आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवानन्द ने कहा- “मै तुम्हें परित्याग न करूंगा। मै जब तक लौटकर न आऊं, तुम यही खड़ी रहना।‘ शांति ने पूछा-“तुम लौटकर आओगे न?” जीवानन्द और कोई उत्तर न देकर, और किसी की परवाह न कर, राह की बगल मे नारियल वृक्षो की छाया मे शांति के अधरो पर अधर रख, सुधपान कर चले गये। माता को समझा-बुझाकर और विदा लेकर जीवानन्द तुरंत लौट आये। हाल मे ही जीवानन्द की बहन निमाई की शादी भैरवीपुर मे हुई थी। बहनोई के साथ जीवानंद का प्रेम था। जीवानंद शांति को लेकर वही गये। बहनोई ने उन्हे थोड़ी जमीन दी; जीवानन्द ने उस पर एक कुटी का निर्माण किया और वही शांति के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। स्वामी के सहवास मे शांति का पुरुष भाव धीरे-धीरे गायब होने लगा। सुख स्वप्न की तरह उनका जीवन बीतने लगा। लेकिन सहसा वह सुख स्वप्न भंग हो गया- सत्यानन्द के हाथ मे पड़कर जीवानन्द सन्तान धर्म ग्रहण कर शान्ति का परित्याग कर चले गये। पतित्याग के बाद यह प्रथम मिलन निमाई के प्रयत्न से हुआ, जिसका वर्णन पूर्व परिच्छेद मे हो चुका है। जीवानन्द के चले जाने पर शान्ति निमाई के दरवाजे पर जा बैठी। निमाई गोद मे लड़की को लेकर उसके पास आ बैठी। शांति की आंखो में नही है, उसने उन्हे पोछ डाला है, बल्कि चेहरे पर मधुर मुस्कराहट हैं। फिर भी वह कुछ तो गम्भीर चिन्तायुक्त अनमनी सी दिखाई पड़ती ही है, उसे देखकर निमाई बोली- “मुलाकात तो हो गयी न?” शान्ति ने कोई उत्तर नही दिया, वह चुप रही। निमाई ने देखा कि शान्ति किसी तरह मन का भाप न बताएगी। शान्ति मन की बताना पसन्द भी नही करती, यह जानती हुई भी निमाई ने बात का ठर्रा उठाया, बोली- “बता दो भाभी! यह कन्या कैसी है?” शान्ति ने कहा- “यह लड़की कहां से पायी -तेरे लड़की कब हुई रे।‘ “मेरी नही, दादा की है!” निमाई ने शान्ति को जलाने के लिए यह बात कही थी, “दादा की लड़की“ माने यह कि उसने भाई से यह लड़की पायी है। लेकिन शान्ति ने यह न समझा कि निमाई उसे चिढ़ाने के लिए कह रही है। अतएव शान्ति ने उत्तर दिया -“मै लड़की के बाप की बात नही पूछती हूं, मैं यह पूछती हूं कि इस लड़की की मां कौन हैं?” निमाई उचित दण्ड पाकर अप्रतिभ होकर बोली-“कौन जाने किसकी लड़की है, दादा क्या जाने कहां से पकड़कर उठा लाये हैं - पूछने का भी अवसर न मिला। आजकल अकाल के दिनो मे कितने लोग लड़के- बच्चे फेक जाते है। मेरे ही पास कितने लोग अपनी सन्तान बेचने के लिए आये थे। लेकिन दूसरो के बाल- बच्चो को ले कौन?” (फिर उन आंखो मे सहसा जल भर आया और निमाई ने उसे पोछ डाला) “लड़की है बड़ी सुन्दर! भोली-भाली, गोरी-चिट्टी देखकर दादा से मैने मांग ली है।‘ इसके बाद शान्ति की निमाई के साथ अनेक तरह की बाते होने लगी। फिर निमाई के पति को घर लौट आते देख शान्ति उठकर कुटी मे चली गयी। कुटी मे पहुंचकर उसने अपना दरवाजा बन्द कर लिया। इसके बाद चूल्हे की जितनी राख वह बटोर सकी, बटोर ली। बची हुई राख के ऊपर जो अपने खाने के लिए उसने चावल पका रखे थे, उन्हे भी वहां से हटा दिया। इसके उपरान्त बहुत देर तक सोच मे पड़ी रही और फिर आप-ही-आप बोली- “इतने दिनो से जो सोच रखा था, आज वही करूंगी। जिस आशा से इतने दिनो तक नही किया, आज सफल हुई-सफल क्यो, निष्फल- निष्फल! यह जीवन ही निष्फल है। जो किया है वही करूंगी एक बार मे जो प्रायश्चित है, वही सौ बार मे भी