आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै,प्रतिज्ञा की है- जिन्हे हम विष्णु के अवतार के रूप मे मानते है, जो हमारी मुक्ति के आधार है - वही आज म्लेच्छ मुसलमानो के कारागार मे बन्दी है। क्या हम लोगो की तलवार पर धार नही है? बांह फैलाकर ज्ञानान्द ने कहा-‘‘इन बाहुओ मे क्या बल नही है? छाती ठोकर बोले- ‘‘क्या इस हृदय मे साहस नही? भाइयो ! बोलो-हरे मुरारे मधुकैटभारे ! जिन्होंने मधुकैटभ का विनाश किया है जिन्होनंने हिरण्यकशिपु, कंस,दन्तवक्र,शिशुपाल आदि दुर्जय असुरो का निधन-साधन किया है, जिनके चक्र के प्रचण्ड निर्घोष से मृत्युंजय शंकर भी भयभीत हुए थे जो अजेय है रण मे विजयदाता है हम उन्ही के उपासक है, उनके ही बल से हमारी भुजाओं मे अनन्त बल है- वह इच्छामय है उनके इच्छा करते ही हम रण- विजयी होगे। चलो, हम लोग उस यवनपुरी का निर्दलन कर उसे धूलि मे मिला दे। उरा शूकर निवास को अग्नि से शुद्ध कर नदी-जल मे धो दे, उसका जर्रा जर्रा उड़ा दे। बोलो- हरे मुरारे मधुकैटभारे !‘‘ इसके साथ ही उस कानन मे भीषण, आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे मुरारे मधुकैटभारे ! इसके साथ ही उस कानन मे भीषण आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे मुरारे मधुकैटभारे ! सहस्त्रो कंठो के निर्घोष से आकाश कांपा, वसुन्धरा डगमगायी। सहस्त्रो बाहुओ के घर्षण से असीम निनाद हुआ- हजारो ढालो की आवाज से कानो के पर्दे फटने लगे। कोलाहल करते हुए पशु पक्षी जंगल से निकलकर भागे। इस तरह जंगल से श्रेणीबद्ध शिक्षित सेना की तरह सन्तानगण निकल पड़े। वह लोग मुंह से हरिनाम कहते हुए, मिलित पद- विक्षेप से नगर की तरफ चले। उस अंधेरी रात मे पतो का मर्मर शब्द, अस्त्रो की झनकार, कण्ठो का अस्फुट स्वर, बीच बीच मे तुमुल स्वर मे हरिनाम का जयघोष ! धीरे-धीरे, तेजस्वितापूर्वक सरोष सन्तान-वाहिनी ने नगर मे आकर नगर को त्रस्त कर दिया। इस अकस्मात ब्रजाघात से नागरिक कहां किधर भागे, पता न लगा। नगर- रक्षक हतबुद्धि हो निश्चेष्ट हो गये। इधर सन्तानो ने पहुंचते ही पहले राजकारागार मे पहुंचकर उसे तोड़ डाला, रक्षको को चटनी बना दिया और सत्यानन्द तथा महेन्द्र को मुक्त कर कन्थो पर चढ़ाकर संतानगण आनंद से नृत्य करने लगे। हरिकीर्तन का अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। महेन्द्र और सत्यानंद करे मुक्त कर संतानों ने जहां-जहां मुसलमानो का घर पाया, आग लगा दी। यह देखकर सत्यानंद ने कहा-‘‘अनर्थक अनिष्ट की आवश्यकता नही। चलो, लौट चलो !‘‘ नगर के अधिकारियो ने संतानो का यह उपद्रव सुनकर सिपाहियो का एक दल उनके दमन के लिए भेज दिया। उनके पास केवल बंदूकें ही नही थी। एक तोप भी साथ मे थी। यह खबर पाते ही सन्तानगण आनन्द कानन से पलट पड़े, लेकिन लाठी,तलवार और छुरो से क्या हो सकता है ? तोप के सामने ये लोग पराजित होकर भाग गये। शान्ति को बहुत थोड़ी ही उम्र मे,बचपन मे ही मातृवियोग हो गया था। जिन उपादानो से शान्ति का चरित्र-गठन हुआ है, उनमे एक यह प्रधान है। उसके पिता एक ब्राह्मण अध्यापक थे। उनके घर मे और कोई स्त्री न थी। शान्ति के पिता जब पाठशाला मे बालकों को पढ़ाते थे, तो स्वभावतः उनकी बगल मे शांति भी आकर बैठती थी। कितने ही छात्र तो पाठशाला मे ही रहते थे; अन्य समय मे शांति भी उन्ही मे मिलकर खेला करती थी। कभी उनकी पीठ पर चढ़ती थी, कभी गोद मे बैठ खेला करती थी। वे लोग भी शान्ति का आदर करते थे। इस तरह बचपन से ही पुरुष-साहचर्य का प्रथम प्रतिफल तो यह हुआ कि शान्ति ने लड़कियो की तरह कपड़े पहनना सीखा, या सीखा भी तो वह ढंग परित्याग कर दिया- लड़को की तरह कच्छाड़ा मारकर धोती पहनने लगी। अगर कोई उसे लड़कियो की तरह कपड़े पहना देता था, तो वह तुरंत उसे खोल देती थी और