आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
सहिष्णु हो उठी। उनके साथ उसने देश- विदेश का भ्रमण किया, अनेक लड़ाइयां देखी और अस्त्र-विद्या मे निपुण हो गयी। क्रमशः उसके यौवन के लक्षण प्रकट होने लगे। अनेक संन्यासियो ने जान लिया कि यह छद्मवेश मे स्त्री है। लेकिन अधिकतर संन्यासी उस समय जितेन्द्रिय होते थे, इसलिये किसी ने ध्यान न दिया। संन्यासियो मे अनेक विद्वान भी थे। शांति को संस्कृत मे कुछ ज्ञान है, यह देखकर एक संन्यासी उसे पढ़ाने लगा-लेकिन क्या काबुल मे गधे नही होते? जितेन्द्रिय संन्यासियो मे वह संन्यासी कुछ दूसरे ढंग का था। या हो सकता है कि शांति का अभिनव यौवन-सन्दर्भ देखकर वह संन्यासी अपनी इन्द्रियो द्वारा परिपीड़ित होकर अपने को वश मे न रख सका हो। अतः वह अपनी शिष्या को श्रृंगार रस के काव्य पढ़ाने लगा और उनकी व्याख्या खोलकर अश्राव्य रूप मे सुनाने लगा। उससे शान्ति का अपकार न होकर कुछ उपकार ही हुआ। लज्जा किसे कहते हैं, शान्ति ने यह सीखा ही न था; अब व्याख्या सुनकर स्त्री-स्वभाववश स्वतः उसमे लज्जा का उदय हुआ। पुरुषचरित के ऊपर निर्मल स्त्री-चरित्र की अपूर्व प्रभा उस पर छा गयी-उसने शान्ति के गुणो को समाधिक बढ़ा ही दिया। शान्ति ने पढ़ना छोड़ दिया। व्याधा जैसे हरिण के पीछे दौड़ता हैं, वैसे ही वह संन्यासी शान्ति को देखकर उसके पीछे दौड़ता था। किन्तु शान्ति ने व्यायाम आदि के कारण पुरुष-दुर्लभ बल-संचय किया था। अध्यापक के समीप आते ही वह उन्हे जोर के घूंसे और लात जमाती थी, जो साधारण न होते थे। एक दिन एकान्त होकर संन्यासी ने बड़ा जोर लगातार शान्ति का हाथ पकड़ लिया। शान्ति हाथ छुड़ा न सकी। लेकिन संन्यासी ने दुर्भाग्यवश शान्ति का बायां हाथ पकड़ा था, अतः दाहिने हाथ से शान्ति ने संन्यासी के सिर मे इस जोर का घूंसा जमाया कि संन्यासी कटे पेड़ की तरह धड़ाम से चकराकर गिर पड़े। शान्ति ने संन्यासी सम्प्रदाय का त्याग कर पलायन किया। शान्ति निर्भय थी, अकेली अपने गांव की तरफ चल पड़ी। साहस और बाहुबल से वह निर्विघ्न यात्रा करती रही। भिक्षा मांगकर और जंगली कन्द-मूल आदि फलो से अपनी क्षुधा मिटाती वह अनेक आपदाओ मे विजय-लाभ करती अपने ससुराल आ पहुंची। उसने देखा, श्वसुर का स्वर्गवास हो गया है; लेकिन सास ने उसे घर मे स्थान न दिया-जाति जाने का डर था। शान्ति तुरन्त बाहर निकल गयी। जीवानन्द घर मे ही थे। उन्होने शान्ति का पीछा और उसे राह मे पकड़कर पूछा-‘‘तुम मेरा घर छोड़कर कहां चली गयी थी? इतने दिनो तक कहां रही?’’ शान्ति ने सारी सच्ची बाते कह दी। जीवानन्द को सच-झूठ की परख थी। उसने शान्ति की बात का विश्वास किया। अप्सराओ के भ्रूविलास से युक्त कटाक्ष-ज्योति द्वारा निर्मित जो काम-शेर हैं, उसका अपव्यय-पुष्प धन्वा मदनदेव विवाहित दम्पतियो के प्रति नही किया करते। अंग्रेज पूर्णिमा की रात को भी शाही राह पर गैस या बिजली जलाते हैं, बंगाली देह मे लगाने वाले तेल का ढाल देते हैं; मनुष्यो की बात तो दूर हैं, सूर्य देव के उदय के बाद भी कभी-कभी चन्द्रदेव आवास मे उदित रहते हैं, इन्द्र सागर पर भी वृष्टि करता हैं; जिस सन्दूक मे छिपाकर धनराशि रखी रहती हैं, कुबेर उसी सन्दूक से धन ले जाते हैं; यमराज जिसके घर से सबको ले गये रहते हैं, प्रायः उसी घर के बचे हुए लोगो से दृष्टि डालते हैं, केवल रतिप्रति ऐसी निर्बुद्धिता नही करते-जहां वैवाहिक गांठ बंध जाती हैं, वहां फिर वे परिश्रम नही करते-प्रजापति को सारा भार देकर, जहां किसी के हृदय के रक्त को उत्तेजित कर सके, मदनदेव वही जाते हैं। लेकिन आज तो जान पड़ता है पुष्पधन्वाको और कोई काम था-एकाएक उन्होने दो पुष्पबाणो का अपव्यय किया-एक ने आकर जीवानन्द के हृदय को वेध दिया- दूसरे ने शान्ति के हृदय मे प्रवेश कर उसे बता दिया यह स्त्रियों का कोमल हृदय हैं। नवमेघ से छलके प्रथम जलकणो से भीगी पुष्पकलिका की तरह शान्ति सहसा खिलकर जीवानन्द के मुंह के तरफ निहारती रही।
जीवानन्द ने कहा- “मै तुम्हें परित्याग न करूंगा। मै जब तक लौटकर न आऊं, तुम यही खड़ी रहना।‘ शांति ने पूछा-“तुम लौटकर आओगे न?” जीवानन्द और कोई उत्तर न देकर, और किसी की परवाह न कर, राह की बगल मे नारियल वृक्षो की छाया मे शांति के अधरो पर अधर रख, सुधपान कर चले गये। माता को समझा-बुझाकर और विदा लेकर जीवानन्द तुरंत लौट आये। हाल मे ही जीवानन्द की बहन निमाई की शादी भैरवीपुर मे हुई थी। बहनोई के साथ जीवानंद का प्रेम था। जीवानंद शांति को लेकर वही गये। बहनोई ने उन्हे थोड़ी जमीन दी; जीवानन्द ने उस पर एक कुटी का निर्माण किया और वही शांति के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। स्वामी के सहवास मे शांति का पुरुष भाव धीरे-धीरे गायब होने लगा। सुख स्वप्न की तरह उनका जीवन बीतने लगा। लेकिन सहसा वह सुख स्वप्न भंग हो गया- सत्यानन्द के हाथ मे पड़कर जीवानन्द सन्तान धर्म ग्रहण कर शान्ति का परित्याग कर चले गये। पतित्याग के बाद यह प्रथम मिलन निमाई के प्रयत्न से हुआ, जिसका वर्णन पूर्व परिच्छेद मे हो चुका है। जीवानन्द के चले जाने पर शान्ति निमाई के दरवाजे पर जा बैठी। निमाई गोद मे लड़की को लेकर उसके पास आ बैठी। शांति की आंखो में नही है, उसने उन्हे पोछ डाला है, बल्कि चेहरे पर मधुर मुस्कराहट हैं। फिर भी वह कुछ तो गम्भीर चिन्तायुक्त अनमनी सी दिखाई पड़ती ही है, उसे देखकर निमाई बोली- “मुलाकात तो हो गयी न?” शान्ति ने कोई उत्तर नही दिया, वह चुप रही। निमाई ने देखा कि शान्ति किसी तरह मन का भाप न बताएगी। शान्ति मन की बताना पसन्द भी नही करती, यह जानती हुई भी निमाई ने बात का ठर्रा उठाया, बोली- “बता दो भाभी! यह कन्या कैसी है?” शान्ति ने कहा- “यह लड़की कहां से पायी -तेरे लड़की कब हुई रे।‘ “मेरी नही, दादा की है!” निमाई ने शान्ति को जलाने के लिए यह बात कही थी, “दादा की लड़की“ माने यह कि उसने भाई से यह लड़की पायी है। लेकिन शान्ति ने यह न समझा कि निमाई उसे चिढ़ाने के लिए कह रही है। अतएव शान्ति ने उत्तर दिया -“मै लड़की के बाप की बात नही पूछती हूं, मैं यह पूछती हूं कि इस लड़की की मां कौन हैं?” निमाई उचित दण्ड पाकर अप्रतिभ होकर बोली-“कौन जाने किसकी लड़की है, दादा क्या जाने कहां से पकड़कर उठा लाये हैं - पूछने का भी अवसर न मिला। आजकल अकाल के दिनो मे कितने लोग लड़के- बच्चे फेक जाते है। मेरे ही पास कितने लोग अपनी सन्तान बेचने के लिए आये थे। लेकिन दूसरो के बाल- बच्चो को ले कौन?” (फिर उन आंखो मे सहसा जल भर आया और निमाई ने उसे पोछ डाला) “लड़की है बड़ी सुन्दर! भोली-भाली, गोरी-चिट्टी देखकर दादा से मैने मांग ली है।‘ इसके बाद शान्ति की निमाई के साथ अनेक तरह की बाते होने लगी। फिर निमाई के पति को घर लौट आते देख शान्ति उठकर कुटी मे चली गयी। कुटी मे पहुंचकर उसने अपना दरवाजा बन्द कर लिया। इसके बाद चूल्हे की जितनी राख वह बटोर सकी, बटोर ली। बची हुई राख के ऊपर जो अपने खाने के लिए उसने चावल पका रखे थे, उन्हे भी वहां से हटा दिया। इसके उपरान्त बहुत देर तक सोच मे पड़ी रही और फिर आप-ही-आप बोली- “इतने दिनो से जो सोच रखा था, आज वही करूंगी। जिस आशा से इतने दिनो तक नही किया, आज सफल हुई-सफल क्यो, निष्फल- निष्फल! यह जीवन ही निष्फल है। जो किया है वही करूंगी एक बार मे जो प्रायश्चित है, वही सौ बार मे भी
है।" यह सोचती हुई शान्ति ने भात चूल्हे मे फेंक दिया। जगल में से कन्द-मूल-फल ले आई और अन्न के बदले उन्ही को खाकर उसने अपना पेट भर लिया। इसके बाद उसने वही ढाका वाली साड़ी निकाली जिस पर निमाई का इतना आग्रह था। उसका किनारा उसने फाड़ डाला और शेष कपड़े को गेरू के रंग मे रंग दिया। वस्त्र को रगतें और सुखाते शाम हो गई। शाम हो जाने पर दरवाजा बन्द कर शान्ति बड़े तमाशे मे लग गयी। माथे के आजानुलम्बित केशो का कुछ का कुछ अंश उसने कैची से काट डाला और अलग रख दिया। बाकी बचे हुए उस कपड़े को उसने दो भागो मे विभक्त कर दिया- एक तो उसने पहन लिया और दूसरे से अपने ऊपरी अंगो को ढंक लिया। इसके बाद उसने बहुत दिनों से काम मे न लाया गया शीशा निकाला और उसमे अपना रूप देखते हुए सोचा-‘हाय! मैं क्या करने जा रही हूं?’ इसके बाद ही दुःखी हृदय से वह अपने उन काटे हुए बालो को लेकर मूंछ और दाढ़ी बनाने लगी। लेकिन उन्हे वह पहन न सकी। उसने सोचा-‘छिः! यह क्या? अभी क्या इसकी उम्र है। फिर भी बुड्ढे को चरका देने के लिए इन्हे रख लेना अच्छा है?’ यह सोचकर उसने छिपाकर उन्हे अपने पास रख लिया। इसके बाद घर में से एक बड़ा हरिणचर्म निकालकर उसने गले के पास उसे पहनकर गांठ दी और घुमाकर शरीर आवृत कर जंघो तक लटका लिया। इस तरह सज्जित होने के बाद इस नये संन्यासी ने घर मे एक बार चारो तरफ देखा। आधी रात हो जाने पर, शान्ति ने इस प्रकार संन्यासी वेश मे दरवाजा खोलकर अन्धकारपूर्ण गम्भीर वन मे प्रवेश किया। वनदेवियो ने उस एकान्त रात मे अपूर्व गायन सुना- (बंगला यथावत) (1) "दूरे उड़ि घोड़ा चढ़ि कोथा तुमी जाओ रे, समरे चलि तू आमि हाम ना फिराओ रे हरि-हरि हरि-हरि बोलो रणरंगे झांप दिबो प्राण आजि समर-तरंगे, तुमि कार कि तोमार केलो एसो संगे, रमण ते नाहिं साध, रणजय गाओ रे !' (2) पाये धरी प्राणनाथ आमा छेड़े जेओ ना, एई सुनो, बाजे घन रणजय बाजना। नापिच्छे तुरंग मोर रण करे कामना, उड़िलो आमार मन घरे आर रबो ना। रमधी ते नाहिं साथ, रणजय गाओर।‘‘ दूसरे दिन आनंदमठ के अन्दर एक कमरे मे बैठे, निरुत्साह तीन संताननायक आपस मे बातें कर रहे थे। जीवानन्द से सत्यानन्द से पूछा- ‘‘महाराज ! ईश्वर हम लोगो पर इतने अप्रसन्न क्यो है? किस दोष से हम लोग मुसलमानो से पराभूत हुए?’‘ सत्यानंद ने कहा- ‘‘भगवान अप्रसन्न नही है। युद्ध मे जय-पराजय दोनो होती है। उस दिन हम लोगो की विजय हुई थी, आज पराजय हुई है, अन्त मे फिर जय है। हमे निश्चित भरोसा है कि जिन्होने इतने दिनो तक
हमारी रक्षा की है, वे शंक -चक्र-गदाधारी वनमाली फिर हमारी रक्षा करेगे। उनके पदस्पर्श कर हम लोग जिस महाव्रत से ब्रती हुए है,अवश्य ही उस व्रत की हम लोगो को साधना करनी होगी- विमुख होने पर हमे अनन्त नरक का भोग करना पड़ेगा। हम अपने भावी मंगल के बारे मे निःसंदेह है। लेकिन जैसे देव-अनुग्रह के बिना कोई काम सिद्ध हो नही सकता, वैसे ही पुरुषार्थ की भी आवश्यकता होती है। हम लोग जो पराजित हुए उसका कारण था कि हम निःशस्त्र थे- गोली-बन्दूक के सामने लाठी, तलवार,भाला क्या कर सकता है! अतः हम लोग अपने पुरुषार्थ के न होने से हारे है। अब हमारा यही कर्तव्य है कि हमे भी अस्त्रो की कमी न हो।‘‘ जीवानन्द- ‘‘यह तो बहुत ही कठिन बात है।‘‘ सत्यानन्द-‘‘कठिन बात है, जीवानन्द? सन्तान होकर तुम मुंह से ऐसी बात निकालते हो? सन्तानो के लिए कठिन है क्या?‘‘ जीवानन्द-‘‘आज्ञा दीजिये, इनका संग्रह किस प्रकार होगा?‘‘ सत्यानन्द-‘‘संग्रह के लिए आज रात मैं यात्रा करूंगा। जब तक मैं लौटकर न आऊं, तब तक तुम लोग किसी भारी काम मे हाथ न डालना। लेकिन सन्तानो का आपस की एकता की रक्षा करना, उनके भोजन-वस्त्र की व्यवस्था करना- इसका भार तुम दोनो पर ही है। ‘‘ भवानंद ने पूछा-‘‘तीर्थयात्रा कर इन चीजो का संग्रह आप कैसे करेगे? गोला-गोली, बन्दूक, तोप खरीदकर भेजवाने मे बड़ा गोलमाल होगा; फिर आप इतना पाएंगे कहां, बेचेगा ही कौन, ले ही कौन आएगा?‘‘ सत्यानन्द -‘‘यह सब चीजें खरीदकर लाई जा नही सकती। मैं कारीगर भेजूंगा, यही तैयार करनी होगी।‘‘ जीवानन्द-‘‘क्या यही, इसी आनन्दमठ में?‘‘ सत्यानन्द-‘‘यह कैसे हो सकता है-इसके उपाय की चिंता मैं बहुत दिनो से कर रहा हूं। भगवान ने अब उसका सुयोग उपस्थित कर दिया है। तुम लोग कहते थे-भगवान प्रतिकूल है, लेकिन मैं देखता हूं कि भगवान अनुकूल है।‘‘ भवानंद-‘‘कहां कारखाना खोलेगे?‘‘ सत्यानंद-‘‘पदचिन्ह में।‘‘ जीवानंद-‘‘यह कैसे? वहां कैसे होगा?‘‘ सत्यानंद-‘‘नही तो महेन्द्रसिंह को मैंने किसलिए व्रत ग्रहण करने को इतना तैयार किया है?‘‘ भवानंद-‘‘महेन्द्र ने क्या व्रत ग्रहण कर लिया है?‘‘ सत्यानंद-‘‘व्रत ग्रहण नही किया है, लेकिन आज ही रात मे उसे दीक्षित करूंगा।‘‘ जीवानंद-‘‘कैसे? महेन्द्र को व्रत ग्रहण करने के लिए क्या उपाय हुआ है-हम लोग नही जानते। उसकी स्त्री-कन्या का क्या हुआ? उन्हे कहां रखा गया? आज नदी किनारे मैंने एक कन्या पायी थी; उसे मैने अपनी बहन के पास पहुंचा दिया है। उस कन्या के पास एक सुन्दर स्त्री मरी पड़ी हुई थी। वही तो महेन्द्र की स्त्री- कन्या नही थी? मुझे ऐसा ही भ्रम हुआ था।‘‘ सत्यानंद-‘‘वही महेन्द्र की स्त्री-कन्या थी।‘‘ भवानंद चमक उठे अब वह समझ गये कि जिस स्त्री को उन्होने पुनर्जीवित किया है, वही महेन्द्र की पी कल्याणी है। लेकिन उसकी कोई बात इस समय उठाना उन्होने उचित न समझा। जीवानंद ने पूछा-‘‘महेन्द्र की स्त्री मरी कैसे?‘‘ सत्यानंद-‘‘जहर खाकर।‘‘ जीवानंद-‘‘जहर क्यो खाया?‘‘
सत्यानंद-“ भगवान ने स्वप्न में उसे प्राण-त्याग करने का आदेश किया था।” भवानंद-“वह स्वप्नादेश क्या सन्तानो के कार्यों के लिए ही हुआ था?” सत्यानंद-“महेन्द्र से मैंने ऐसा ही सुना है। अब संध्या समय उपस्थित है, मैं संध्यादि कृत्य के लिए जाता हूं। इसके बाद नये सन्तानो की दीक्षा की व्यवस्था करूंगा।” भवानंद-“सन्तानो की? क्या महेन्द्र के अतिरिक्त और भी कोई सन्तान-सम्प्रदाय मे सम्मिलित हुआ चाहता है?” सत्यानंद-“हां, एक और नय आदमी है। अब से पहले मैने उसे कही देखा नही था। आज ही मेरे पास आया है। वह बहुत कोमल युवा पुरुष है। उसकी भाव-भंगी और बातो से मैं बहुत प्रसन्न हूं- खरा सोना जान पड़ता है वह! उसके संतान- कार्य की शिक्षा का भार जीवानंद पर है। जीवानन्द लोगो को चित्त-आकर्षण कर लेने मे बहुत पटु है।.... अब मैं जाऊंगा। तुम लोगो के प्रति मेरा एक उपदेश बाकी है। बहुत मन लगाकर उसे सुनो!” दोनो ही शिष्यो ने करबद्ध हो निवेदन किया-“आज्ञा दीजिये।” सत्यानन्द ने कहा-“तुम दोनो से यदि कोई अपराध हुआ हो, या आगे करो, तो मेरे वापस आ जाने के पहले प्रायश्चित न करना। मेरे आ जाने पर अवश्य ही प्रायश्चित करना होगा।” यह कहकर सत्यानन्द स्वामी अपने स्थान पर चले गये। भवानन्द और जीवानन्द ने एक-दूसरे का मुंह ताका। भवानन्द ने पूछा-“तुम्हारे ऊपर इशारा है क्या?” जीवानन्द-“जान तो पड़ता है! बहन के घर में कन्या को पहुंचाने गया था।” भवानन्द-“इसमे क्या दोष है? यह तो निषिद्धि नही है! ब्राह्मणी के साथ मुलाकात तो नही की है?” जीवानन्द-“जान पड़ता है, गुरुदेव ऐसा ही समझते हैं?” (4) सायंकृत्य समाप्त करने के उपरान्त सत्यानन्द स्वामी ने महेन्द्र को बुलाकर कहा-“तुम्हारी कन्या जीवित है।” महेन्द्र-“कहां है महाराज?” सत्यानन्द-“तु मुझे महाराज क्यों कहते हो?” महेन्द्र-“सब यह कहते है, इसलिए। मठ के अधिकारियो को भी राजा शब्द से सम्बोधित किया जाता है। मेरी कन्या कहां है, महाराज?” सत्यानन्द-“इसे सुनने के पहले एक बात का ठीक उत्तर दो- तुम सन्तान-धर्म ग्रहण करोगे?” महेन्द्र-“इसे मैंने मन-ही-मन निश्चित कर लिया है।” सत्यानन्द-“तब कन्या कहां है, सुनने की इच्छा न करो!” महेन्द्र-“क्यो महाराज?” सत्यानन्द-“जो यह व्रत ग्रहण करता है, उसे अपनी पी, पुत्र, कन्या, स्वजनो से किसी से भी सम्बन्ध नही रखना पड़ता-स्त्री, पुत्र, कन्या का मुंह देखने से भी प्रायश्चित करना होता है। जब तक सन्तानो की मनोकामना सिद्ध न हो, तब तक तुम कन्या का मुंह देख न सकोगे। अतएव यदि सन्तान-धर्म ग्रहण करना निश्चित हो, तो कन्या का पता पूछकर क्या करोगे? देख तो पाओगे नही।....“ महेन्द्र-“यह कठिन नियम क्यो, प्रभु?” सत्यानन्द-“संतानो का काम बहुत ही कठिन है। जो सर्वत्यागी है, उसके अतिरिक्त यह काम और किसी के
लिए उपयुक्त नही है। मायारज्जु से जिस का चित बंधा रहता है, खूंटे मे बंधी घोड़ी की तरह वह कभी स्वर्ग मे पहुंच नही सकता।‘‘ महेन्द्र-‘‘महाराज ! बात मैंने ठीक-ठीक समझी नही। जो स्त्री-पुत्र का मुंह देखता है, वह क्या किसी गुरुतर कार्य का अधिकारी नही हो सकता?‘‘ सत्यानन्द-‘‘पुत्र-कलत्र का मुंह देखने से हम देव कार्य भूल जाते है। सन्तान-धर्म का नियम काम और किसी के लिए उपयुक्त नही है।‘‘ महेन्द्र-‘‘तो क्या न देखने से ही कन्या को भूल जाऊंगा?‘‘ सत्यानन्द-‘‘यदि न भूल सको तो यह व्रत ग्रहण न करो !‘‘ सत्यानन्द- ‘‘सन्तान दो तरह के हैं-दीक्षित और अदीक्षित। जो अदीक्षित है, वे या तो संसारी है अथवा भिखारी। वे लोग केवल युद्ध के समय आकर उपस्थित हो जाते हैं ; लूट का हिस्सा या पुरस्कार पाकर फिर चले जाते हैं। जो दीक्षित होते हैं, वे सर्वस्वत्यागी हैं। यही लोग सम्प्रदाय के कर्त्ता हैं। तुम्हें मैं अदीक्षित सन्तान होने का अनुरोध न करूंगा। युद्ध के समय लाठी-लकड़ीवाले अनेक लोग हैं। बिना दीक्षित हुए सम्प्रदाय के किसी गुरुतर कार्य के अधिकारी तुम हो नही सकते।‘‘ महेन्द्र- ‘‘दीक्षा क्या है? दीक्षित क्यो होना होगा? मै तो अब से पहले ही मन्त्र ग्रहण कर चुका हूं।‘‘ सत्यानंद- ‘‘उस मंत्र का त्याग करना होगा।‘‘ महेन्द्र- ‘‘मन्त्र का त्याग करूंगा कैसे?‘‘ सत्यानन्द- ‘‘मै वह पद्धति बता देता हूं।‘‘ महेन्द्र- ‘‘नया मन्त्र क्यो लेना होगा?‘‘ सत्यानन्द- ‘‘सन्तागण वैष्णव हैं।‘‘ महेन्द्र- ‘‘यह मैं समझ नही पाता हूं कि सन्तान वैष्णव कैसे है। वैष्णवो का तो अहिंसा ही परमधर्म होता है।‘‘ सत्यानन्द- ‘‘वह चैतन्य देव का वैष्णव-धर्म है। नास्तिक बौद्ध धर्म के अनुकरण से जो वैष्णवता उत्पन्न हुई थी, उसी का लक्षण है। प्रकृत वैष्णव-धर्म का लक्षण दुष्टो का दमन और धरित्री का उद्धार है। कारण, भगवान विष्णु ही संसार के पालक हैं। उन्होने दस बार शरीर धारणकर पृथ्वी का उद्धार किया था। केशी, हिरण्यकशिपु, मधु-कैटभ, पुर, नरक आदि दैत्यो का, रावणादि राक्षसो का तथा शिशुपाल आदि का संहार उन्होने किया हैं। वही जेता, जयदाता, पृथ्वी के उद्धारकर्ता और सन्तानो के इष्ट देवता हैं। चैतन्यदेव का वैष्णव धर्म वास्तविक वैष्णव-धर्म नही है-वह धर्म अधूरा है। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय है- लेकिन भगवान केवल प्रेममय ही नही हैं, वे अनंत शक्तिमय भी हैं। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय ही नही हैं,वे अनंत शक्तिमय भी है। चैतन्यदेव के विष्णु केवल प्रेममय हैं, सन्तानो के विष्णु केवल शक्तिमय है। हम दोनो ही वैष्णव है-लेकिन दोनो ही अधूरे हैं। बात समझ गये?‘‘ महेन्द्र- ‘‘नही! यह तो कैसी नयी-नयी-सी बाते हैं। कासिमबाजार मे एक पादरी के साथ मेरी मुलाकात हुई थी। उसने भी कुछ ऐसी ही बाते कही थी। अर्थात ईश्वर प्रेममय हैं-तुम लोग यीशु से प्रेम करो-यह भी ऐसी ही बाते हैं!‘‘ सत्यानन्द- ‘‘जिस तरह की बातो से हमारे चौदह पुरखे समझते आते हैं-उसी तरह की बातो से हम तुम्हे समझा रहे हैं। ईश्वर त्रिगुणात्मक हैं- यह सुना है?‘‘ महेन्द्र- ‘‘हा, सत्व, रजस, तमस-यही तीन गुण हैं।‘‘
सत्यानंद- "ठीक । इन तीनो गुणो की पृथक-पृथक उपासना होती है । उनके सत्व से दया-दक्षिणा आदि की उत्पत्ति होती है । वे अपनी उपासना भक्ति द्वारा करते है - चैतन्य सम्प्रदाय यही करता है । रजोगुण से उनकी शक्ति की उत्पत्ति होती है; इसकी उपासना युद्ध द्वारा, देवद्वेषीगण के निधन द्वारा होती है-वही हम करते है । और तमोगुण से ही भगवान भगवान अपनी साकार चतुर्भुज आदि विविध मूर्ति धारण करते है । केसर-चन्दनादि उपहार द्वारा उस गुण की पूजा होती है-सर्व साधारण वही करते है. अब समझे?" महेन्द्र- "समझ गया-संतानगण उपासक सम्प्रदाय मात्र है ।" सत्यानंद- "ठीक है ! हम लोग राज्य नही चाहते-केवल मुसलमान भगवान के विद्वेषी है - इसलिए समूल विनाश करना चाहते है ।" सत्यानन्द बातचीत समाप्त कर महेन्द्र के साथ उठकर उस मठस्थित देवालय मे जहां विराट आकार की भगवान विष्णु की मूर्ति विराजित थी, वही पहुंचे । उस समय वहां अपूर्व शोभा थी- रजत,स्वर्ण और रत्नरंजित प्रदीपो से मंदिर आलोकित हो रहा था; राशि-राशि पुष्पो की शोभा से मंदिर और देव मूर्ति शोभित थी; सुगन्धित मधुर धूमराशि से कक्ष वस्तुतः देवसान्निध्य का प्रमाण उपस्थित कर रहा था । मंदिर मे एक और पुरुष बैठा हुआ- "हरे मुरारे" स्तोत्र का पाठ कर रहा था। सत्यानंद के वहां पहुंचते ही उसने उठकर उन्हे प्रणाम किया । ब्रह्मचारी ने पूछा- "तुम दीक्षित होगे?" उसने कहा- "मुझ पर कृपा कीजिये !" सत्यानन्द- "तुम लोग इन भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो कि संतान-धर्म के सारे नियमो का पालन करोगे !" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "जितने दिनो तक माता का उद्धार न हो, उतने दिनो तक गृहधर्म का परित्याग किये रहोगे?" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "माता-पिता का त्याग करोगे?" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "भ्राता-भगिनी?" दोनो- "त्याग करूंगा ।" सत्यानंद- "दारा-सुत ?" दोनो- "त्याग करूंगा ।" सत्यानंद- "आत्मीय-स्वजन? दास-दासी?" दोनो- "इन सबका त्याग किया ।" सत्यानंद- "धन-सम्पदा-भोग?" दोनो- "सबका परित्याग ।" सत्यानन्द- "इन्द्रियजयी होगे ? नारियो के साथ कभी एक आसन पर न बैठोगे?" दोनो- "न बैठेगे; इन्द्रियां वश मे रखेगे ।" सत्यानन्द- "भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो-अपने लिए या अपने स्वजनो के लिए अर्थोपार्जन नही करोगे ! जो कुछ उपार्जन करोगे, उसे वैष्णव धनागार को अर्पित कर दोगे !" दोनो- "देगे ।" सत्यानन्द- "सनातन-धर्म के लिए स्वयं अस्त्र पकड़कर युद्ध करोगे?"
दोनो- “करेगे।‘ सत्यानन्द- “रण मे कभी पीठ न दिखओग?” दोनो- “नही।‘ सत्यानन्द- “यह प्रतिज्ञा भंग हो तो?” दोनो- “जलती चिता मे प्रवेश कर अथवा विषपान कर प्राण त्याग देगे।‘ सत्यानन्द- “और एक बात है, और वह है जाति। तुम किस जाति के हो? महेन्द्र तो कायस्थ है। तुम्हारी जाति?” दूसरे व्यक्ति ने कहा- “मै ब्राह्मण-कुमार हूं।‘ सत्यानन्द- “ठीक। तुम लोग अपनी जाति का त्याग कर सकोगे? समस्त सन्तान एक जाति मे है। इस महाव्रत मे ब्राह्मण-शूद्र का विचार नही है। तुम लोगो का क्या मत है?” दोनो- “हम लोग भी जाति का ख्याल न करेगे। हम सब माता की सन्तान एक जाति के है।‘ सत्यानन्द- “अब मै तुम लोगो को दीक्षित करूंगा। तुम लोगों ने जो प्रतिज्ञा की है, उसे भंग न करना। भगवान मुरारि स्वयं इसके साक्षी हैं। जो रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, जरासन्ध, शिशुपाल आदि के विनाश-हेतु है, जो सर्वान्तर्यामी है, सर्वजयी है, सर्व शक्तिमान है और सर्वनियन्ता है, जो इन्द्र के वज्र को भी बिल्ली के नाखूनो के समान समझते हैं, वही प्रतिज्ञा-भंगकारी को विनष्ट कर अनन्त नरकवास देगे।‘ दोनो- “तथास्तु!‘ सत्यानन्द- “अब तुम लोग गाओ- “वन्देमातरम-“ दोनो ने मिलकर एक एकांत मन्दिर मे भक्ति-भावपूर्वक मातृगीत का गान किया। इसके बाद ब्रह्मचारी ने उन्हे यथाविधि दीक्षित किया। दीक्षा समाप्त होने के बाद सत्यानन्दजी महेन्द्र को एक बहुत ही एकांत स्थान मे ले गये। दोनो के वहां बैठने के बाद सत्यानन्द ने कहना आरम्भ किया-“वत्स! तुमने तो यह महाव्रत ग्रहण किया हैं, उससे मुझे जान पड़ता है कि भगवान सन्तानो पर सदय है। तुम्हारे द्वारा माता का महत कार्य सिद्ध होगा। तुम ध्यानपूर्वक मेरी बाते सुनो! तुम्हें जीवानन्द, भगवान के साथ वन-वन घूमकर युद्ध करना नही पड़ेगा। तुम पदचिन्ह मे वापस लौट जाओ। अपने घर मे रहकर ही तुम्हे सन्तान-धर्म का पालन करना होगा।‘ यह सुनकर महेन्द्र विस्मित और उदास हुए, लेकिन कुछ बोले नही। ब्रह्मचारी कहने लगे- “इस समय हम लोगो के पास आश्रय नही है, ऐसा स्थान नही है कि यदि प्रबल सेना आकर घेरकर आक्रमण करे तो हम लोग खाद्यादि के साथ फाटक बन्द कर कुछ दिनो तक युद्ध कर सके। हम लोगो के पास गढ़ नही है। वहां अट्टालिका भी तुम्हारी है, गांव भी तुम्हारे अधिकार मे है-मेरी इच्छा हैं कि अब वहां एक गढ़ तैयार हो। परिखा प्राचीर द्वारा पदचिन्ह को घेर देने से-उसमे खाई, खन्दक आदि युद्धोपयोगी किले-बन्दी कर देने से और जगह- जगह तोपे लगा देने से बहुत ही उत्तम गढ़ तैयार हो सकता है। तुम घर जाकर रहो, क्रमशः दो हजार संतान वहां जाकर उपस्थिति होगे। उन लोगों के द्वारा खाई-खन्दक प्राचीर आदि तैयार कराते रहो। वहां तुम्हे एक लौह- कक्ष बनवाना होगा; वही संतानो का अर्थ-भण्डार होगा। मै एक-एक कर सोने से भरे हुए संदूक तुम्हारे पास भेजवाऊंगा। तुम उसी धनराशि से यह सब तैयार कराओ। मै परदेश जाता हूं। वहां से उत्तम कारीगर भेजूंगा। उनके आ जाने पर तुम पदचिन्ह मे कारखाना स्थापित करो। वहां तोपै, गोले, बारूद, बन्दूक आदि निर्माण कराओ। इसीलिए मैं तुम्हे घर जाने को कहता हूं।....“ महेन्द्र ने स्वीकार कर लिया।
पैर छूकर महेन्द्र के विदा होने पर, उनके संग उसी दिन जो दूसरा शिष्य दीक्षित हुआ था, उसने आकर सत्यानन्द को प्रणाम किया। सत्यानन्द ने उसे आशीर्वाद देकर बैठाया। इधर-उधर की मीठी बाते होने के बाद स्वामीजी ने कहा- "क्योजी, भगवान कृष्ण मे तुम्हारी प्रगाढ़ भक्ति है या नही!" शिष्य ने कहा- "कैसे बताऊं? मैं जिसे भक्ति समझता हूं, शायद वह भंडैती या आत्मप्रतारणा हो!" सत्यानन्द ने सन्तुष्ट होकर कहा- "ठीक है, जिससे दिन-प्रतिदिन भक्ति का विकास हो, ऐसी ही कोशिश करना। मैं आशीर्वाद देता हूं, तुम्हारी साधना सफल हो! कारण तुम अभी उम्र मे बहुत युवा हो। वत्स! क्या कहकर बुलाऊं- अब तक मैने पूछा नही।" नवसन्तान ने कहा- "आपकी जो अभिरुचि हो! मैं तो वैष्णवो का दासानुदास हूं।" सत्यानन्द- "तुम्हारी नई उम्र देखकर तुम्हे नवीनानन्द बुलाने की इच्छा होती है, अतः तुम अपना यही नाम रखो! लेकिन एक बात पूछता हूं, तुम्हारा पहले क्या नाम था? यदि बताने मे कोई बाधा हो, तब भी बता देना। मुझसे कहने पर बात दूसरे कान मे न पहुंचेगी। सन्तानधर्म का मर्म यही है कि जो अवाच्य भी हो, उसे भी गुरू से कह देना चाहिए। कहने मे कोई हानि न होगी।" शिष्य- "मेरा नाम शान्ति देव शर्मा है।" सत्यानन्द- "तुम्हारा नाम शान्तिमणि पापिष्ठा है।" यह कहकर सत्यानन्द ने शिष्य की डेढ़ हाथ लम्बी काली-काली दाढ़ी को बांए हाथ से पकड़कर खींच लिया, नकली दाढ़ी अलग हो गयी। सत्यानन्द ने कहा- "छिः बेटी! मेरी साथ ठगी? - और मुझे ही ठगना था तो इस उम्र मे डेढ़ हाथ की दाढ़ी क्यो? और दाढ़ी तो दाढ़ी, यह कण्ठ का स्वर- यह आंखों की कोमल दृष्टि छिपा सकती हो? मैं यदि ऐसा ही निर्बोध होता तो क्या इतने बड़े काम मे कभी हाथ डालता?" बेशर्म शान्ति कुछ देर तक अपनी आंखो को हाथ से ढांके बैठी रही। इसके बाद ही उसने हाथ हटाकर वृद्ध पर मोहक तिरछी चितवन डालकर कहा- "प्रभु! तो इसमें दोष ही क्या है? स्त्री के बाहुओ मे क्या बल नही रहता?" सत्यानन्द- "गोषपद मे जितना जल होता है!" शान्ति- "सब सन्तानो के बाहुबल की परीक्षा कभी आपने की है?" सत्यानन्द- "की है।" यह कहकर सत्यानन्द एक इस्पात का धनुष और लोहे का थोड़ा तार ले आये। उसे शांति को देते हुए उन्होने कहा- "इसी इस्पात के धनुष पर लोहे के तार की डोरी चढ़ानी होगी। प्रत्यंचा का परिणाम दो हाथ है। डोरी चढ़ाते-चढ़ाते धनुष सीधा हो जाता है और चढ़ानेवाले को दूर फेक देता है। जो इसे चढ़ा सकता है, वही वास्तव में बलवान है।" शांति ने धनुष और तार को अच्छी तरह देखकर पूछा- "सभी संतान क्या इस परीक्षा मे उत्तीर्ण हुए है!" सत्यानन्द- "नही, इसके द्वारा केवल उन लोगो के बल की थाह ले ली है।" शांति- "क्या कोई भी इस परीक्षा मे उत्तीर्ण हो नही सका?" सत्यानंद- "केवल चार व्यक्ति।" शान्ति- "क्या मैं पूछ सकती हूं कि वे कौन-कौन है?" सत्यानंद- "हां, कोई निषेध नही है- एक तो मैं स्वयं हूं।" शांति- "और?"
सत्यानंद- “जीवानन्द, भवानंद और ज्ञानानन्द।' शांति ने धनुष और तार लिया; एक झटके मे उस पर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसने धनुष सत्यानंद के पैरों पर फेक दिया। सत्यानंद विस्मित और स्तंभित हुए खड़े रह गये। कुछ देर बाद बोले- “यह क्या! तुम देवी हो या दानवी।“ शांति ने हाथ जोड़कर कहा- “मैं सामान्य मानवी हूं, लेकिन ब्रह्मचारिणी हूं।“ सत्यानंद- “इससे क्या हुआ! तुम क्या बाल विधवा हो? नही, लेकिन बाल- विधवा मे भी इतना बल नही होता, वह तो एकाहारी होती है।“ शांति- “मै सधवा हूं।“ सत्यानन्द- “तो क्या तुम्हारे स्वामी का पता नही है- निरुद्दिष्ट है?” शांति- “नही, उनका पता है; उन्ही के उद्देश्य से मैं यहां आयी हूं।“ मेघ हटकर सहसा निकल आनेवाली धूप की तरह सत्यानंद की स्मृति जाग पड़ी है। उन्होने कहा- “याद आ गया। जीवानंद की पत्नी का नाम शांति है। तुम क्या जीवानन्द की ब्राह्मणी हो? अब शांति शरमा गयी। उसने अपनी जटा से मुंह ढांक लिया मानो कितने ही हाथियो के झुण्ड पद्म पर घिर गये हो। सत्यानन्द ने पूछा - “क्यो तुम यह पापाचार करने आयी? सहसा शान्ति ने चेहरे पर से जटाएं हटाते हुए कहा- “इसमे पापाचरण क्या है,प्रभु? पत्नी यदि पति का अनुसरण करे, तो यह पापाचरण कैसे है। संतान धर्मशास्त्र मे यदि इसे पापाचार कहते है तो सन्तान धर्म अधर्म है। मै उनकी सहधर्मिणी हूं। वे धर्माचरण मे प्रवृत्त है, मैं भी उनके साथ धर्माचरण मे सहयोग देने के लिए ही आयी हूं। शान्ति की तेजस्विनी वाणी सुनकर,उन्नत ग्रीव स्फीतवक्ष, कम्पित अधर तथा उज्ज्वल फिर भी आंसू भरी आंखें देखकर सत्यानन्द बहुत प्रसन्न हुए; बोले-“तुम साध्वी हो; लेकिन देखो बेटी- पत्नी केवल गृहधर्म मे ही सहधर्मिणी होती है- वीर-धर्म मे रमणी क्या सहयोग करेगी?” शान्ति- “कौन अपत्नीक होकर आज तक महावीर हो सका है? सीता के न रहते क्या रामवीर हो सकते? अर्जुन के कितने विवाह हुए थे, जरा गिनिये तो? भीम को जितना बल था, उतनी ही क्या उनकी पत्नियां नही थी? कितना गिनाऊँ? फिर क्या आपको बताने की जरूरत है?” सत्यानन्द-“बात ठीक है, लेकिन रणक्षेत्र मे कौन वीर अपनी पत्नी को संग लेते है?” शान्ति- “अर्जुन ने जब दानवी सेना के साथ अन्तरिक्ष मे युद्ध किया था, तो उनके रथ को कौन चला रहा था? द्रौपदी के संग न रहते क्या पाण्डव कभी कुरुक्षेत्र मे जूझ सकते थे?” सत्यानन्द-“वह हो सकता हे, लेकिन सामान्य मनुष्यो का हृदय स्त्रियो मे आसक्त रहता है और वही उन्हे कार्य से विरत करता है। इसीलिए सन्तानो का यह व्रत हैं कि वे कभी स्त्री के साथ एकासन पर न बैठेंगे। जीवानन्द मेरा दाहिना हाथ है। क्या तुम मेरा दाहिना हाथ काट देने के लिए आयी हो? शान्ति- “मै आपके हाथ मे बल बढ़ाने के लिए आयी हूं। मैं ब्रह्मचारिणी हूं, और प्रभु के समीप ब्रह्मचारिणी ही रहूंगी। मैं केवल धर्माचरण के लिए आयी हूं, स्वामी-दर्शन के लिए नही- विरह यंत्रणा से मैं कातर नही हूं। पतिदेव ने जो धर्म ग्रहण किया है, मैं उसकी भागिनी क्यो न बनूं? इसीलिये आयी हूं।“ सत्यानन्द- “अच्छा तो कुछ दिन तुम्हारी परीक्षा करके देखूंगा।“ शान्ति बोली- “क्या मैं आनन्द मठ मे रह सकूंगी?” सत्यानन्द-“आज और कहां जाओगी?” शान्ति- “इसके बाद?”
सत्यानन्द- “मां भवानी की तरह तुम्हारे ललाट पर अग्नि तेज है, सन्तान सम्प्रदाय को क्यो भस्म करोगी?” इसके बाद आशीर्वाद देकर सत्यानन्द ने शांति को विदा किया। शांति मन ही मन बोली-“रहो बूढ़े भगवान! मेरे कपाल मे आग है? मै मुंहजली हूं कि तेरी दादी मुंहजली है? वस्तुतः सत्यानन्द का वह अभिप्राय नही था- आंखो के विद्युत प्रकाश से ही उनका मतलब था लेकिन यह बात क्या बुड्ढो को युवतियो से कहनी चाहिये? उस रात शांति को मठ मे रहने की अनुमति मिली थी, इसीलिए वह कमरा खोजने लगी। अनेक कमरे खाली पड़े हुए थे। गोवर्द्धन नाम का एक परिचारक था- वह भी छोटी पदवी का सन्तान था- वह हाथ मे प्रदीप लिये हुए शांति को कमरे दिखाने लगा। कोई कमरा शांति को पसन्द न आया। हताश होकर गोवर्द्धन शांति को सत्यानन्द के पास वापस ले जाने लगा। शांति बोली- भाई सन्तान! इधर की तरफ जो कई कमरे हैं, उन्हे तो नही देखा गया!“ गोवर्द्धन बोला- वह सब कमरे हैं तो अवश्य बहुत सुन्दर किन्तु उनमे सन्तान लोग हैं।‘‘ शांति- उसमे कौन कौन हैं?‘‘ गोवर्द्धन- बड़े बड़े सेनापति हैं।‘‘ शांति- बड़े बड़े सेनापति वे सेनापति कौन हैं?‘‘ गोवर्द्धन- भवानन्द, जीवानन्द, धीरानन्द, ज्ञानानन्द- आनन्द मठ आनन्दमय है!‘‘ शांति- चलो न, जरा वे कमरे देख आएं।‘‘ गोवर्द्धन पहले शांति को धीरानन्द के कमरे मे ले गया। धीरानन्द महाभारत का द्रोणपर्व पढ़ रहे थे- अभिमन्यु ने किस तरह सप्तमहारथियो के साथ युद्ध किया था, इसी मे उनका चित्त निविष्ट था। वे कुछ न बोले। शांति बिना कुछ बोले-चाले आगे बढ़ गयी। इसके बाद शांति ने भवानन्द के कमरे मे प्रवेश किया। उस समय भवानन्द उर्ध्वदृष्टि किये किसी के चेहरे की याद मे तल्लीन थे। किसका चेहरा, यह नही जानते, लेकिन चेहरा बड़ा सुन्दर है- कृष्ण-कुंचित सुगन्धित अलकराशि आकर्णप्रसारी भ्रूयुग के ऊपर पड़ी हुई हैं, मध्य मे अनद्य त्रिकोण ललाट देश है, उस पर मृत्यु की कराल कालछाया ग्रहण की तरह जान पड़ती है- मानो वहां मृत्यु और मृत्युंजय में द्वन्द्व हो रहा हो! नयन मूंदे हुए, भौंहे स्थिर, ओठ नीले, गाल पीले, नाक शीतल, वक्ष उन्नत, वायु कपड़े को हिला रही है। इसके बाद ही जैसे शरतमेघ मे विलुप्त चन्द्रमा क्रमशः मेघदल को अतिक्रम कर अपना सौंदर्य विकसित करता है; जैसे प्रभात का सूर्य तरंगाकृति मेघमाला को क्रमशः सुवर्णरंग से रंजित कर स्वयं प्रदीप्त होता है, दिगमण्डल को आलोकित करता है, स्थल, जल, कीट-पतंग सबको प्रफुल्ल करता है- वैसे ही उस शांत देह मे आनंदमयी शोभा का संचार हो रहा था। आह! कैसी अनुपम शोभा थी! भवानन्द यही ध्यान कर रहे थे, अतः उन्होंने भी कोई बात न कही। कल्याणी के रूप से उनका हृदय कातर हो गया था, शांति के रूप की तरफ उन्होने ध्यान ही न दिया। इसके उपरांत शांति तीसरे कमरे मे गई। उसने पूछा-‘‘यह किसका कमरा है?‘‘ गोवर्द्धन बोला-‘‘जीवानंद स्वामी का।‘‘ शांति-‘‘यहां कौन है? कहां, इस कमरे मे तो कोई नही है।‘‘ गोवर्द्धन-‘‘कही गए होगे, अभी आ जाएंगे।‘‘
शांति-‘'यह कमरा सब कमरो से उत्तम है ।‘‘ गोवर्द्धन-‘'भला यह कमरा ऐसा न होगा !‘‘ शांति-‘'क्यो ?‘‘ गोवर्द्धन- ‘'जीवानंद स्वामी इसमे रहते है न !‘‘ शांति-‘'मै इसी मे रह जाती हूं, वह कोई दूसरा कमरा खोज लेगे ।‘‘ गोवर्द्धन-‘'भला ऐसा भी हो सकता हैं? जो इस कमरे मे रहते है, उन्हे चाहे मालिक समझिये, या जो चाहे समझिए- जो कहते है, वही होता है ।‘‘ शांति-‘'अच्छा तुम जाओ, मुझे यदि जगह न मिलेगी तो पेड़ के नीचे पड़ी रहूंगी !‘‘ यह कहकर गोवर्द्धन को बिदा कर शांति उसी कमरे मे घुसी ! कमरे मे घुसकर शांति जीवानंद का कृष्णाजिन बिछाकर और दीपक तेज कर उनकी रखी एक किताब पढ़ने लगा। कुछ देर बाद जीवानंद उपस्थित हुए ! शांति का यद्यपि पुरुष वेश था, फिर भी उन्होने आते ही पहचान लिया, बोले-‘'यह क्या? शांति ?‘‘ शांति न धीरे-धीरे पुस्तक रखकर जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा-‘'महाशय ! शांति कौन है ?‘‘ जीवानंद भैंचक्के से रह गए, अंत मे बोले-‘'शांति कौन है? क्यो, क्या तुम शांति नही हो ?‘‘ शांति उपेक्षा के साथ बोली-‘'शांति कौन है? क्यो, क्या तुम शांति नही हो ?‘‘ शांति उपेक्षा के साथ बोली- ‘‘मै नवीनानंद स्वामी हूं ।‘‘ यह कहकर वह फिर पुस्तक पढ़ने लगी। जीवानंद खखाकर हंस पड़े, बोले-‘'यह नया तमाशा बढ़िया है ! अच्छा श्री श्री नवीनानंद जी ! क्या सोचकर यहां पहुंच गए ?‘‘ शांति बोली-‘'यह नया तमाशा बढ़िया है ! अच्छा भले आदमियो मे रिवाज है कि पहली मुलाकात मे ‘आप’-‘श्रीमान’-‘महाशय’ आदि शब्दो से संबोधन करना चाहिए। मै भी आपसे असम्मान-जनक रूप मे बाते नही करता हूं। तब आप मुझे ‘तुम-तुम’ क्यो कहते है ?‘‘ ‘‘जो आज्ञा‘‘-कहकर गले मे कपड़ा डालकर हाथ जोड़कर जीवानंद ने कहा- ‘‘अब विनीत भाव से भृत्य का निवेदन है, कि किस कारण भैरवीपुर से इस दीन-भवन मे महाशय का शुभागमन हुआ है? आज्ञा किजिए !‘‘ शांति ने अति गंभीर भाव से कहा-‘'व्यंग्य की कोई आवश्यकता नही है। मै भैरवीपुर को पहचानता ही नही। मै संतानधर्म ग्रहण करने के लिए आज आकर दीक्षित हुआ हूं ।‘‘ जीवानंद-‘'अरे सर्वनाश ! क्या सचमुच ?‘‘ शांति-‘'सर्वनाश क्यो ? आप भी तो दीक्षित है !‘‘ जीवानंद-‘'तुम तो स्त्री हो !‘‘ शांति-‘'यह कैसे? ऐसी बात आपने कैसे सुनी ?‘‘ जीवानंद-‘'मेरा विश्वास था कि मेरी ब्राह्मणी? स्त्री है !?‘‘ शांति-‘'ब्रह्यणी? है या नही ?‘‘ जीवानंद-‘'थी तो जरूर !‘‘ शांति-‘'आपको विश्वास है कि मै आपकी ब्राह्मणी हूं ?‘‘ जीवानंद ने फिर गले मे कपड़ा डालकर बड़े ही विनीत भाव से कहा-‘'अवश्य महाशयजी !‘‘
तृतीय खण्ड: सत्यानन्द की दीक्षा व सन्तान सेना युद्ध
शांति- “यदि ऐसी मजाक की बात आपके मन मे है, तो सही, आपका कर्तव्य क्या है?” जीवानंद- “आपके शरीर के कपड़ो को बलपूर्वक हटा देने के बाद अधर-सुधापान!” शांति- “यह आपकी दृष्ट-बुद्धि है, या मेरे प्रति असाधारण भक्तिका परिचय मात्र है! आपने दीक्षा के अवसर पर शपथ ली है कि स्त्री के साथ एकासन पर कभी न बैठूंगा। यदि आपका यह विश्वास हो कि मै स्त्री हूं-ऐसा सर्प-रज्जु भ्रम अनेक को होता है- तो आपके लिए उचित यही है कि अलग आसन पर बैठे। मुझसे तो आपको बात भी नही करनी चाहिए!” यह कहकर शांति ने फिर पुस्तक पाठ मे मन लगाया। अंत मे परास्त होकर जीवानंद पृथक शय्या-रचना कर लेट गए। भगवान की अनुकंपा से 76 वे बंगाब्द का अकाल समाप्त हो गया। बंगाल प्रदेश के छः आना मनुष्यो को-नही कह सकते, कितने कोटि-यमपुरी को भेजकर वह दुर्वत्सर स्वयं काल के गाल मे समा गया। 77वे वर्ष मे ईश्वर प्रसन्न हुए। सुवृष्टि हुई, पृथ्वी शस्यश्यामला हुई; जो लोग बचे थे, उन्होने पेट भरकर भोजन किया। अनेक अनाहार या अल्पाहार से बीमार पड़ गए थे, पूरा आहार सह नही सके। बहुतेरे इसी मे मरे। पृथ्वी तो शस्यश्यामलिनी हुई, लेकिन जनशून्या हो गयी। बंगाल प्रदेश जंगलो से भर गया। जहां हंसती हुई हरियाली भूमि थी, जहां असंख्या गो-महिषो की चरने की भूमि थी, जो गांव की भूमि युवक-युवतियो की प्रमोद-भूमि थी-वह सब महारण्य मे परिणत होने लगी। इसी तरह एक वर्ष गया, दो वर्ष गए, तीन वर्ष गए। जंगल बढ़ते ही जाते थे। जो मनुष्यो के सुख के स्थान थे, वहां हिंसक शेर आदि पशु आकर हरिणो पर धावा बोलने लगे। दल बांधकर जहां सुंदरियां आलता-रंजित चरणो से पायजेब आदि पशु आकर हरिणो पर धावा बोलने लगे। दल बांधकर जहां सुंदरियां आलता-रंजित चरणो से पायजेब आदि की झनकार करती हुई, वृद्धाओ के साथ व्यंग करती हुई, हंसती हुई गुजरा करती थी, वही अब भालुओ ने अपने बच्चो को लालन-पालन शुरू किया है। जहां छोटी उम्र के बालक सांयकाल के समय जुटकर, फूले हुए पुष्प जैसा हृदय लेकर मनमोहक हंसी से स्थान गुंजया करते थे, अब वहां श्रृंगालो के विवर है। नाट्यमंदिरो मे दिन के समय सर्पराजो की भयंकर फुफकार सुनाई पड़ती है। अब बंगाल मे अन्न होता है; लेकिन कोई खाने वाला नही है। बिक्री के लिए पैदा करते है, लेकिन कोई खरीददार नही है। कृषक अनाज पैदा करते है, पर पैसे नही मिलते। जमीदार को वे लगान दे नही सकते। राजा के जमीदारी छीन लेने पर जमीदार सर्वहृत होकर दरिद्र हो गए। वसुमती के बहु-प्रसविनी होने पर भी जनता कंगाल हो गयी। चोर-डाकुओ ने माथा उठाया और साधु पुरुषो ने घर मे मुंह छिपाया। इधर संतान-संप्रदाय नित्य चंदन-तुलसी से विष्णु-पादपद्मो की पूजा करने लगा। जिनके घर मे पिस्तौल- बंदूके थी, संतानगण उससे वह छीन लाए। भवानंद ने सहयोगियो से कह दिया था-“भाई! यदि किसी घर मे मणि-माणिक्य गंजा हो और एक टूटी हुई बंदूक भी हो, तो बंदूक ले आना, धन-रत्न छोड़ देना।” इसके बाद ये लोग गांव-गांव मे अपने गुप्तचर भेजने लगे। पर लोग जहां हिंदू होते थे, कहते थे “भाई! विष्णु-पुजा करोगे!” इसी तरह बीस-पचीस संतान किसी मुसलमान बसती मे पहुंच जाते और उनके घर मे आग लगा देते थे; उनका सर्वस्व लूटकर हिंदू विष्णु-पुजको मे उसे वितरित कर देते थे। लूट का भाग पाने पर लोगो के प्रसन्न होने पर उन्हे संतानगण मंदिर मे लाकर विष्णुचरणो पर शपथ खिलाकर संतान बना लेते थे। लोगो ने देखा कि संतान होने मे बड़ा लाभ है। विशेषतः मुसलमानो राजत्वकाल मे उनकी अराजकता और कुशासन से लोग ऊब उठे थे। हिंदू धर्म की विलोपावस्था के समय अनेक हिंदू अपने देश मे हिंदुत्व-स्थापन के लिए व्यग्र हो रहे थे। अतः दिन-प्रतिदिन संतानो की संख्या बढ़ने लगी। प्रतिदिन सौ-सौ, मास मे हजार- हजार की संख्या मे ग्रामीण लोग संतान बनाकर उनकी संख्या वृद्धि कर मुसलमानो को शासन से विरत करने
लगे। जीवानंद और भवानंद के पदपद्मो मे प्रणाम कर संतानो की संख्या अनंत होने लगी। जहां वे लोग राजपुरुषो को पाते थे, अच्छी तरह मरम्मत करते थे, मुसलमानो के गांव भस्म कर राख बनाए जाने लगे। स्थानीय मुसलमान नवाब यह सुनकर दल-के-दल सैनिको को इनके दमन के लिए भेजते थे; लेकिन उस समय तक संतान गण दलबद्ध, शस्त्रयुक्त और महादंभशाली हो गए थे। उनके तेज के आगे मुस्लिम फौज अग्रसर हो न पाती थी; यदि आगे बढ़ती थी तो अमित संख्या मे संतान-सैन्य उस पर आक्रमण कर उनको धुनकी हुई रुई की तरह उड़ा देती थी। कभी कोई दल यदि परास्त होता या, तो तुरंत दूसरा बड़ा दल आकर उस मुस्लिम फौज का सर उड़ा देता था और मत होकर हरिनाम का जयघोष करता, नाचता गायब हो जाता था। उस समय लब्धप्रतिष्ठ अंग्रेज कुल के प्रातः सूर्य वारेन हेस्टिंग्स भारतवर्ष के गवर्नर-जनरल थे। कलकत्ते मे बैठे हुए वे राजनीतिक श्रृंखला की कड़ियां गिन रहे थे कि इसी से वे समूचे भारत को बांध लेगे। एक दिन भगवान ने भी सिंहासन पर बैठकर निःसंदेह कहा था- तथास्तु ! लेकिन वह दिन अभी दूर था। आजकल तो संतानो की दिगंत-व्यापिनी हरिध्वनि से वारेन हेस्टिंग्स भी कांप उठे थे। हेस्टिंग्स साहब ने पहले तो देशी फौज से विद्रोह दबाने की चेष्टा की थी। लेकिन उन देशी सिपाहियो की यह दशा हुई कि वे लोग एक बुड्ढी औरत के मुंह से भी यदि हरिनाम सुन पाते थे, तो भागते थे, अंत मे निरूपाया होकर वारेन हेस्टिंग्स ने कप्तान टॉमस नामक एक सुदक्ष सेनापति के अधिनायकत्व मे थोड़ी गोरी फौज भेजकर विद्रोह-दमन का यत्न किया। कप्तान टॉमस विद्रोह- निवारण के लिए बहुत ही उत्तम उपाय करने लगे। उन्होने अपनी गोरी पल्टन के साथ नवाब की सेना और जमीदारो के आदमी मिलाकर एक अत्यंत बलिष्ठ सेना तैयार कर ली। इसके बाद उस सम्मिलित सैन्य के टुकड़े-टुकड़े कर उपयुक्त नायको के हाथ मे उन्होने सौंप दिया। साथ ही उन लोगो को छोटे-छोटे निश्चित अंचलों मे विभक्त कर दिया; कह दिया कि जहां संतानो को पाओ, पशु की तरह मारो और हंकाओ। गोरी सैन्य दम्भ की बोतल छान संगीन चढ़ाकर हुई। लेकिन टॉमस की सेना, जैसे खेती काटी जाती है, वैसे ही काटी जाने लगी। हरिध्वनि से टॉमस के कान बहरे हो गए; क्योकि उस समय संतान असंख्य थे और प्रदेश भर मे फैले हुए थे। कम्पनी की उस समय अनेक कोठियां थी। ऐसी ही एक कोठी शिवग्राम मे थी। डॉनीवर्थ साहब इस कोठी के अध्यक्ष थे। उस समय रेशम-कोठी की रक्षा का बहुत ही अच्छा प्रबन्ध हुआ करता था। डॉनीवर्थ ने इसी वजह से किसी तरह अपनी प्राणरक्षा की। लेकिन अपनी स्त्री-कन्या को कलकत्ता भेज देने के लिए उन्हे बाध्य होना पड़ा था; कारण-डॉनीवर्थ सन्तानो द्वारा बहुत ही पीड़ित हुए थे। उसी समय टॉमस साहब थोड़ी फौज लेकर उस अंचल मे पहुंच गये। उस समय कितने ही डोम,चमार,लंगड़े-लूले भी पराया धन लूटने के लिए उत्साहित हो गये थे। उन सबो ने जाकर कप्तान टॉमस की रसद पर आक्रमण किया। कप्तान साहब बहुत अधिक मात्रा मे खाद्य-सामग्री- घी, मैदा, सूजी, चावल गाड़ियो पर लदवाकर ले आ रहे थे। इसे देखकर डोम-चमारो का दल अपना लोभ संवरण कर न सका- उन सबने जाकर गाड़ी पर आक्रमण किया; लेकिन सिपाहियो की दो-चार संगीने खाकर सब भागे। कप्तान टॉमस ने उसी समय कलकत्ते रिपोर्ट भेजी कि आज कुल 157 (एक सौ संतावन )सिपाहियो को लेकर मैंने 14730 विद्रोहियो को परास्त किया है। विद्रोहियों के 2153 (इक्कीस सौ तिरेपन) व्यक्ति मरे, 1223 घायल हुए और 7 व्यक्ति बन्दी हुए। केवल अन्तिम संख्या सत्य थी। कप्तान टॉमस ने द्वितीय ब्लेनहम या रसवाक का युद्ध जीता- यह सोचते हुए वे अपनी मूछो पर ताव देते हुए इधर-उधर ठाट से घूमने लगे। उन्होने डॉनीवर्थ से कहा- “अब क्या डरते हो? बस, विद्रोहियो का दमन हो गया! अब अपनी स्त्री-कन्या का कलकत्ते से बुला
लो।'' इस पर डॉनीवर्थ ने उत्तर दिया- ‘‘ऐसा ही होगा! आप दस दिन यहां ठहरिये, देश को जरा और शांत होने दीजिये, फिर बुला लेगे।’’ डॉनीवर्थ के पास पल्टन की मुर्गियां पली हुई थी और उनके यहां का पानी भी बहुत अच्छा था। विभिन्न वन्यपक्षी उनके टेबल की शोभा बढ़ाते थे। दाढ़ीवाला बावर्ची मानो द्वितीय द्रौपदी था। अतः बिना कुछ बोले- चाले कप्तान टॉमस वही डटे रहने लगे। इधर भवानंद मन ही मन व्यस्त हैं कि कब इस कप्तान का सर काटकर द्वितीय शम्बरारि की उपाधि धारण करूं । अंग्रेज इस समय भारत्तोद्वार के लिए(?) आये हैं, ये संतानगण तब तक समझ न सके थे। कैसे समझते? कप्तान टॉमस के सम-सामयिक भी उस समय यह न समझ सके थे कि भारतवर्ष पर हमारा राज्य स्थापित हो सकेगा। उस समय भविष्य तो विधाता ही जानते थे! भवानंद मन मे सोचते थे कि इस असुर- वंश का एक दिन मे निपात करूंगा; सब एकचित हो जाएं और जरा असतर्क सन्तान लोग अलग रहे। यही विचारक सब अलग रहे। उधर कप्तान टॉमस द्रौपदी गुण-ग्रहण मे संलग्न थे। साहब बहादुर शिकार के बड़े शौकीन थे। वे कभी-कभी शिवग्राम के निकट के जंगल मे शिकार खेलने निकल जाते थे। एक दिन डॉनीवर्थ के साथ अनेक शिकारियो को लेकर टॉमस शिकार के लिए निकल पड़े। कहना ही क्या है! टॉमस बड़े ही साहसी व्यक्ति हैं, बल-वीर्य मे अंगरेजो मे अतुलनीय हैं। इस जंगल मे शेर, भालू आदि हिंसक जन्तुओ का बाहुल्य है। बहुत दूर निकल जानेपर साथ के शिकारियो ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया कि निविड़ जंगल मे हम न घुसेगे; वे बोले- ‘‘अब भीतर राह नहीं हैं, आगे जा न सकेंगे।’’ डानीवर्थ भी ऐसे भयानक शेर के सामने पड़ चुके थे कि वे भी घुसने से मुकर गये। सब लोग लौटना चाहते थे। कप्तान टॉमस ने कहा- ‘‘तुम लोग लौट जाओ, मैं न लौटूंगा।’’ यह कहकर कप्तान साहब ने भयानक जंगल मे प्रवेश किया। वस्तुतः उस जंगल मे राह न थी। घोड़ा आगे बढ़ न सकता थाः लेकिन साहब ने अपना घोड़ा भी छोड़ दिया और कन्धे पर बन्दूक रखकर पांव पैदल आगे बढ़े। घने जंगल मे प्रवेश कर इधर उधर शेर की खोज करने लगे; पर शेर कही न था। फिर देखा क्या- एक बड़े पेड़ के नीचे, खिले पुष्पो की लता अपने शरीर से लपेटे हुए कौन बैठा हुआ था? एक नवीन संन्यासी बैठा अपने रूप से जंगल मे उजाला किये हुए है। प्रस्फुटित पुष्प मानो उस शरीर का सानिध्य पाकर कुछ अधिक सुगन्धित हो गये हैं। कप्तान टॉमस को पहले तो विस्मय हुआ, फिर क्रोध आया। कप्तान साहब थोड़ी बहुत हिन्दी बोल लेते थे,बोले-‘‘टुम कौन?’’ संन्यासी ने कहा- ‘‘मैं संन्यासी हूं।’’ कप्तान ने कहा – ‘‘टुम रिबेल है? संन्यासी- ‘‘वह क्या? कप्तान-‘‘हम तुमको गोली करके माड़ेगा।’’ सन्यासी-‘‘मारो।’’ कप्तान जरा मन मे आगा-पीछा कर रहे थे कि गोली मारे या न मारे; इसी समय विद्युत वेग से संन्यासी ने आक्रमण कर उनकी बन्दूक छीन ली। संन्यासी ने अपना वक्षावरण चर्म खोलकर फेंक दिया। एक झटके मे जटा अलग हो गयी। कप्तान टॉमस ने देखा कि उसके सामने अपूर्व स्त्री-मूर्ति है। सुन्दरी ने हंसते-हंसते कहा- ‘‘साहब! हम लोग नारी है, किसी को चोट नही पहुंचाती। मैं तुमसे एक बात पूछना चाहती हूं कि जब हिन्दू- मुसलमानो मे लड़ाई हो रही है, तो इस बीच मे तुम लोग क्यो बोलते हो? अपने घर लौट जाओ!‘‘ साहब- ‘‘कौन हो तुम?‘‘
शान्ति-‘‘देखते तो हो, संन्यासिनी हूं-जिन लोगो से लड़ने आये हो, मै उन्ही मे से एक स्त्री हूं।‘‘ साहब-‘‘तुम हमाड़ा घड़ मे रहेगा?‘‘ शान्ति-‘‘क्या तुम्हारी उपपत्नी बनकर?‘‘ साहब-‘‘इसी माफक रहने सकता; शादी नही करेगा।‘‘ शान्ति-‘‘मुझे भी एक बात पूछनी है, हमारे घर मे एक सुन्दर बन्दर था,वह हाल मे ही मर गया है- उसकी जगह खाली पड़ी है। कमरे मे सिकड़ी डाल दूंगी। तुम उस दरबे मे रहोगे? हमारे बगीचे मे खूब केला होता है।‘‘ साहब-‘‘ तुम बड़ी स्प्रीटेड वूमेन है। टुमारी करेज पर हाम खुशी है। तुम हमाड़ा घड़ मे चलो। टुमाड़ा आदमी लड़ाई मे मड़ेगा,तब तुम क्या कड़ेगा? शान्ति-‘‘ तब हमारी एक शर्त हो जाए। युद्ध तो दो-चार दिन मे होगा ही। अगर तुम जीतोगे, तो मै तुम्हारी उपपत्नी होकर रहूंगी। अगर हम लोग जीतेगे, तो तुम हमारे घर मे उसी दरबे मे बन्दर बनकर रहना और केला खाना।‘‘ साहब-‘‘केला बहुत अच्छा चीज। अभी तुम्हारे पास है?‘‘ शान्ति-‘‘ले अपनी बन्दूक ले! ऐसे बेवकूफो के साथ कौन बात करे!‘‘ यह कहकर शान्ति बन्दूक फेककर हंसती हुई भाग गयी। साहब के पास से भागकर शान्ति जंगल मे गायब हो गयी। थोड़ी ही देर बाद साहब ने मधुर स्त्री-कण्ठ से गाना सुना- ‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही सारंगी पर वही मधुर झनकार उठी-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही पुरुष कण्ठ के साथ फिर गाना हुआ-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे को? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ तीन स्वरो की मिलित झनकार ने जंगल की समूची लताओ को कंपा दिया। शान्ति गाती हुई गीत के पूरे चरण गाने लगी- ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे! जलेते तूफान होये छे आमार नूतन तरी मसिलो सुखे, माझीते हाल धरे छे, हरे मुरारे! हरे मुरारे! मेगे बालिरे बांध, पुराई मनेर साध, जोरदार गांगे जल छूटे छे, राखिबे के?
हरे मुरारे ! हरे मुरारे ! " सारंगी भी बज रही थी-" जोरदार गांगेजल छूटे छे, राखिबे के ? हरे मुरारे ! हरे मुरारे। जहां बहुत ही घना जंगल है- भीतर क्या है, बाहर से यह दिखाई नही देता, शांति उसी के अंदर प्रवेश कर गयी थी। वही उन्ही शाखा- पल्लवो मे छिपी हुई एक छोटी कुटी है। डालियो के ही बन्धन और पत्तो का छाजन है। काठ की जमीन, उस पर मिट्टी पटी हुई है। लताद्वार खोलकर उसी के अंदर शांति प्रवेश कर गयी। वहां जीवानंद बैठे सारंगी बजा रहे थे। जीवानंद ने शांति को देखकर पूछा- "इतने दिनो के बाद गंगा मे ज्वार का जल बढ़ा है क्या?" शांति ने हंसते हुए उत्तर दिया- "ज्वार का बढ़ा हुआ गंगा जल ही क्या तालो को डुबाता है?" जीवानंद ने दुःखी होकर कहा- "देखो, शांति ! एक दिन तो व्रत भंग होने के कारण प्राण उत्सर्ग करूंगा ही; जो पाप हुआ है, उसका प्रायश्चित करना ही पड़ेगा। अब तक प्रायश्चित कर चुका होता, किन्तु केवल तुम्हारे अनुरोध के कारण कर न सका। लेकिन अब किसी दिन यह भी सम्भव हो जाएगा, विलम्ब नही है। उसी युद्ध मे मुझे प्रायश्चित करना पड़ेगा। इस प्राण का परित्याग करना ही होगा। मेरे मरने के दिन.......... झ्हशांति ने बात काट कर कहा- "मैं तुम्हारी धर्मपी हूं, सधर्मिणी हूं-धर्म मे सहायक हूं। तुमने अतिशय गुरु धर्म ग्रहण किया है, उसी धर्म की सहायता के लिए मैं आई हूं। हम दोनो ही एक साथ रहकर उस धर्म मे सहायक होगे, इसलिए घर त्याग कर आयी हूं। मैं तुम्हारे घर मे वृद्धि ही करूंगी। विवाह इहकाल के लिए भी होता है और परकाल के लिए भी होता है। इहकाल के लिए जो विवाह होता है, मन मे समझ लो कि हमने वह किया ही नही। हमलोगो का विवाह केवल परकाल के लिए हुआ है। परकाल मे इसका दूसरा फल होगा, लेकिन प्रायश्चित की बात क्यो ? तुमने कौन सा पाप किया है? तुम्हारी प्रतिज्ञा है कि स्त्री के साथ एकासन पर न बैठोगे? कौन कहता है तुम किसी दिन भी एकासन पर बैठे हो? फिर प्रायश्चित क्यो ? हाय प्रभु तुम मेरे गुरू हो, क्या मैं तुम्हे धर्म सिखाऊं? तुम वीर हो, लेकिन क्या मैं तुम्हे वीर-धर्म सिखाऊं?" जीवानंद ने आह्लाद से गदगद होकर कहा-"प्रिये ! सिखाओ तो सही !" शांति प्रसन्नचित से कहने लगी-"और भी देखो गोस्वामी जी ! इहकाल मे ही क्या हमारा विवाह निष्फल है ? तुम मुझसे प्रेम करते हो, मैं तुमसे प्रेम करती हूं- इससे बढ़कर इहकाल मे और कौन-सा फल हो सकता है? बोलो-वन्देमातरम् !" इसके बाद ही दोनो ने एक स्वर से "वन्देमातरम्" गीत गाया। भवानंद स्वामी एक दिन नगर मे जा पहुंचे। उन्होने प्रशस्थ राजपथ त्यागकर एक गली मे प्रवेश किया। गली के दोनो बाजू ऊंची अट्टालिकाएं है, केवल दोपहर के समय एक बार वहां भगवान सूर्य झांक लेते है, इसके बाद अंधकार ही अंधकार। गली मे घुसकर पास के ही एक दो-मंजिले मकान मे भवानंद ने प्रवेश किया। नीचे की मंजिल मे जहां एक अर्धवयस्का स्त्री रसोई बना रही थी, वही जाकर भवानंद स्वामी ने दर्शन दिया। वह स्त्री अर्धवयस्क, मोटी-झोटी, काली-कलूटी, मैली धोती पहने माथे के बाल ठीक खोपड़ी पर बांधे हुए, दाल की बटलोही मे कलछी डालकर ठन-ठन बजाती हुई बाएं हाथ से मुंह पर लटकानेवाले बालो को हटाती, कुछ मुंह से बड़बड़ाती, रसोई करती हुई सुशोभित हो रही थी। ऐसे ही समय भवानंद महाप्रभु ने घर मे प्रवेश कर कहा- "भाभी ! राम-राम !" भाभी भवानंद को देखकर अवाक होकर अपने हटे हुए कपड़े ठीक करने लगी। इच्छा हुई कि सिर का मोहन
यहाँ दी गई पृष्ठ सामग्री का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
जूड़ा खोल डाले, लेकिन खोल न सकी- हाथ मे कलछी थी। हाय हाय! उस जूड़े के जंजाल मे उसने एक बकुल पुष्प खोस रखा था। वस्त्रांचल से उसे ढंकने की कोशिश की, लेकिन यह क्या? आज तो एक पांच हाथ का टुकड़ा मात्र पहन रखा था। अतः अंग ढंक न सकी। वह पांच हाथ का कपड़ा ऊपर उठाती थी तो छाती खुलती थी, छाती ढांकती थे तो पीठ खुलती थी, लाचार बेचारी परेशान हो गई। किसी तरह उसने एक कोना खींचकर कान के पास तक लाकर आधा चेहरा ढांकने का भाव कर प्रतिज्ञा की कि दूसरी एक धोती खरीदूंगी और तब इसे कभी न पहनूंगी। इस तरह व्यस्त होने के बाद बोली-‘‘कौन, गोसाई ठाकुर! आओ-आओ! लेकिन भाई! यह हमे राम-राम के साथ प्रणाम क्यो?‘‘ भवानंद-‘‘तुम मेरी भाभी जो हो!‘‘ गौरी-‘‘अच्छा, आदर से कहते हो तो कह लो। प्रणाम किया ही है, तो खुश रहो! फिर तुम्हे प्रणाम करना ही चाहिए, मैं उम्र मे बड़ी जो हूं। लेकिन आखिर हो तो गोसाई ठाकुर देवता ही!‘‘ भवानंद स्वामी से गौरी की उम्र काफी बड़ी-‘‘करीब पचीस वर्ष बड़ी है। लेकिन चतुर भवानंद ने उत्तर दिया-‘‘भाभी! अरे तुम्हे रसीली देखकर भाभी कहता हूं। नही तो हिसाब जब किया गया था, तो तुम मुझसे छः वर्ष छोटी निकली थी। क्या याद नही है? हम लोगो मे सब तरह के वैष्णव हैं न। इच्छा हैं कि एक मठधारी ब्रह्मचारी के साथ तुम्हारी सगाई करा दूं, यही कहने आया हूं।‘‘ गौरी-‘‘यह कैसी बात? अरे राम-राम! ऐसी बात भला कही जाती? मैं ठहरी विधवा औरत!‘‘ भवानंद-‘‘तो सगाई न होगी?‘‘ गौरी-‘‘तो भाई! जैसा समझो वैसा करो। तुम लोग पंडित आदमी ठहरे। हम लोग तो और हैं, क्या समझे? तो कब होगी सगाई?‘‘ भवानंद ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर कहा-‘‘बास एक बार उस ब्रह्मचारी से मुलाकात होते ही पक्की हो जाएगी सगाई?‘‘ गौरी जल गई। मन मे संदेह हुआ कि शायद सगाई की बात मजाक है। बोली-‘‘है, जैसी, है वैसी है!‘‘ भवानंद-‘‘तुम जरा जाकर एक बार देख आओ। कह देना कि मैं आया हू- एक बार मिलना चाहता हूं।‘‘ इस पर गौरी भात-दाल छोड़कर हाथ धोकर छमछम करती हुई सीढ़ियां तोड़ती ऊपर चढ़ने लगी। एक कमरे मे जमीन पर चटाई बिछाकर एक अपूर्व सुन्दरी बैठी हुईं हैं। लेकिन सौंदर्य पर एक घोर छाया हैं। मध्यान्ह के समय कलकलवाहिनी प्रसन्नसलिला, विपुल-जल-श्रोतवती नदी के ऊपर मेघ आने जैसी यह कैसी छाया है! नदी-हृदय पर तरंगे उछल रही हैं, तटवर्ती कुसुमवृक्ष वायु के झोके मे मस्त झूम रहे है, पुष्प-भार से दबे जा रहे है, उनसे अट्टालिका-श्रेणी सुशोभित है। तरणी-श्रेणी के ताड़न से जल आंदोलित हो रहा है। यह भी वैसे ही पहले की तरह चारु, चिकने, चंचल, गुंथे केश, पहले का वैसा ही तेजपुंज ललाट और उस पर पतली तूलिका से खिंची हुई भौंहे, वही पहले जैसे चंचल मृग-नयन- लेकिन वैसे कटाक्षमय नही, वैसी लोलता नही, कुछ नम्र! अधरो पर वही दाड़िम लालिमा, वैसे ही सुधारसपूर्ण, वैसे ही वनलता-दुष्प्राप्य कोमलतायुक्त बाहु। लेकिन आज वह दीप्ति नही, वह उज्ज्वलता नही, वह प्रखरता नही, वह चंचलता नही, वह रस नही है- शायद वह यौवन भी नही है। केवल सौन्दर्य और माधुर्यमात्र, नयी बात आ गयी हैं-गाम्भीर्य। इसे पहले देखने से जान पड़ता था कि मनुष्य-लोक की अतुलनीय सुन्दरी हैं अब देखने से जान पड़ता हैं कि कोई स्वर्ग की शापग्रस्त देवी हैं। उसके चारो तरफ दो-चार पुस्तके पड़ी हुई हैं। दीवार पर खूंटी के सहारे तुलसी की माला लटक रही हैं। दीवारो पर जगन्नाथ, बलराम, सुभद्रा, कालीयदमन, गोवर्धन-धारण आदि के चित्र टंगे हुए है। वे चित्र उसके स्वयं बनाये हुए है, उनके नीचे लिखा हुआ है-‘‘चित्र या विचित्र!‘‘ ऐसे ही कमरे मे भवानन्द ने
प्रवेश किया। भवानन्द ने पूछा-"क्यो कल्याणी! शारीरिक कुशल तो है?" कल्याणी-"यह प्रश्न करना आप न छोड़ेंगे? मेरे शारीरिक कुशल से आपका क्या मतलब?" भवानन्द-"जो वृक्ष लगाता है, उसमे नित्य जल देता है-वृक्ष के बढ़ते से ही उसे सुख होता है। तुम्हारे मृत शरीर मे मैने नवजीवन दिया है। वह बढ़ रहा है या नही, मैं क्यो न पूछूंगा?" कल्याणी-"विक्ष-वृक्ष का क्या कभी कोई दाम होता है?" भवानन्द-"जीवन क्या विष है?" कल्याणी-"न होता तो अमृत ढालकर मे उसे ध्वंस करने को क्यो तैयार होती?" भवानन्द-"बहुत दिनो से सोच रहा था-पूछूंगा, लेकिन पूछ नही सका। किसने तुम्हारे जीवन को विषममय बना दिया था?" कल्याणी ने स्थिर भाव से उत्तर दिया-"मेरे जीवन को किसी ने विषममय नही बनाया : जीवन स्वयं विषममय है- मेरा जीवन विषमय है; आपका जीवन विषमय है : सभी का जीवन विषमय है।" भवानन्द-"सच है, कल्याणी! मेरा जीवन तो अवश्य विषममय है।......उसी दिन से तुम्हारा व्याकरण समाप्त हो गया है?" कल्याणी-"नही?" भवानन्द-"फिर क्या बात है?" कल्याणी-"अच्छा नही मालूम होता।" भवानन्द-"विद्या-अर्जन मे तुम्हारी कुछ प्रवृत्ति देखी थी। अब ऐसी अश्रद्धा क्यो?" कल्याणी-"आप जैसे पण्डित जब महापापिष्ठ है, तो न पढ़ना-लिखना ही अच्छा है। मेरे पतिदेव की क्या खबर है, प्रभु?" भवानन्द-"बारंबार यह संवाद क्यो पूछती हो? वो तो तुम्हारे लिए मृत समान है।" कल्याणी-"मैं उनके लिए मृत हूं; वे मेरे लिए नही।" भवानन्द-"वह तुम्हारे लिये मृतवत् होंगे, यही समझकर तो तुमने विष खाया था? बार-बार यह बात क्यो कल्याणी?" कल्याणी-"मर जाने से क्या संबंध मिट जाता है! वह कैसे है?" भवानन्द-"अच्छे है।" कल्याणी-"कहां है? पदचिन्ह मे?" भवानन्द-"हां, वही है!" कल्याणी-"क्या कर रहे है?" भवानन्द-"जो कर रहे थे-दुर्ग-निर्माण, अस्त्र-निर्माण; उन्ही के द्वारा निर्मित अस्त्र-शस्त्रो से सहस्त्रो सन्तान सज्जत हो रहे है। उन्ही की कृपा से अब हम लोगो को तोप, बन्दूक, गोला-गोली, बारूद आदि की कमी नही है। सन्तान गण मे वही श्रेष्ठ हैं। वे हम लोगो को महत् उपकार कर रहे है; वे हम लोगो के दाहिने हाथ है।" कल्याणी-"मै प्राण-त्याग न करती, तो इतना होता! जिसकी छाती पर छेदही कलसी बंधी हो, वह क्या कभी भवसागर पार कर सकता है! जिसके पैरो मे लौह सीकड़ पड़े हो, वह क्या कभी दौड़ सकता है! क्यो संन्यासी! तुमने अपना क्षार जीवन क्यो बचा रखा था?" भवानन्द-"स्त्री सहधर्मिणी होती है, धर्म मे सहायक होती है।"
कल्याणी--“छोटे-छोटे धर्मों मे। बड़े धर्मों के अनुसरण मे कण्टक! मैने विष-कटक द्वारा उनके अधर्म या कष्ट का उद्धार किया था। छिः, दुराचारी पामर ब्रह्मचारी! तुमने मेरे प्राण क्यो लौटाये?” भवानन्द--“अच्छा, न तो मैने जो किया है, उसे मुझे वापस कर दो। मैने जो प्राण-दान किया है, क्या तुम उसे वापस कर सकती हो।” कल्याणी--“क्या आपको पता है, मेरी सुकुमारी कैसी है?” भवानन्द--“बहुत दिनो से उसकी खबर नही लगी। जीवानन्द बहुत दिनो से उधर गये ही नही।” कल्याणी--“उसकी खबर क्या मुझे ला नही दे सकते? स्वामी मेरे लिए त्याज्य है; लेकिन जब जिन्दा रह गई हूं तो कन्या को क्यो त्याग दूं! अब तो सुकुमारी के पास जाने से ही जीवन मे कुछ सुख मिल सकता है। लेकिन मेरे लिए इतना आप क्यो करेगे।” भवानन्द--“करूंगा कल्याणी! तुम्हारे लिए कन्या ला दूंगा; लेकिन इसके बाद?” कल्याणी--“इसके बाद क्या गोस्वामी?” भवानन्द--“स्वामी” कल्याणी--“उन्हे तो इच्छापूर्वक त्यागा है।” भवानन्द--“यदि उनका व्रत पूर्ण हो जाए तो?” कल्याणी--“तो मै उनकी हूंगी। मै जो बच गई हूं, क्या वे यह जानते है?” भवानन्द--“नही।” कल्याणी--“आपसे क्या उनकी मुलाकात नही होती?” भवानन्द--“होती है।” कल्याणी--“मेरी बात कभी नही करते?” भवानन्द--“नही! जो स्त्री मर गयी, उससे फिर पति का क्या सम्बन्ध!” कल्याणी--“क्या कहा?” भवानन्द--“तुम फिर विवाह कर सकती हो, तुम्हारे पुनर्जन्म हुआ है।” कल्याणी--“मेरी कन्या ला दो!” भवानन्द--“ला दूंगा! तुम फिर विवाह कर सकती हो?” कल्याणी--“तुम्हारे साथ न?” भवानन्द--“विवाह करोगी?” कल्याणी--“तुम्हारे साथ” भवानन्द--“यही मान लो।” कल्याणी--“सन्तान धर्म कहां रहेगा?” भवानन्द--“अतल जल मे।” कल्याणी--“यह तुम्हारा महाव्रत है?” भवानन्द--“अतल जल मे गया?” कल्याणी--“किसलिए सब अतल जल मे डुबाते हो?” भवानन्द--“तुम्हारे लिए! देखो, मनुष्य हो, ऋषि हो, सिद्ध हो, देवता हो, सबका चित्त अवश्य होता है। सन्तान-धर्म मेरा प्राण है, लेकिन आज पहले-पहल करता हूं, तुम प्राणो से भी बढ़कर प्राण हो। जिस दिन तुम्हे प्राण-दान किया, उसी दिन से मै तुम्हारे पैरो पर गिर गया। मै नही जानता था कि संसार मे ऐसा रूप भी