भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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फिर कछाड़ा मारकर पहन लेती थी। पाठशाला के बालक कभी जूड़ा बांधते न थे, अतः वह न तो चोटी करती थी और न जूड़ा ही। फिर उसे जूड़ा बांध ही कौन देता? घर मे कोई औरत तो थी नही। पाठशाला के छात्र बांस की फरांटी मे उसके बाल फंसा देते थे और उसके घुंघराले बाल वैसे ही पीठ पर लहराया करते थे। विद्यार्थी ललाट पर चन्दन और भस्म लगाते थे; अतः शान्ति भी चन्दन-भस्म लगाया करती थी। गले मे यज्ञोपवीत पहनने के लिए भी शांति बहुत रोया करती थी। फिर भी, संध्यादि नैमित्तिक नियमो के समय वह अवश्य उनके पास बैठकर उनका अनुकरण किया करती थी। अध्यापक की अनुपस्थिति के समय लड़को ने उसे अश्लील दो-एक संकेत सिखा दिये थे और वे आपस मे जो कहानियां कहा करते थे, तोते की तरह शान्ति ने भी उन्हे रट डाला था- भले ही उसका कोई अर्थ न जानती हो। दूसरा फल यह हुआ कि बड़ी पर शान्ति, लड़के जो पुस्तके पढ़ा करते थे- उन्हे अनायास ही पड़ने लगी। वह व्याकरण का एक अक्षर भी जानती न थी, लेकिन भट्टि काव्य, रघुवंश, कुमारसंभव, नैषधादि के श्लोक व्याख्या के साथ उसने रट डाले थे। यह देखकर शान्ति के पिता ने उसे थोड़ा प्राथमिक व्याकरण भी पढ़ाना शुरू किया। शान्ति भी शीघ्र से शीघ्र सीखने लगी। अध्यापक भी बड़े विस्मित हुए। व्याकरण के साथ उन्होने कुछ साहित्य भी उसे पढ़ाया। इसके बाद ही सब गोलमाल हो गया, शान्ति के पिता का स्वर्गवास हो गया। अब शान्ति निराश्रय हो गयी। पाठशाला भी उठ गयी, छात्र चले गये। लेकिन वे सब शान्ति को प्यार करते थे, अतः उनमे से एक शान्ति को अपने घर ले गया। इसी छात्र ने बाद मे सन्तान-सम्प्रदाय मे नाम लिखाकर अपना नाम जीवानन्द रखा। हम उन्हे जीवानन्द ही कहेगे। उस समय जीवानन्द के माता-पिता जीवित थे। उनको जीवानन्द ने कन्या का विशेष परिचय दिया। पिता- माता ने पूछा- "लेकिन अब परायी लड़की का भार अपने ऊपर लेगा कौन?" जीवानन्द ने कहा- "मै ले आया हूं, इसका भार मैं ही लूंगा!" माता-पिता ने भी कहा - ठीक है। जीवानन्द कुंवारे थे, उन्होने शान्ति के साथ शादी कर ली। विवाह के उपरान्त सभी लोग इस सम्बन्ध पर पछताने लगे। सब लोग समझे- "तो ठीक नही हुआ।" शांति ने किसी तरह भी लड़कियो के समान धोती न पहनी, किसी तरह भी वह चोटी बांधने को तैयार न हुई। वह घर मे भी अधिक रहती न थी, पड़ोस के लड़को के साथ बाहर खेला करती थी। जीवानन्द के घर के पास ही जंगल है। शांति उस जंगल मे अकेली घुसकर कही मोरो, कही हरिणो और कही सुंदर फूलो की खोज मे घूमा करती थी। सास- ससुर ने पहले तो मना किया, फिर डांट-फटकार की, इसके बाद मारा- पीटा और अन्त मे कोठरी मे बन्द कर दिया। इस डांट- डपट से शांति बड़ी क्रु द्ध हुई। एक दिन दरवाजा खुला देखकर वह बाहर निकली और बिना किसी से कहे-सुने कही चली गयी। जंगल के अन्दर टेसू के फूलो को लेकर उनसे शांति ने अपने कपड़े रंग डाले और खासी साधुनी बन गयी। उस समय बंगाल मे दल के दल संन्यासी घूमा करते थे। शांति भी भिक्षा मांगती-खाती जगन्नाथ क्षेत्र की राह मे निकल गयी। थोड़े ही दिनो बाद उसे संन्यासियो का दल मिल गया; वह भी उन्ही मे मिल गयी। उस समय के सन्यासी आजकल जैसे न होते थे- सुशिक्षित बलिष्ट युद्ध विशारद एवं अन्यान्य गुणो से गुणवान होते थे। वे लोग वस्तुतः एक तरह के राजविद्रोही होते थे- राजाओ का राजस्व लूटकर खाते थे। बलिष्ट बालक पाते ही उनका अपहरण करते थे, उन्हे शिक्षित कर अपने सम्प्रदाय मे मिला लिया करते थे। इसलिए लोग उन्हे 'लकड़-पकड़वा' या 'लकड़ सुंघवा' भी कहते थे। शांति बालक संन्यासी के रूप मे उनमे मिली थी। संन्यासी लोग पहले कोमल देह देखकर उसे दल मे मिलाते न थे; लेकिन शांति की बुद्धि-प्रखरता,चतुरता और कार्यदक्षता देखकर आदरपूर्वक उन्होने उसे अपने दल मे मिला लिया। शांति उनके दल मे मिलकर व्यायाम करती थी, अस्त्र चलाना सीखती थी, अतः परिश्रम-