो के दांत तोड़कर इन्हे आग मे जलाकर माता वसुमती का उद्धार करेंगे। भाइयों! आज वही दिन आ गया है। हम लोगो के गुरू के भी गुरू परमगुरू जो अनन्त ज्ञानमय सदा शुद्धाचारी, लोकहितैषी और देश हितैषी है- जिन्होने सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिए आमरणव्रत लिया