भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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दोनो- “करेगे।‘ सत्यानन्द- “रण मे कभी पीठ न दिखओग?” दोनो- “नही।‘ सत्यानन्द- “यह प्रतिज्ञा भंग हो तो?” दोनो- “जलती चिता मे प्रवेश कर अथवा विषपान कर प्राण त्याग देगे।‘ सत्यानन्द- “और एक बात है, और वह है जाति। तुम किस जाति के हो? महेन्द्र तो कायस्थ है। तुम्हारी जाति?” दूसरे व्यक्ति ने कहा- “मै ब्राह्मण-कुमार हूं।‘ सत्यानन्द- “ठीक। तुम लोग अपनी जाति का त्याग कर सकोगे? समस्त सन्तान एक जाति मे है। इस महाव्रत मे ब्राह्मण-शूद्र का विचार नही है। तुम लोगो का क्या मत है?” दोनो- “हम लोग भी जाति का ख्याल न करेगे। हम सब माता की सन्तान एक जाति के है।‘ सत्यानन्द- “अब मै तुम लोगो को दीक्षित करूंगा। तुम लोगों ने जो प्रतिज्ञा की है, उसे भंग न करना। भगवान मुरारि स्वयं इसके साक्षी हैं। जो रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, जरासन्ध, शिशुपाल आदि के विनाश-हेतु है, जो सर्वान्तर्यामी है, सर्वजयी है, सर्व शक्तिमान है और सर्वनियन्ता है, जो इन्द्र के वज्र को भी बिल्ली के नाखूनो के समान समझते हैं, वही प्रतिज्ञा-भंगकारी को विनष्ट कर अनन्त नरकवास देगे।‘ दोनो- “तथास्तु!‘ सत्यानन्द- “अब तुम लोग गाओ- “वन्देमातरम-“ दोनो ने मिलकर एक एकांत मन्दिर मे भक्ति-भावपूर्वक मातृगीत का गान किया। इसके बाद ब्रह्मचारी ने उन्हे यथाविधि दीक्षित किया। दीक्षा समाप्त होने के बाद सत्यानन्दजी महेन्द्र को एक बहुत ही एकांत स्थान मे ले गये। दोनो के वहां बैठने के बाद सत्यानन्द ने कहना आरम्भ किया-“वत्स! तुमने तो यह महाव्रत ग्रहण किया हैं, उससे मुझे जान पड़ता है कि भगवान सन्तानो पर सदय है। तुम्हारे द्वारा माता का महत कार्य सिद्ध होगा। तुम ध्यानपूर्वक मेरी बाते सुनो! तुम्हें जीवानन्द, भगवान के साथ वन-वन घूमकर युद्ध करना नही पड़ेगा। तुम पदचिन्ह मे वापस लौट जाओ। अपने घर मे रहकर ही तुम्हे सन्तान-धर्म का पालन करना होगा।‘ यह सुनकर महेन्द्र विस्मित और उदास हुए, लेकिन कुछ बोले नही। ब्रह्मचारी कहने लगे- “इस समय हम लोगो के पास आश्रय नही है, ऐसा स्थान नही है कि यदि प्रबल सेना आकर घेरकर आक्रमण करे तो हम लोग खाद्यादि के साथ फाटक बन्द कर कुछ दिनो तक युद्ध कर सके। हम लोगो के पास गढ़ नही है। वहां अट्टालिका भी तुम्हारी है, गांव भी तुम्हारे अधिकार मे है-मेरी इच्छा हैं कि अब वहां एक गढ़ तैयार हो। परिखा प्राचीर द्वारा पदचिन्ह को घेर देने से-उसमे खाई, खन्दक आदि युद्धोपयोगी किले-बन्दी कर देने से और जगह- जगह तोपे लगा देने से बहुत ही उत्तम गढ़ तैयार हो सकता है। तुम घर जाकर रहो, क्रमशः दो हजार संतान वहां जाकर उपस्थिति होगे। उन लोगों के द्वारा खाई-खन्दक प्राचीर आदि तैयार कराते रहो। वहां तुम्हे एक लौह- कक्ष बनवाना होगा; वही संतानो का अर्थ-भण्डार होगा। मै एक-एक कर सोने से भरे हुए संदूक तुम्हारे पास भेजवाऊंगा। तुम उसी धनराशि से यह सब तैयार कराओ। मै परदेश जाता हूं। वहां से उत्तम कारीगर भेजूंगा। उनके आ जाने पर तुम पदचिन्ह मे कारखाना स्थापित करो। वहां तोपै, गोले, बारूद, बन्दूक आदि निर्माण कराओ। इसीलिए मैं तुम्हे घर जाने को कहता हूं।....“ महेन्द्र ने स्वीकार कर लिया।