भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

सत्यानंद- "ठीक । इन तीनो गुणो की पृथक-पृथक उपासना होती है । उनके सत्व से दया-दक्षिणा आदि की उत्पत्ति होती है । वे अपनी उपासना भक्ति द्वारा करते है - चैतन्य सम्प्रदाय यही करता है । रजोगुण से उनकी शक्ति की उत्पत्ति होती है; इसकी उपासना युद्ध द्वारा, देवद्वेषीगण के निधन द्वारा होती है-वही हम करते है । और तमोगुण से ही भगवान भगवान अपनी साकार चतुर्भुज आदि विविध मूर्ति धारण करते है । केसर-चन्दनादि उपहार द्वारा उस गुण की पूजा होती है-सर्व साधारण वही करते है. अब समझे?" महेन्द्र- "समझ गया-संतानगण उपासक सम्प्रदाय मात्र है ।" सत्यानंद- "ठीक है ! हम लोग राज्य नही चाहते-केवल मुसलमान भगवान के विद्वेषी है - इसलिए समूल विनाश करना चाहते है ।" सत्यानन्द बातचीत समाप्त कर महेन्द्र के साथ उठकर उस मठस्थित देवालय मे जहां विराट आकार की भगवान विष्णु की मूर्ति विराजित थी, वही पहुंचे । उस समय वहां अपूर्व शोभा थी- रजत,स्वर्ण और रत्नरंजित प्रदीपो से मंदिर आलोकित हो रहा था; राशि-राशि पुष्पो की शोभा से मंदिर और देव मूर्ति शोभित थी; सुगन्धित मधुर धूमराशि से कक्ष वस्तुतः देवसान्निध्य का प्रमाण उपस्थित कर रहा था । मंदिर मे एक और पुरुष बैठा हुआ- "हरे मुरारे" स्तोत्र का पाठ कर रहा था। सत्यानंद के वहां पहुंचते ही उसने उठकर उन्हे प्रणाम किया । ब्रह्मचारी ने पूछा- "तुम दीक्षित होगे?" उसने कहा- "मुझ पर कृपा कीजिये !" सत्यानन्द- "तुम लोग इन भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो कि संतान-धर्म के सारे नियमो का पालन करोगे !" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "जितने दिनो तक माता का उद्धार न हो, उतने दिनो तक गृहधर्म का परित्याग किये रहोगे?" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "माता-पिता का त्याग करोगे?" दोनो- "करूंगा ।" सत्यानन्द- "भ्राता-भगिनी?" दोनो- "त्याग करूंगा ।" सत्यानंद- "दारा-सुत ?" दोनो- "त्याग करूंगा ।" सत्यानंद- "आत्मीय-स्वजन? दास-दासी?" दोनो- "इन सबका त्याग किया ।" सत्यानंद- "धन-सम्पदा-भोग?" दोनो- "सबका परित्याग ।" सत्यानन्द- "इन्द्रियजयी होगे ? नारियो के साथ कभी एक आसन पर न बैठोगे?" दोनो- "न बैठेगे; इन्द्रियां वश मे रखेगे ।" सत्यानन्द- "भगवान के सामने प्रतिज्ञा करो-अपने लिए या अपने स्वजनो के लिए अर्थोपार्जन नही करोगे ! जो कुछ उपार्जन करोगे, उसे वैष्णव धनागार को अर्पित कर दोगे !" दोनो- "देगे ।" सत्यानन्द- "सनातन-धर्म के लिए स्वयं अस्त्र पकड़कर युद्ध करोगे?"