भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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सहिष्णु हो उठी। उनके साथ उसने देश- विदेश का भ्रमण किया, अनेक लड़ाइयां देखी और अस्त्र-विद्या मे निपुण हो गयी। क्रमशः उसके यौवन के लक्षण प्रकट होने लगे। अनेक संन्यासियो ने जान लिया कि यह छद्मवेश मे स्त्री है। लेकिन अधिकतर संन्यासी उस समय जितेन्द्रिय होते थे, इसलिये किसी ने ध्यान न दिया। संन्यासियो मे अनेक विद्वान भी थे। शांति को संस्कृत मे कुछ ज्ञान है, यह देखकर एक संन्यासी उसे पढ़ाने लगा-लेकिन क्या काबुल मे गधे नही होते? जितेन्द्रिय संन्यासियो मे वह संन्यासी कुछ दूसरे ढंग का था। या हो सकता है कि शांति का अभिनव यौवन-सन्दर्भ देखकर वह संन्यासी अपनी इन्द्रियो द्वारा परिपीड़ित होकर अपने को वश मे न रख सका हो। अतः वह अपनी शिष्या को श्रृंगार रस के काव्य पढ़ाने लगा और उनकी व्याख्या खोलकर अश्राव्य रूप मे सुनाने लगा। उससे शान्ति का अपकार न होकर कुछ उपकार ही हुआ। लज्जा किसे कहते हैं, शान्ति ने यह सीखा ही न था; अब व्याख्या सुनकर स्त्री-स्वभाववश स्वतः उसमे लज्जा का उदय हुआ। पुरुषचरित के ऊपर निर्मल स्त्री-चरित्र की अपूर्व प्रभा उस पर छा गयी-उसने शान्ति के गुणो को समाधिक बढ़ा ही दिया। शान्ति ने पढ़ना छोड़ दिया। व्याधा जैसे हरिण के पीछे दौड़ता हैं, वैसे ही वह संन्यासी शान्ति को देखकर उसके पीछे दौड़ता था। किन्तु शान्ति ने व्यायाम आदि के कारण पुरुष-दुर्लभ बल-संचय किया था। अध्यापक के समीप आते ही वह उन्हे जोर के घूंसे और लात जमाती थी, जो साधारण न होते थे। एक दिन एकान्त होकर संन्यासी ने बड़ा जोर लगातार शान्ति का हाथ पकड़ लिया। शान्ति हाथ छुड़ा न सकी। लेकिन संन्यासी ने दुर्भाग्यवश शान्ति का बायां हाथ पकड़ा था, अतः दाहिने हाथ से शान्ति ने संन्यासी के सिर मे इस जोर का घूंसा जमाया कि संन्यासी कटे पेड़ की तरह धड़ाम से चकराकर गिर पड़े। शान्ति ने संन्यासी सम्प्रदाय का त्याग कर पलायन किया। शान्ति निर्भय थी, अकेली अपने गांव की तरफ चल पड़ी। साहस और बाहुबल से वह निर्विघ्न यात्रा करती रही। भिक्षा मांगकर और जंगली कन्द-मूल आदि फलो से अपनी क्षुधा मिटाती वह अनेक आपदाओ मे विजय-लाभ करती अपने ससुराल आ पहुंची। उसने देखा, श्वसुर का स्वर्गवास हो गया है; लेकिन सास ने उसे घर मे स्थान न दिया-जाति जाने का डर था। शान्ति तुरन्त बाहर निकल गयी। जीवानन्द घर मे ही थे। उन्होने शान्ति का पीछा और उसे राह मे पकड़कर पूछा-‘‘तुम मेरा घर छोड़कर कहां चली गयी थी? इतने दिनो तक कहां रही?’’ शान्ति ने सारी सच्ची बाते कह दी। जीवानन्द को सच-झूठ की परख थी। उसने शान्ति की बात का विश्वास किया। अप्सराओ के भ्रूविलास से युक्त कटाक्ष-ज्योति द्वारा निर्मित जो काम-शेर हैं, उसका अपव्यय-पुष्प धन्वा मदनदेव विवाहित दम्पतियो के प्रति नही किया करते। अंग्रेज पूर्णिमा की रात को भी शाही राह पर गैस या बिजली जलाते हैं, बंगाली देह मे लगाने वाले तेल का ढाल देते हैं; मनुष्यो की बात तो दूर हैं, सूर्य देव के उदय के बाद भी कभी-कभी चन्द्रदेव आवास मे उदित रहते हैं, इन्द्र सागर पर भी वृष्टि करता हैं; जिस सन्दूक मे छिपाकर धनराशि रखी रहती हैं, कुबेर उसी सन्दूक से धन ले जाते हैं; यमराज जिसके घर से सबको ले गये रहते हैं, प्रायः उसी घर के बचे हुए लोगो से दृष्टि डालते हैं, केवल रतिप्रति ऐसी निर्बुद्धिता नही करते-जहां वैवाहिक गांठ बंध जाती हैं, वहां फिर वे परिश्रम नही करते-प्रजापति को सारा भार देकर, जहां किसी के हृदय के रक्त को उत्तेजित कर सके, मदनदेव वही जाते हैं। लेकिन आज तो जान पड़ता है पुष्पधन्वाको और कोई काम था-एकाएक उन्होने दो पुष्पबाणो का अपव्यय किया-एक ने आकर जीवानन्द के हृदय को वेध दिया- दूसरे ने शान्ति के हृदय मे प्रवेश कर उसे बता दिया यह स्त्रियों का कोमल हृदय हैं। नवमेघ से छलके प्रथम जलकणो से भीगी पुष्पकलिका की तरह शान्ति सहसा खिलकर जीवानन्द के मुंह के तरफ निहारती रही।