आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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जूड़ा खोल डाले, लेकिन खोल न सकी- हाथ मे कलछी थी। हाय हाय! उस जूड़े के जंजाल मे उसने एक बकुल पुष्प खोस रखा था। वस्त्रांचल से उसे ढंकने की कोशिश की, लेकिन यह क्या? आज तो एक पांच हाथ का टुकड़ा मात्र पहन रखा था। अतः अंग ढंक न सकी। वह पांच हाथ का कपड़ा ऊपर उठाती थी तो छाती खुलती थी, छाती ढांकती थे तो पीठ खुलती थी, लाचार बेचारी परेशान हो गई। किसी तरह उसने एक कोना खींचकर कान के पास तक लाकर आधा चेहरा ढांकने का भाव कर प्रतिज्ञा की कि दूसरी एक धोती खरीदूंगी और तब इसे कभी न पहनूंगी। इस तरह व्यस्त होने के बाद बोली-‘‘कौन, गोसाई ठाकुर! आओ-आओ! लेकिन भाई! यह हमे राम-राम के साथ प्रणाम क्यो?‘‘ भवानंद-‘‘तुम मेरी भाभी जो हो!‘‘ गौरी-‘‘अच्छा, आदर से कहते हो तो कह लो। प्रणाम किया ही है, तो खुश रहो! फिर तुम्हे प्रणाम करना ही चाहिए, मैं उम्र मे बड़ी जो हूं। लेकिन आखिर हो तो गोसाई ठाकुर देवता ही!‘‘ भवानंद स्वामी से गौरी की उम्र काफी बड़ी-‘‘करीब पचीस वर्ष बड़ी है। लेकिन चतुर भवानंद ने उत्तर दिया-‘‘भाभी! अरे तुम्हे रसीली देखकर भाभी कहता हूं। नही तो हिसाब जब किया गया था, तो तुम मुझसे छः वर्ष छोटी निकली थी। क्या याद नही है? हम लोगो मे सब तरह के वैष्णव हैं न। इच्छा हैं कि एक मठधारी ब्रह्मचारी के साथ तुम्हारी सगाई करा दूं, यही कहने आया हूं।‘‘ गौरी-‘‘यह कैसी बात? अरे राम-राम! ऐसी बात भला कही जाती? मैं ठहरी विधवा औरत!‘‘ भवानंद-‘‘तो सगाई न होगी?‘‘ गौरी-‘‘तो भाई! जैसा समझो वैसा करो। तुम लोग पंडित आदमी ठहरे। हम लोग तो और हैं, क्या समझे? तो कब होगी सगाई?‘‘ भवानंद ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोककर कहा-‘‘बास एक बार उस ब्रह्मचारी से मुलाकात होते ही पक्की हो जाएगी सगाई?‘‘ गौरी जल गई। मन मे संदेह हुआ कि शायद सगाई की बात मजाक है। बोली-‘‘है, जैसी, है वैसी है!‘‘ भवानंद-‘‘तुम जरा जाकर एक बार देख आओ। कह देना कि मैं आया हू- एक बार मिलना चाहता हूं।‘‘ इस पर गौरी भात-दाल छोड़कर हाथ धोकर छमछम करती हुई सीढ़ियां तोड़ती ऊपर चढ़ने लगी। एक कमरे मे जमीन पर चटाई बिछाकर एक अपूर्व सुन्दरी बैठी हुईं हैं। लेकिन सौंदर्य पर एक घोर छाया हैं। मध्यान्ह के समय कलकलवाहिनी प्रसन्नसलिला, विपुल-जल-श्रोतवती नदी के ऊपर मेघ आने जैसी यह कैसी छाया है! नदी-हृदय पर तरंगे उछल रही हैं, तटवर्ती कुसुमवृक्ष वायु के झोके मे मस्त झूम रहे है, पुष्प-भार से दबे जा रहे है, उनसे अट्टालिका-श्रेणी सुशोभित है। तरणी-श्रेणी के ताड़न से जल आंदोलित हो रहा है। यह भी वैसे ही पहले की तरह चारु, चिकने, चंचल, गुंथे केश, पहले का वैसा ही तेजपुंज ललाट और उस पर पतली तूलिका से खिंची हुई भौंहे, वही पहले जैसे चंचल मृग-नयन- लेकिन वैसे कटाक्षमय नही, वैसी लोलता नही, कुछ नम्र! अधरो पर वही दाड़िम लालिमा, वैसे ही सुधारसपूर्ण, वैसे ही वनलता-दुष्प्राप्य कोमलतायुक्त बाहु। लेकिन आज वह दीप्ति नही, वह उज्ज्वलता नही, वह प्रखरता नही, वह चंचलता नही, वह रस नही है- शायद वह यौवन भी नही है। केवल सौन्दर्य और माधुर्यमात्र, नयी बात आ गयी हैं-गाम्भीर्य। इसे पहले देखने से जान पड़ता था कि मनुष्य-लोक की अतुलनीय सुन्दरी हैं अब देखने से जान पड़ता हैं कि कोई स्वर्ग की शापग्रस्त देवी हैं। उसके चारो तरफ दो-चार पुस्तके पड़ी हुई हैं। दीवार पर खूंटी के सहारे तुलसी की माला लटक रही हैं। दीवारो पर जगन्नाथ, बलराम, सुभद्रा, कालीयदमन, गोवर्धन-धारण आदि के चित्र टंगे हुए है। वे चित्र उसके स्वयं बनाये हुए है, उनके नीचे लिखा हुआ है-‘‘चित्र या विचित्र!‘‘ ऐसे ही कमरे मे भवानन्द ने