आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रवेश किया। भवानन्द ने पूछा-"क्यो कल्याणी! शारीरिक कुशल तो है?" कल्याणी-"यह प्रश्न करना आप न छोड़ेंगे? मेरे शारीरिक कुशल से आपका क्या मतलब?" भवानन्द-"जो वृक्ष लगाता है, उसमे नित्य जल देता है-वृक्ष के बढ़ते से ही उसे सुख होता है। तुम्हारे मृत शरीर मे मैने नवजीवन दिया है। वह बढ़ रहा है या नही, मैं क्यो न पूछूंगा?" कल्याणी-"विक्ष-वृक्ष का क्या कभी कोई दाम होता है?" भवानन्द-"जीवन क्या विष है?" कल्याणी-"न होता तो अमृत ढालकर मे उसे ध्वंस करने को क्यो तैयार होती?" भवानन्द-"बहुत दिनो से सोच रहा था-पूछूंगा, लेकिन पूछ नही सका। किसने तुम्हारे जीवन को विषममय बना दिया था?" कल्याणी ने स्थिर भाव से उत्तर दिया-"मेरे जीवन को किसी ने विषममय नही बनाया : जीवन स्वयं विषममय है- मेरा जीवन विषमय है; आपका जीवन विषमय है : सभी का जीवन विषमय है।" भवानन्द-"सच है, कल्याणी! मेरा जीवन तो अवश्य विषममय है।......उसी दिन से तुम्हारा व्याकरण समाप्त हो गया है?" कल्याणी-"नही?" भवानन्द-"फिर क्या बात है?" कल्याणी-"अच्छा नही मालूम होता।" भवानन्द-"विद्या-अर्जन मे तुम्हारी कुछ प्रवृत्ति देखी थी। अब ऐसी अश्रद्धा क्यो?" कल्याणी-"आप जैसे पण्डित जब महापापिष्ठ है, तो न पढ़ना-लिखना ही अच्छा है। मेरे पतिदेव की क्या खबर है, प्रभु?" भवानन्द-"बारंबार यह संवाद क्यो पूछती हो? वो तो तुम्हारे लिए मृत समान है।" कल्याणी-"मैं उनके लिए मृत हूं; वे मेरे लिए नही।" भवानन्द-"वह तुम्हारे लिये मृतवत् होंगे, यही समझकर तो तुमने विष खाया था? बार-बार यह बात क्यो कल्याणी?" कल्याणी-"मर जाने से क्या संबंध मिट जाता है! वह कैसे है?" भवानन्द-"अच्छे है।" कल्याणी-"कहां है? पदचिन्ह मे?" भवानन्द-"हां, वही है!" कल्याणी-"क्या कर रहे है?" भवानन्द-"जो कर रहे थे-दुर्ग-निर्माण, अस्त्र-निर्माण; उन्ही के द्वारा निर्मित अस्त्र-शस्त्रो से सहस्त्रो सन्तान सज्जत हो रहे है। उन्ही की कृपा से अब हम लोगो को तोप, बन्दूक, गोला-गोली, बारूद आदि की कमी नही है। सन्तान गण मे वही श्रेष्ठ हैं। वे हम लोगो को महत् उपकार कर रहे है; वे हम लोगो के दाहिने हाथ है।" कल्याणी-"मै प्राण-त्याग न करती, तो इतना होता! जिसकी छाती पर छेदही कलसी बंधी हो, वह क्या कभी भवसागर पार कर सकता है! जिसके पैरो मे लौह सीकड़ पड़े हो, वह क्या कभी दौड़ सकता है! क्यो संन्यासी! तुमने अपना क्षार जीवन क्यो बचा रखा था?" भवानन्द-"स्त्री सहधर्मिणी होती है, धर्म मे सहायक होती है।"