आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 78 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै।" यह सोचती हुई शान्ति ने भात चूल्हे मे फेंक दिया। जगल में से कन्द-मूल-फल ले आई और अन्न के बदले उन्ही को खाकर उसने अपना पेट भर लिया। इसके बाद उसने वही ढाका वाली साड़ी निकाली जिस पर निमाई का इतना आग्रह था। उसका किनारा उसने फाड़ डाला और शेष कपड़े को गेरू के रंग मे रंग दिया। वस्त्र को रगतें और सुखाते शाम हो गई। शाम हो जाने पर दरवाजा बन्द कर शान्ति बड़े तमाशे मे लग गयी। माथे के आजानुलम्बित केशो का कुछ का कुछ अंश उसने कैची से काट डाला और अलग रख दिया। बाकी बचे हुए उस कपड़े को उसने दो भागो मे विभक्त कर दिया- एक तो उसने पहन लिया और दूसरे से अपने ऊपरी अंगो को ढंक लिया। इसके बाद उसने बहुत दिनों से काम मे न लाया गया शीशा निकाला और उसमे अपना रूप देखते हुए सोचा-‘हाय! मैं क्या करने जा रही हूं?’ इसके बाद ही दुःखी हृदय से वह अपने उन काटे हुए बालो को लेकर मूंछ और दाढ़ी बनाने लगी। लेकिन उन्हे वह पहन न सकी। उसने सोचा-‘छिः! यह क्या? अभी क्या इसकी उम्र है। फिर भी बुड्ढे को चरका देने के लिए इन्हे रख लेना अच्छा है?’ यह सोचकर उसने छिपाकर उन्हे अपने पास रख लिया। इसके बाद घर में से एक बड़ा हरिणचर्म निकालकर उसने गले के पास उसे पहनकर गांठ दी और घुमाकर शरीर आवृत कर जंघो तक लटका लिया। इस तरह सज्जित होने के बाद इस नये संन्यासी ने घर मे एक बार चारो तरफ देखा। आधी रात हो जाने पर, शान्ति ने इस प्रकार संन्यासी वेश मे दरवाजा खोलकर अन्धकारपूर्ण गम्भीर वन मे प्रवेश किया। वनदेवियो ने उस एकान्त रात मे अपूर्व गायन सुना- (बंगला यथावत) (1) "दूरे उड़ि घोड़ा चढ़ि कोथा तुमी जाओ रे, समरे चलि तू आमि हाम ना फिराओ रे हरि-हरि हरि-हरि बोलो रणरंगे झांप दिबो प्राण आजि समर-तरंगे, तुमि कार कि तोमार केलो एसो संगे, रमण ते नाहिं साध, रणजय गाओ रे !' (2) पाये धरी प्राणनाथ आमा छेड़े जेओ ना, एई सुनो, बाजे घन रणजय बाजना। नापिच्छे तुरंग मोर रण करे कामना, उड़िलो आमार मन घरे आर रबो ना। रमधी ते नाहिं साथ, रणजय गाओर।‘‘ दूसरे दिन आनंदमठ के अन्दर एक कमरे मे बैठे, निरुत्साह तीन संताननायक आपस मे बातें कर रहे थे। जीवानन्द से सत्यानन्द से पूछा- ‘‘महाराज ! ईश्वर हम लोगो पर इतने अप्रसन्न क्यो है? किस दोष से हम लोग मुसलमानो से पराभूत हुए?’‘ सत्यानंद ने कहा- ‘‘भगवान अप्रसन्न नही है। युद्ध मे जय-पराजय दोनो होती है। उस दिन हम लोगो की विजय हुई थी, आज पराजय हुई है, अन्त मे फिर जय है। हमे निश्चित भरोसा है कि जिन्होने इतने दिनो तक