आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरे मुरारे ! हरे मुरारे ! " सारंगी भी बज रही थी-" जोरदार गांगेजल छूटे छे, राखिबे के ? हरे मुरारे ! हरे मुरारे। जहां बहुत ही घना जंगल है- भीतर क्या है, बाहर से यह दिखाई नही देता, शांति उसी के अंदर प्रवेश कर गयी थी। वही उन्ही शाखा- पल्लवो मे छिपी हुई एक छोटी कुटी है। डालियो के ही बन्धन और पत्तो का छाजन है। काठ की जमीन, उस पर मिट्टी पटी हुई है। लताद्वार खोलकर उसी के अंदर शांति प्रवेश कर गयी। वहां जीवानंद बैठे सारंगी बजा रहे थे। जीवानंद ने शांति को देखकर पूछा- "इतने दिनो के बाद गंगा मे ज्वार का जल बढ़ा है क्या?" शांति ने हंसते हुए उत्तर दिया- "ज्वार का बढ़ा हुआ गंगा जल ही क्या तालो को डुबाता है?" जीवानंद ने दुःखी होकर कहा- "देखो, शांति ! एक दिन तो व्रत भंग होने के कारण प्राण उत्सर्ग करूंगा ही; जो पाप हुआ है, उसका प्रायश्चित करना ही पड़ेगा। अब तक प्रायश्चित कर चुका होता, किन्तु केवल तुम्हारे अनुरोध के कारण कर न सका। लेकिन अब किसी दिन यह भी सम्भव हो जाएगा, विलम्ब नही है। उसी युद्ध मे मुझे प्रायश्चित करना पड़ेगा। इस प्राण का परित्याग करना ही होगा। मेरे मरने के दिन.......... झ्हशांति ने बात काट कर कहा- "मैं तुम्हारी धर्मपी हूं, सधर्मिणी हूं-धर्म मे सहायक हूं। तुमने अतिशय गुरु धर्म ग्रहण किया है, उसी धर्म की सहायता के लिए मैं आई हूं। हम दोनो ही एक साथ रहकर उस धर्म मे सहायक होगे, इसलिए घर त्याग कर आयी हूं। मैं तुम्हारे घर मे वृद्धि ही करूंगी। विवाह इहकाल के लिए भी होता है और परकाल के लिए भी होता है। इहकाल के लिए जो विवाह होता है, मन मे समझ लो कि हमने वह किया ही नही। हमलोगो का विवाह केवल परकाल के लिए हुआ है। परकाल मे इसका दूसरा फल होगा, लेकिन प्रायश्चित की बात क्यो ? तुमने कौन सा पाप किया है? तुम्हारी प्रतिज्ञा है कि स्त्री के साथ एकासन पर न बैठोगे? कौन कहता है तुम किसी दिन भी एकासन पर बैठे हो? फिर प्रायश्चित क्यो ? हाय प्रभु तुम मेरे गुरू हो, क्या मैं तुम्हे धर्म सिखाऊं? तुम वीर हो, लेकिन क्या मैं तुम्हे वीर-धर्म सिखाऊं?" जीवानंद ने आह्लाद से गदगद होकर कहा-"प्रिये ! सिखाओ तो सही !" शांति प्रसन्नचित से कहने लगी-"और भी देखो गोस्वामी जी ! इहकाल मे ही क्या हमारा विवाह निष्फल है ? तुम मुझसे प्रेम करते हो, मैं तुमसे प्रेम करती हूं- इससे बढ़कर इहकाल मे और कौन-सा फल हो सकता है? बोलो-वन्देमातरम् !" इसके बाद ही दोनो ने एक स्वर से "वन्देमातरम्" गीत गाया। भवानंद स्वामी एक दिन नगर मे जा पहुंचे। उन्होने प्रशस्थ राजपथ त्यागकर एक गली मे प्रवेश किया। गली के दोनो बाजू ऊंची अट्टालिकाएं है, केवल दोपहर के समय एक बार वहां भगवान सूर्य झांक लेते है, इसके बाद अंधकार ही अंधकार। गली मे घुसकर पास के ही एक दो-मंजिले मकान मे भवानंद ने प्रवेश किया। नीचे की मंजिल मे जहां एक अर्धवयस्का स्त्री रसोई बना रही थी, वही जाकर भवानंद स्वामी ने दर्शन दिया। वह स्त्री अर्धवयस्क, मोटी-झोटी, काली-कलूटी, मैली धोती पहने माथे के बाल ठीक खोपड़ी पर बांधे हुए, दाल की बटलोही मे कलछी डालकर ठन-ठन बजाती हुई बाएं हाथ से मुंह पर लटकानेवाले बालो को हटाती, कुछ मुंह से बड़बड़ाती, रसोई करती हुई सुशोभित हो रही थी। ऐसे ही समय भवानंद महाप्रभु ने घर मे प्रवेश कर कहा- "भाभी ! राम-राम !" भाभी भवानंद को देखकर अवाक होकर अपने हटे हुए कपड़े ठीक करने लगी। इच्छा हुई कि सिर का मोहन