भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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शान्ति-‘‘देखते तो हो, संन्यासिनी हूं-जिन लोगो से लड़ने आये हो, मै उन्ही मे से एक स्त्री हूं।‘‘ साहब-‘‘तुम हमाड़ा घड़ मे रहेगा?‘‘ शान्ति-‘‘क्या तुम्हारी उपपत्नी बनकर?‘‘ साहब-‘‘इसी माफक रहने सकता; शादी नही करेगा।‘‘ शान्ति-‘‘मुझे भी एक बात पूछनी है, हमारे घर मे एक सुन्दर बन्दर था,वह हाल मे ही मर गया है- उसकी जगह खाली पड़ी है। कमरे मे सिकड़ी डाल दूंगी। तुम उस दरबे मे रहोगे? हमारे बगीचे मे खूब केला होता है।‘‘ साहब-‘‘ तुम बड़ी स्प्रीटेड वूमेन है। टुमारी करेज पर हाम खुशी है। तुम हमाड़ा घड़ मे चलो। टुमाड़ा आदमी लड़ाई मे मड़ेगा,तब तुम क्या कड़ेगा? शान्ति-‘‘ तब हमारी एक शर्त हो जाए। युद्ध तो दो-चार दिन मे होगा ही। अगर तुम जीतोगे, तो मै तुम्हारी उपपत्नी होकर रहूंगी। अगर हम लोग जीतेगे, तो तुम हमारे घर मे उसी दरबे मे बन्दर बनकर रहना और केला खाना।‘‘ साहब-‘‘केला बहुत अच्छा चीज। अभी तुम्हारे पास है?‘‘ शान्ति-‘‘ले अपनी बन्दूक ले! ऐसे बेवकूफो के साथ कौन बात करे!‘‘ यह कहकर शान्ति बन्दूक फेककर हंसती हुई भाग गयी। साहब के पास से भागकर शान्ति जंगल मे गायब हो गयी। थोड़ी ही देर बाद साहब ने मधुर स्त्री-कण्ठ से गाना सुना- ‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही सारंगी पर वही मधुर झनकार उठी-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे के? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ इसके साथ ही पुरुष कण्ठ के साथ फिर गाना हुआ-‘‘ए यौवन-जल तरंग रोघिबे को? हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ तीन स्वरो की मिलित झनकार ने जंगल की समूची लताओ को कंपा दिया। शान्ति गाती हुई गीत के पूरे चरण गाने लगी- ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ ‘‘ए यौवन जल- तरंग रोघिबे के? ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे! जलेते तूफान होये छे आमार नूतन तरी मसिलो सुखे, माझीते हाल धरे छे, हरे मुरारे! हरे मुरारे! मेगे बालिरे बांध, पुराई मनेर साध, जोरदार गांगे जल छूटे छे, राखिबे के?