आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
है। ऐसी रूपराशि जीवन मे कभी देखूंगा, यदि यह जानता तो कभी सन्तान-धर्म ग्रहण न करता। यह धर्म इस अग्नि मे जलकर क्षार हो जाता है। धर्म जल गया है-प्राण है। आज चार वर्षों से प्राण भी जल रहा है, बचना नही चाहता। दाह! कल्याणी! दाह! ज्वाला! लेकिन जलने वाला, ईंधन अब बच नही गया है। प्राण जा रहा है। चार बरस से सह रहा हूं; अब सहा नही जाता। क्या तुम मेरी होगी?’’ कल्याणी-‘‘तुम्हारे ही मुंह से सुना है कि सन्तान-धर्म का एक यह भी नियम है कि जिसकी इन्द्रिय परवश हो जाए, उसका प्रायश्चित मृत्यु है। क्या यह सच है?’’ भवानन्द-‘‘यह सच है।’’ कल्याणी-‘‘तो तुम्हारे लिए भी वही प्रायश्चित मृत्यु है?’’ भवानन्द-‘‘मेरे लिए एकमात्र प्रायश्चित मृत्यु है।’’ कल्याणी-‘‘तुम्हारी मनोकामना पूरी होने पर मरोगे?’’ भवानन्द-‘‘निश्चय मरूंगा!’’ कल्याणी-‘‘और यदि मै मनोकामना पूरी न करूं?’’ भवानन्द-‘‘तब भी मृत्यु निश्चय है। कारण, मेरी इन्द्रियां परवश हो चुकी है। आगामी युद्ध मे.....’’ कल्याणी-‘‘तुम अब विदा हो! मेरी कन्या भिजवा दोगे?’’ भवानन्द ने आंसू भरी आंखो से कहा-‘‘भिजवा दूंगा। क्या मेरे जाने पर भी मुझे हृदय मे याद रखोगी?’’ कल्याणी-‘‘याद रखूंगी-ब्रम्हच्युत विधर्मी के रूप मे याद रखूंगी।’’ भवानन्द विदा हुए। कल्याणी पुस्तक पढ़ने लगी। भवानन्द विचार-सागर मे गोते लगाते हुए मठ की तरफ चले। वे राह मे अकेले चले आ रहे थे। वन मे भी अकेले ही उन्होंने प्रवेश किया। अब उन्होने देखा कि वन मे उनके आगे-आगे एक आदमी चला जा रहा है। भवानन्द ने पूछा-‘‘कौन हो भाई?‘‘ अग्रगामी व्यक्ति ने कहा-‘‘जानना चाहते हो? उत्तर देता हूं-एक पथिक‘‘ भावानन्द-‘‘वन्दे-‘‘ वह आदमी बोला-‘’मातरम् ।‘‘ भवानन्द-‘‘मै भवानन्द स्वामी हूं ।‘‘ अग्रगामी-‘‘मै धीरानंद ।‘‘ भवानन्द-‘‘धीरानंद! कहां गये थे?‘‘ धीरानंद-‘‘आपकी ही खोज मे ।‘‘ भवानन्द-‘‘क्यो?‘‘ धीरानंद-‘‘एक बात कहने ।‘‘ भवानन्द-‘‘कौन-सी बात?‘‘ धीरानंद-‘‘अकेले मे कहने की है ।‘‘ भवानन्द-‘‘यही बताओ न, यह तो निर्जन स्थान है ।‘‘ धीरानंद- ‘‘ आप नगर मे गए थे‘‘ भवानंद- ‘‘हाँ ।‘‘ धीरानंद- ‘‘गौरी के घर?‘‘ भवानंद- ‘‘तुम भी नगर मे गए थे क्या?‘‘
धीरानंद- ‘‘वहां एक परम सुंदरी रहती है?’’ भवानंद- कुछ विस्मित भी हुए डरे भी। बोले- ‘‘यह सब कैसी बाते है?’’ धीरानंद- ‘‘आप उसके साथ मुलाकात की थी?’’ भवानंद- ‘‘हसके बाद?’’ धीरानंद- ‘‘आप उस कामिनी के प्रति अति अनुरक्त है?’’ भवानंद- ‘‘(कुछ विचारकर) धीरानंद! तुमने क्यो इतनी खोज-बीन की। देखो धीरानंद! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सच है। लेकिन तुम्हारे अतिरिक्त कितने लोग यह बात जानते है?’’ धीरानंद- ‘‘और कोई नही।’’ भवानंद- ‘‘तब तुम्हारा बध करने से ही मै मुक्त हो सकता हूँ।’’ धीरानंद- ‘‘कर सकते हो?’’ भवानंद- ‘‘तब आओ, इस निर्जन स्थान मे ही युद्ध करे। हो सकता तो मै तुम्हारा बध कर कलंक से बचूं या तुम मेरा बध कर दो, ताकि सारी ज्वालाओ मे मेरी मुक्ति हो जाए। बोलो, पास मे अस्त्र है?’’ धीरानंद- ‘‘है! खाली हाथ किसकी मजाल है कि तुम्हारे सामने यह बाते करे। यदि युद्ध की ही तुम्हारी इच्छा है तो वही सही, पर संतान-संतान मे विरोध निषिद्ध है किन्तु आत्महत्या के लिए किसी के साथ भी युद्ध करने मे हर्ज नही। जो बात कहने के लिए मै तुम्हे खोज रहा था, क्या वह सब सुन लेने पर युद्ध करना अच्छा न होगा?’’ भवानंद- ‘‘हर्ज क्यो है कहो!’’ भवानंद ने तलवार निकाल कर धीरानंद के कंधे पर रख दी। धीरानंद भागे नही। धीरानंद- ‘‘मै यह कह रहा था कि तुम कल्याणी से विवाह कर लो।’’ भवानंद- ‘‘कल्याणी यह! भी जानते हो?’’ धीरानंद- ‘‘विवाह क्यों नही कर लेते?’’ भवानंद- ‘‘उसके तो पति जीवित है‘‘ धीरानंद- ‘‘वैष्णो का ऐसा विवाह होता है।’’ भवानंद- ‘‘यह नीच वैरागियो की बात है-संतानो मे नही। संतान की शादी नही होती।’’ धीरानंद- ‘‘संतान-धर्म क्या अपरिहार्य है? तुम्हारे तो प्राण जा रहे है। छिः! छिः! मेरा कंधा न कट गया।’’ (वस्तुतः धीरानंद के कंधे से रक्त निकल रहा था।) भवानंद- ‘‘तुम किसलिए मुझे यह अधर्म-मति देने आए हो? अवश्य ही तुम्हारा कोई स्वार्थ है!‘‘ धीरानंद- ‘‘वह भी कहने की इच्छा है। तलवार न धंसना, बताता हूं। इस संतान-धर्म ने मेरी हड्डियो को जर्जर कर दिया है। मै इसका परित्याग कर स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिताने के लिए उतावला हो रहा हूं। मै इस संतान-धर्म का परित्याग करूंगा। लेकिन क्या मेरे लिए घर जाकर बैठने का अवसर है। विद्रोही के रूप मे अनेक लोग मुझे पहचानते है। घर जाकर बैठते ही शायद राजपुरुष सर उतार ले जाएंगे। अथवा सन्तान लोग ही विश्वासघात समझकर मार डालेगे। इसीलिए तुम्हे भी अपना साथी बना लेना चाहता है।‘‘ भवानन्द-‘‘क्यो, मुझे क्यो?‘‘ धीरानन्द- ‘‘यही असली बात है। सन्तान गण तुम्हारे अधीन है। सत्यानन्द अभी यहां है नही; इनके नायक हो तुम। इस सेना को लेकर युद्ध करो, तुम्हारी विजय होगी, इसका मुझे विश्वास है। युद्ध मे विजय प्राप्त कर क्यो नही तुम अपने नाम से एक राज्य स्थापित करते? सेना तो तुम्हारी आज्ञाकारिणी है। तुम राजा हो, कल्याणी
तुम्हारी मन्दोदरी हो, मैं भी तुम्हारा अनुचर बनकर स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिताऊं और आशीर्वाद करूं। सन्तान-धर्म को अलग जल मे डुबो दो!‘‘ भवानन्द ने धीरानन्द के कंधे पर से तलवार हटा ली; बोले-‘‘धीरानन्द! युद्ध करो! मैं तुम्हारा वध करूंगा। मैं इन्द्रिय-परवश हो सकता हैं, लेकिन विश्वासघातक नही। तुमने मुझे विश्वासघाती होने का परामर्श दिया है- स्वयं भी विश्वासघातक हो। तुम्हे सामने मारने से ब्रह्महत्या भी न होगी। मैं तुम्हारा वध करूंगा!‘‘ बात समाप्त होते-न-होते धीरानन्द दम भरकर भागे। भगवान ने पीछा न किया। भगवान कुछ अनमने से थे; उन्होने अब देखा, धीरानन्द का कही पता न था। मठ मे जाकर और फिर भवानन्द जंगल मे घुस गए। उस जंगल मे एक जगह प्राचीन अट्टालिका का भग्नावशेष है। उस ढूहे पर घास-पात आदि जम आई है। वहां असंख्य सर्पों का वास है। ढूहे की जमीन अपेक्षाकृत साफ और ऊंची थी। भवानन्द उसी पर जाकर बैठे और चिंता मे मग्न हो गए। भयानक अंधेरी रात थी। उस पर वह जंगल अति विस्तृत, एकदम सूना जंगल वृक्ष-लताओ से घना और दुर्भेद्य, गमनागमन मे दुष्कर है। आवाज आती भी है तो भूखे शेर की हुंकार, अन्यान्य पशुओ के भागने या बोलने का शब्द, कभी पक्षियो के पर फटफटाने की आवाज, तो कभी भागते हुए पशुओ के पैर की खरखराहट। ऐसे निर्जन स्थान मे उस ढूहे पर अकेले भगवान बैठे हुए है। उनके लिए इस समय पृथ्वी है ही नही, या केवल उपादान मात्र है। भवानन्द निश्चल थे, श्वास-प्रश्वास अति सूक्ष्म, अपने मे ही विलीन, माथे पर हाथ रखे बैठे थे। मन मे सोचते थे-जोहोना होना है, अवश्य होगा। भागीरथी की जल-तरंगो के बीच क्षुद्र हाथी की तरह इंद्रिय-स्रोत मे डूब गया, यही दुःख है। एक क्षण मे इंद्रियो का ध्वंस हो सकता है, शरीर-निपात कर देने से। मैं इसी इंद्रिय के वश मे हो गया? मेरा मरना ही अच्छा है। धर्मत्यागी! छिः! छिः! मैं अवश्य मरूंगा। इसी समय माथे पर पेचक ने भयानक शब्द किया। भवानन्द अब खुलकर बड़बड़ाने लगे- ‘‘यह कैसा शब्द? कान मे ऐसा सुनाई पड़ा, मानो भय का आह्वान हो। मैं नही जानता, मुझे कौन बुलाता-यह किसका शब्द है? किसने राह बतायी, किसने मरने के लिए कहा? पुण्यमय अनन्त! तुम शब्द-शब्दमय हो; लेकिन तुम्हारे शब्द का अर्थ तो मैं समझ नही पाता हूं!‘‘ इसी समय भीषण जंगल मे से मधुर साथ ही गंभीर, प्रेम भरा मनुष्य-कष्ठ सुनाई दिया-‘‘आशीर्वाद देता हूं, धर्म मे तुम्हारी मति अवश्य होगी!‘‘ भवानन्द के शरीर के रोगटे खड़े हो गये-यह क्या? यह तो गुरुदेव की आवाज है- ‘‘महाराज! आप कहां है? इस समय सेवक को दर्शन दीजिये।‘‘ लेकिन किसी ने भी दर्शन न दिया, किसी ने भी उत्तर न दिया। भवानन्द ने बार-बार बुलाया, लेकिन कोई उत्तर न मिला। इधर-उधर खोजा, कही कोई न था। रात बीतने पर जब जंगल मे प्रभात का सूर्य उदय हुआ-जंगल मे प्रभात का सूर्य उदय हुआ-जंगल मे पत्तो की हरियाली जब चमक उठी, तब भवानन्द मठ मे वापस आ गए। उनके कानो मे आवाज पहुंची- ‘‘हरे मुरारे! हरे मुरारे!‘‘ पहचान गए कि यह सत्यानन्द की आवाज है। समझ गए कि प्रभु वापस आ गए! जीवानन्द के कुटी से बाहर चले जाने पर शान्ति देवी फिर सारंगी लेकर मृदु स्वर मे गाने लगी- ‘‘प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदं विहित वहित्र चरित्रमखेदं, केशवधूत मीन शरीर,
जय जगदीश हरे !‘‘ गोस्वामी विरचित स्तोत्र को जिस समय सारंगी की मधुर ध्वनि पर कोमल स्वर से शांति गाने लगी, उस समय वह स्वर-लहरी वायुमण्डल पर इस तरह तरंगित हो उठी, जिस तरह जल मे अवगाहन करने पर स्रोत वाहिनी नदी मे धार कुण्डलाकार होकर लहराने लगती है। शांति गाने लगी ! ‘ ‘निन्दसि यज्ञविधेरहः श्रुतिजात सदस्य हृदय दर्शित पशुघातम, केशव धुत बुद्ध शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ इसी समय किसी ने बाहर से गंभीर स्वर मे-मेघगर्जन के समान गंभीर स्वर मे गाया ! ‘‘म्लेच्छ निवहनिधने कलयसि करवालम् धूमकेतुमिव किमपि करालम् केशवधृत कल्कि शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ शांति ने भक्ति-भाव से प्रणत होकर सत्यानन्द के पैरों की धूलि ग्रहण की और बोली- ‘‘प्रभो ! मेरा ऐसा कौन-सा भाग्य है कि श्री पादपद्मो का यहां दर्शन मिला। आज्ञा दीजिये, मुझे क्या करना होगा ?‘‘ यह कहकर शांति ने फिर स्वर-लहरी छेड़ी ! ‘‘भवचरणप्रणता वयमिति भावय कुरु कुशल प्रणतेषु ।‘‘ सत्यानन्द ने कहा-‘‘तुम्हे मैं पहचानता न था, बेटी ! रस्सी की मजबूती न जानकर मैने उसे खीचा था। तुम मेरी अपेक्षा ज्ञानी हो। इसका उपाय तुम्ही कहो। जीवानन्द से न कहना कि मैं सब कुछ जानता हूं। तुम्हारे प्रलोभन से वे अपनी जीवन-रक्षा कर सकेगे-इतने दिनो से कर ही रहे है ऐसा होने से मेरा कार्योद्धार हो जाएगा ।‘‘ शांति के उन विशाल लोल कटाक्षों मे निदाघ-कादम्बिनी मे विराजित बिजली के सामान घोर रोष प्रकट हुआ। उसने कहा- ‘‘यह क्या कहते है महाराज ! मैं और मेरे पति एक आत्मा है। मरना होगा तो वे मरेगे ही, इसमे मेरा नुकसान ही क्या है। मैं भी तो साथ मरूंगी ! उन्हे स्वर्ग मिलेगा तो क्या मुझे स्वर्ग न मिलेगा ?‘‘ ब्रह्मचारी ने कहा-देवी ! मैं कभी हारा न था, आज तुमसे तर्क मे हार मानता है। मां ! मैं तुम्हारा पुत्र है- संतान पर स्नेह रखो। जीवानन्द के प्राणो की रक्षा करो। इसी से मेरा कार्योद्धार होगा। बिजली हंसी। शांति ने कहा-मेरे स्वामी धर्म मेरे स्वामी के ही हाथ हैं। मैं उन्हे धर्म से विरत करनेवाली कौन हूं? इहलोक मे स्त्री का देवता पति है : किंतु परकाल मे सबका पिता धर्म होता है। मेरे समीप मेरे पति बड़े हैं उनकी अपेक्षा मेरा धर्म बड़ा है-उससे भी बढ़कर मेरे लिए पति का धर्म है। मैं अपने धर्म को जिस दिन चाहूं जलांजलि दे सकती हूं, लेकिन क्या स्वामी के धर्म को जलांजलि दे सकती हूं? महाराज ! तुम्हारी आज्ञा पर मरना होगा तो मेरे स्वामी मरेगे, मैं मना नही कर सकती। इस पर ब्रह्मचारी ने ठंडी सांस भरकर कहा-‘ ‘मां ! इस घोर व्रत मे बलिदान ही है। हम सबको बलिदान चढ़ाना पड़ेगा। मैं मरूंगा जीवानन्द, भवानन्द-सभी मरेगे, शायद तुम भी मरोगी। किन्तु देखो, कार्य पूरा करके ही मरना होगा, बिना कार्य के मरना किस काम का? मैंने केवल जन्मभूमि को ही मां माना था और किसी को भी मां नही कहा, क्योकि सुजला-सुफला माता के अतिरिक्त मेरी और कोई माता नही। अब तुम्हे भी मां
कहकर पुकारा है। तुम माता होकर हम संतानो का कार्य सिद्ध करो। जिससे हमारा कार्योद्धार हो वही करो- जीवानन्द की प्राण-रक्षा करना, अपनी रक्षा करना ! यही कहकर सत्यानन्द-हरे मुरारे, मधुकैटभारे ? गाते हुए चले गये। क्रमशः सन्तान सम्प्रदाय में समाचार प्रचारित हुआ कि सत्यानन्द आ गये है और सन्तानो से कुछ कहना चाहते है। अतः उन्होने सबको बुलवाया है। यह सुनकर दल-के-दल सन्तान लोग आकर उपस्थित होने लगे। चांदनी रात मे नदी-तट पर देवदारु के वृहत् जंगल मे आम, पनस, ताड़, वट, पीपल, बेल, शाल्मली आदि पेड़ो के नीचे करीब दस सहस्र सन्तान आ उपस्थित हुए। सब आपस में सत्यानन्द के लौट आने का समाचार सुनकर महाकोलाहल करने लगे। सत्यानन्द किसलिए वहां गये थे- यह साधारण लोग जानते न थे। अफवाह थी कि वे सन्तानो की मंगलकामना से प्रेरित होकर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने ोलगये थे। सब आपस मे कानाफूसी करने लगे- "महाराज की तपस्या सिद्ध हो गयी है- अब हम लोगो का राज्य होगा।" इस पर बड़ा कोलाहल होने लगा। कोई चीत्कार करने लगा-मारो-मारो, पापियो को मारो। कोई कहता-‘‘जय-जय ! महाराज की जय ! कोई गाने लगा- हरे मुरारे मधुकैटभारे ! किसी ने "वंदेमारम" गाना गाया। कोई कहता- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि तुच्छ बंगाली होकर भी मै रणक्षेत्र मे शरीर उत्सर्ग करूंगा।" कोई कहता-- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि अपना ही धर्म हम स्वयं भोग करेगे।" इस तरह दस सहस्र मनुष्यो के कण्ठ-स्वर से निकली गगनभेदी ध्वनि जंगल, प्रान्त, नदी, वृक्ष, पहाड़ सब कांप उठे। एकाएक शब्द हुआ- वन्देमातरम और लोगो ने देखा कि ब्रह्मचारी सत्यानन्द सन्तानो के मध्य आकर खड़े हो गये। इस समय दस सहस्र-मस्तक उसी चांदनी मे वनभूमि पर प्रणत हो गये। बहुत ही ऊंचे स्वर मे, जलद गंभीर शब्दो मे सत्यानन्द ने दोनों हाथ उठाकर कहा- "शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, वनमाली बैकुण्ठनाथ जो केशिमथन मधु-मुर-नरकमर्दन, लोक-पालक है वे तुम लोगो के बाहुओ मे बल प्रदान करे, मन मे भक्ति दे, धर्म मे शक्ति दे ! तुम सब लोग मिलकर एक बार उनका गुणगान करो।" इस पर दस सहस्र कण्ठो से एक साथ गान होने लगा। "जय जगदीश हरे। प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदं विदित विहिवमखेदम जय जगदीश हरे।" इसके उपरान्त सत्यानन्द महाराज उन लोगो को पुनः आशीर्वाद प्रदान कर बोले- "संतानो ! तुम लोगो से आज मुझे कुछ विशेष बात कहनी है। टॉमस नाम के एक विधर्मी दुराचारी ने अनेक संतानो का नाश किया है। आज रात हम लोग उसका ससैन्य वध करेगे ! जगदीश्वर की ऐसी ही आज्ञा है। तुम लोग क्या चाहते हो ?" भयानक हर्षध्वनि से जंगल विदीर्ण उठा- "अभी मारेंगे ! बताओ, चलो, उन सबको दिखा दो। मारो ! मारो ! शत्रुओं का नाश करो?" इसी तरह के शब्द दूर के पहाड़ो से टकराकर प्रतिध्वनित होने लगे। इस पर सत्यानन्द फिर कहने लगे- "उसके लिए हम हम लोगो को जरा धैर्य धारण करना पड़ेगा। शत्रुओ के पास तोप है; बिना तोप के उनके साथ युद्ध हो नही सकता। विशेषतः वे सब वीर-जाति के है। हमारे पदचिन्ह दुर्ग से 17 तोपे आ रही है। तोपो के पहुंचते ही हम लोग युद्ध आरंभ करेंगे। यह देखो, प्रभात हुआ चाहता है। ब्रह्ममुहूर्त के 4 बजते ही....लेकिन यह क्या' --
“गुडुम-गुडुम-गुम! अकस्मात् चारो तरफ विशाल जंगल में तोपो की आवाज होने लगी। यह तोप अंगरेजो की थी। जाल मे पड़ी हुई मछली की तरह कप्तान टॉमस ने सन्तानो को इस जंगल मे घेरकर वध करने का उद्योग किया था। “गुड्डम गुड्डम गुम!” -- अंगरेजों की तोपे गर्जन करने लगी। वह शब्द समूचे जंगल में प्रतिध्वनित होकर सुनाई पड़ने लगा। वह ध्वनि नदी के बांध से टकराकर सुनाई पड़ी। सत्यानन्द ने तुरंत आवाज दी- “देखो, किसकी तोपे है? कई सन्तान तुरंत घोड़े पर चढ़कर देखने के लिए चल पड़े। लेकिन उन लोगो के जंगल से निकलते ही उन पर सावन की बरसात के समान गोले आकर पड़े। अश्वसहित उन सबने वही अपना प्राण त्याग किया। दूर से सत्यानन्द ने देखा, बोल - “पेड़ पर चढ़कर देखो!” उनके कहने के साथ जीवानन्द ने एक पेड़ पर ऊंचे चढ़कर बताया-“अंगरेजो की तोपे!” सत्यानन्द ने पूछा -“अश्वारोही सैन्य है या पदातिक?” जीवानन्द -“दोनो है?” सत्यानन्द - “कितने है?” जीवानन्द – “अन्दाज नही लग सकता। वे सब जंगल की आड़ से बाहर आ रहे है?” सत्यानन्द –“गोरे है या केवल देशी फौज?” जीवानन्द – “गोरे है।” अब सत्यानन्द ने कहा – “तुम पेड़ से उतर आओ।” जीवानन्द पेड़ से उतर आये। सत्यानन्द ने कहा - “तुम दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हो। देखना है, क्या कर सकते हो! जीवानन्द ! आज के सेनापति तुम हो।” जीवानन्द हर्षोत्फुल्ल होकर एक छलांग मे घोड़े पर सवार हो गये। उन्हौने एक बार नवीनानन्द की तरफ ताककर इशारे मे ही कुछ कहा-कोई उसे समझ न सका। नवीनानन्द ने भी इशारे मे ही उत्तर दिया। केवल वे दोनो ही आपस मे समझ गये कि शायद इस जीवन मे यह आखिरी मुलाकात है; पर नवीनानन्द ने दाहिनी भुजा उठाकर लोगो से कहा-“भाइयो! समय है, गाओ -- “जय जगदीश हरे!” दस सहस्र सन्तानो के मिलित कण्ठ ने आकाश, भूमि, वन-प्रांत को कंपा दिया। तोप का शब्द उस भीषण हुंकार मे डूब गया। दस सहस्र सन्तानो ने भुजा उठाकर गाया-- “जय जगदीश हरे! म्लेछ निवहनिधने कलयसि करवालम्“ इसी समय अंगरेजो की गोली-दृष्टि जंगल का भेदन करती हुई सन्तानों पर आकर पड़ने लगी। कोई गाता-गाता छिन्नमस्तक छिन्न-बाहु छिन्न-ह्रतपिण्ड होकर जमीन पर गिरने लगा। लेकिन गाना बन्द न हुआ, वे सब गाते ही रहे – “जय जगदीश हरे!” गाना समाप्त होते ही सब निस्तब्ध हो गये। वह सारा वातावरण – नदी, जंगल, पहाड़ – एकदम निस्तब्ध हो गया। केवल तोपो का गर्जन गोरो के अस्त्रो की झंकार और पद-ध्वनि दूर से सुनाई पड़ने लगी। उस निस्तब्धता को भंग करते हुए सत्यानन्द ने कहा - “भगवान तुम्हारी रक्षा करेगे। तोप कितनी दूरी पर है?” ऊपर से आवाज दी “इसी जंगल के समीप एक छोटा मठ हैं, उसी के पास।” सत्यानन्द –“तुम कौन हो?” ऊपर से आवाज आयी -“मै नवीनानन्द।”
अब सत्यानन्द ने कहा - "तुम लोग दस हजार हो, तुम्हारी विजय होगी! क्या देखते हो छीन लो तोपे !' यह सुनते ही अश्वारोही जीवानन्द ने आवाज दी - "आओ भाइयो,मारो !' इस पर दस सहस्र सन्तान सेना, अश्वारोही और पदतिक, तीर की तरह धावा बोलती आगे बढ़ी। पदातिको के कन्धे पर बन्दूक, कमर मे तलवार और हाथ मे भाले थे। बहुत-से सन्तानो ने बिना युद्ध किये ही गिरकर प्राण- त्याग किया। एक ने जीवानन्द से कहा - "जीवानन्द ! अनर्थक प्राणि-हत्या से क्या फायदा है?'' जीवानन्द ने मुड़कर देखा, कहने वाले भवानन्द थे। जीवानन्द ने पूछा - "तब क्या करने को कहते हो?" भवानन्द - "वन के अन्दर रहकर वृक्षो का आश्रय लेकर अपनी प्राण-रक्षा करे। तोपो के सामने खुले मैदान मे बिना तोप की सन्तानसेना एक क्षण भी टिक न सकेगी। लेकिन जंगल मे पेड़ो की आड़ लेकर हम लोग बहुत देर तक युद्ध कर सकते है !' जीवानन्द - "तुम ठीक कहते हो ! लेकिन प्रभु की आज्ञा है कि तोप छीन जाए। अतः हम लोग तोप छीनके ही जाएंगे। " भवानन्द - "किसकी हिम्मत है कि तोप छीन सके। लेकिन यदि जाना ही है, तो तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द - "यह न होगा, भवानन्द! आज मेरे मरने का दिन है।' भवानन्द - "आज मेरे मरने का दिन है !' जीवानन्द - "मुझे प्रायश्चित करना होगा।' भवानन्द - "तुम निष्पाप हो, तुम्हे प्रायश्चित की जरूरत नही। मेरा चरित्र कलुषित है; मुझे ही मरना होगा। तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द --" भवानन्द, तुमसे क्या पाप हुआ है, मै नही जानता; लेकिन तुम्हारे रहने से सन्तानो का उद्धार होगा। मै जाता हूं।' भवानन्द ने चुप होकर फिर कहा --"मरना होगा तो आज ही मरेगे, जिस दिन जरूरत होगी,उसी दिन मरेगे। मृत्यु के लिए मुझे समय-काल की जरूरत नही !' जीवानन्द - "तब आओ !' इस बात पर भवानन्द सबके आगे हुए। दल-के-दल, एक-एक-कर सन्तान गोले खाकर मरकर गिरने लगे। सन्तान-सैन्य बिखरने लगी। तीर की तरह आगे बढ़ते हुए सन्तान गोला खाकर कटे वृक्ष की तरह नीचे गिरते थे। सैकड़ो लाशे पट गयी। इसी समय भवानन्द ने चिल्लाकर कहा - "आज इस तरंग मे संतानो को कूदना है कौन आता है भाई?' इस पर सहस्र-सहस्र कण्ठो से आवाज आयी- "वन्देमातरम् !' दनादन गोले आ रहे थे। तीर गिर रहे थे, लेकिन संतान सैन्य तीर की तरह आगे बढ़ती ही जाती थी। सबका लक्ष्य तोप छीनना था। इसके बाद तो दस हजार सन्तान सैन्य 'वन्देमातरम्' गाती हुई, अपने भाले आगे कर तीर की तरह तोपों पर जा पड़ी। यद्यपि वे लोग गोले और गोलियो की बौछार से क्षत-विक्षत हो चुके थे, लेकिन पलटे नही, भागे नही घनघोर युद्ध शुरू हो गया। लेकिन इसी समय रण-कुशल टॉमस की आज्ञा से एक सेना बन्दूको पर संगीने चढ़ाकर पीछे से निकलकर संतानो के दाहिने बाजू पर गिरी। अब जीवानन्द ने कहा-" भवानन्द ! तुम्हारी ही बात ठीक थी। अब सन्तान-सैन्य को नाश करने की जरूरत नही लौटाओ इन्हे !' भवानन्द - "अब कैसे लौट सकते है? अब तो जो पीछे पलटेगा, वही मारा जाएगा।' जीवानन्द - "सामने और दाहिने से आक्रमण हो रहा है। आओ, धीरे-धीरे बाएं होकर निकल चले।' भवानन्द - "बाएं घूमकर कहां जाओगे? बाएं नदी है - वर्षा से भरी हुई नदी। इधर गोले से बचोगे, तो नदी
मे डूबकर मरोगे।‘' जीवानन्द - "मुझे याद है, नदी पर एक पुल है।‘' भवानन्द - "लेकिन इतनी संख्या मे सन्तान जब पुल पर एकत्र हो जाएंगे, तो एक ही तोप उनका समूल नाश कर देगी।‘' जीवानन्द - "तब एक काम करो। आज तुमने जो शौर्य दिखाया है, उससे तुम सब कुछ कर सकते हो। थोड़ी सेना के साथ तुम सामना करो। मैं अवशिष्ट सेना को बाएं घुमाकर निकाल ले जाता हूं। तुम्हारे साथ की सेना तो अवश्य ही विनष्ट होगी, लेकिन अवशिष्ट सन्तान सेना नष्ट होने से बच जाएगी।‘' भवानन्द -"अच्छा, मैं ऐसा ही करूंगा।‘' इस तरह दो हजार सैनिको के साथ भवानन्द के सामने से फिर गोलन्दाजो पर आक्रमण किया। उनमे अपूर्व उत्साह था। घोरतर युद्ध होने लगा। गोलन्दाज सेना उनके विनाश मे और तोप-रक्षा मे संलग्न हुई। सैकड़ों सन्तान कट-कटकर गिरने लगे। लेकिन प्रत्येक सन्तान अपना बदला लेकर मरता था। इधर अवसर पाकर जीवानन्द अवशिष्ट सेना के साथ बाएं मुड़कर जंगल के किनारे से आगे बढ़े। कप्तान टॉमस के सहकारी लेफ्टिनेट वाटसन ने देखा कि सन्तानो का बहुत बड़ा दल भागने की चेष्टा मे बाएं घूमकर जाना चाहता है। इस पर उन्होने देशी सिपाहियो की सेना लेकर उनका पीछा किया। कप्तान टॉमस ने भी यह देखा। सन्तान-सेना का प्रधान भाग इस तरह गति बदल रहा है- यह देखकर उन्होने सहकारी से कहा - "मै दो-चार सौ सिपाहियो के साथ सामने की सेना को मारता हूं, तुम शेष सेना के साथ उन पर धावा करो। बाएं से वाटसन जाते हैं, दाहिने से तुम जाओ। और देखो, आगे जाकर पुल का मुंह बन्द कर देना। इस तरह वे सब तरह से घिर जाएंगे। तब उन्हे फंसी चिड़िया की तरह मार गिराओ। देखना, देशी फौज भागने मे बड़ी तेज होती है, अतः सहज ही उन्हे फंसा न पाओगे। अश्वारोही सेना को व न सके अन्दर से छिपकर पहले पुल के मुंह पर पहुंच जाने को कहो, तब वे फंस सकेगे।?" कप्तान टॉमस ने, जो कुशल सेनापति था, अपने अहंकार के वश होकर यही भूल की। उसने सामने की सेना को तृणवत समझ लिया था। उसने केवल दो सौ पदतिक सैनिको को अपने पास रहने दिया और शेष सबको भेज दिया। चतुर भवानन्द ने जब देखा कि तोप के साथ समूची सेना उधर चली गयी और सामने की छोटी सेना सहज ही वध्य है, तो उन्होने अपनी सेना को जोश दिलाया - "क्या देखते हो, सामने मुट्ठी भर अंग्रेज हैं, मारो! इस पर वह संतान सेना टॉमस की सेना पर टूट पड़ी। उस आक्रमण को थोड़े-से अंग्रेज सह न सक; मूली की तरह वे कटने लगे। भवानन्द ने स्वयं जाकर कप्तान टॉमस को पकड़ लिया। कप्तान अंत तक युद्ध करता रहा। भवानन्द ने कहा - "कप्तान साहेब! मैं तुम्हे मारूंगा नही, अंग्रेज हमारे शत्रु नही है। क्यो तुम मुसलमानो की सहायता करने आये? तुम्हें प्राणदान तो देता हूं, लेकिन अभी तुम बन्दी अवश्य रहोगे। अंग्रेजो की जय हो, तुम हमारे मित्र हो।‘' कप्तान ने भवानन्द को मारने के लिए संगीन उठायी, लेकिन भवानन्द से शेर की तरह जकड़े हुए थे, वह हिल न सका। तब भवानन्द रासने अपने सैनिकों से कहा -"बांधो इन्हे।‘' दो-तीन सन्तानो ने टॉमस को बांध लिया। भवानन्द ने कहा - "इन्हे घोड़े पर बैठाकर ले चलो। हम लोग जीवानन्द की सहायता को जाते हैं।‘' इसी तरह वह अल्पसंख्यक सन्तान-सेना कप्तान टॉमस को कैदी बनाकर घोड़े पर चढ़ भवानन्द के साथ जीवानन्द की सहायता के लिए आगे बढ़ी। जीवानन्द की सेना का उत्साह टूट चुका था, वह भागने को तैयार थी। लेकिन जीवानन्द और धीरानंद ने उन्हे समझाकर किसी तरह ठहराया। परन्तु सब सेना को जीवानन्द और धीरानंद पुल की तरफ ले गये। वहां पहुंचते
ही एक तरफ से हेनरी ने और दूसरी तरफ से वाटसन ने उन्हे घेर लिया। अब सिवा युद्ध के परित्राण न था। इधर सेना भग्नोत्साह थी। इसी समय टॉमस की तोपे पास आ पहुंची। अब सन्तानो का दल छिन्न-भिन्न होने लगा। उन्हे प्राण-रक्षा की कोई आशा न रही। जिसे जिधर राह मिली, भागने लगा। जीवानन्द और धीरानन्द ने उन्हे बहुत संयत करने की चेष्टा की, लेकिन कोई फल न हुआ, संतानो का दल तितर-बितर होने लगा। इसी समय ऊंची आवाज मे सुनाई दिया - ‘‘पुल पर जाओ, पुल पर जाओ ! उस पार चले जाओ, अन्यथा नदी मे डूब मरोगे।‘‘ अंगरेजो की सेना की तरफ मुंह किये हुए पुल पर चले जाओ ! जीवानन्द ने देखा कि कहनेवाले भवानंद सामने है। भवानन्द ने कहा,-‘‘जीवानन्द, तुम सेना को पुल पर ले जाओ। दूसरे प्रकार से रक्षा नही है।‘‘ यह सुनते ही संतान-सेना क्रमशः पुल पर पहुंचने लगी। थोड़ी ही देर मे समूची संतान-सेना पुल पर जा पहुंची। भवानन्द, जीवानन्द धीरानन्द सब एकत्र थे। भवानन्द ने जो कुछ कहा था, वही हुआ। अंगरेजो की तोपे पुल के मुंह पर लगी थी और वे गोले उगलने लगी। भयानक संतान-क्षय होने लगा। यह देखकर भवानन्द ने कहा - ‘‘जीवानन्द ! यह एक तोप हमारा नाश कर डालेगी ! क्या देखते हो, जाओ हम तीनो उस पर टूटकर अधिकार ले।‘‘ भवानंद के यह कहते ही जय नाद उठा -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ और उसी समय तीन तलवारे पुनः सिरो पर घूम उठी। तोपची तमाशा ही देखते रह गये। हेनरे और वास्टन दूर खड़े अहंकार और प्रसन्नता मे इसे खिलवाड़ और मूर्खता समझते रहे। किन्तु इसी समय रण का पास पलट गया। पलक मारते ही तीनो सन्तान-नायक तोपचियो पर जा पड़े। तोपचियों के सिर धड़ से कब जुदा हुए कुछ पता नही। उनकी मोह-निद्र टूटी तब, जब बिजली की तरह तलवार चमकाते हुए भवानन्द स्वयं तोप पर खड़े हो गये और बोल -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ सहस्रो कंठो से निकला -‘‘वन्देमातरम् !‘‘ उसी समय जीवानन्द ने तोप का मुंह अंगरेजी सेना की तरफ कर दिया और तोप प्रति-क्षण आग उगलने लगी। अब भवानंद ने कहा - ‘‘जीवानंद भाई ! यह क्षणिक जीत है, अब तुम संतानो को लेकर सकुशल पार चले जाओ। केवल बीस तोप भरनेवाले और मृत्यु का वरण करनेवाले संतानो को तोप की रक्षा के लिए छोड़ दो।‘‘ ऐसा ही हुआ। बीस संतान तोप के इर्द-गिर्द आ डटे। शेष समूची सेना जीवानन्द और धीरानन्द के साथ पार पहुंचने लगी। उस समय भवानंद क्रुद्ध गजराज हो रहे थे। पुल की संकरी जगह पर तोप लगाकर वे लगे गोरी वाहिनी का नाश करने। दल-के-दल तोप छीनने के लिए आगे बढ़ते थे और मरकर ढेर बन जाते थे। उस समय वे बीस युवक अजेय थे। ये लोग शीघ्रता इसलिए कर रहे थे कि अंगरेजो की शेष तोपे पहुंचने के पहले तक ही यह सारी अजेय लीला है। लेकिन भगवान को तो कुछ और ही करना था। एकाएक जंगल के अन्दर से बहुत-सी तोपो का गर्जन सुनाई पड़ने लगा। दोनो ही दल अवाक-रिस्पन्द होकर देखने लगे कि ये किसकी तोपे है? थोड़ी ही देर मे लोगो ने देखा कि जंगल के अन्दर से महेन्द्र की सत्रह तोपे, तीन तरफ से घेरा, बांधे हुए आग उगलती चली आ रही है। अंगरेजो की उस देशी फौज मे महामारी आ गयी- दल-के-दल साफ होने लगे। यह देख शेष यवन-सिपाही भागने लगे। उधर जीवानंद और धीरानन्द ने भी जैसे ही वातावरण समझा, वैसे ही उनका सारा क्रोध पलट पड़ा और पलट पड़ी सन्तान-सेना। वे भागती हुई यवन-सेना को घेरने और मारने लगे। अवशिष्ट रह गये यही कोई तीस-चालीस गोरे। वह वीर जाति वैसे ही डटी रही। अब भवानन्द ने उन पर धावा बोलने के लिए हाथ उठाया ही था कि जीवानन्द ने कहा - ‘‘भवानन्द ! महेन्द्र की कृपा से पूर्ण रण- विजय हुई है; अब व्यर्थ इन्हे मारने से क्या फायदा? चलो लौट चले।‘‘
चतुर्थ खण्ड: महायुद्ध, विजय व राष्ट्र-संदेश
भवानन्द ने कहा - "कभी नही, जीवानंद ! तुम खड़े होकर तमाशा देखो । एक के भी जिंदा रहते भवानन्द वापस नही हो सकता। जीवानन्द! तुम्हे कसम हैं, खड़े होकर चुपचाप देखो। मै अकेले इन सबको मारूंगा।‘' अभी तक कप्तान टॉमस घोड़े पर बंधे हुए थे। भवानन्द ने आक्रमण के समय कहा - "उस अंगरेज को मेरे सामने रखो; पहले यह मरेगा, फिर मैं मरूंगा।" टॉमस हिन्दी समझता था। उसने अपने सिपाहियो को आज्ञा दी- "वीरो ! मै तो मरे के समान हूं। इंगलैण्ड की मान-रक्षा करना, तुम्हे मातृभूमि की कसम हैं! पहले मुझे मारो, इसके बाद प्रत्येक अंग्रेज मारकर अपनी जगह मरे।‘' '‘धांयं‘' एक शब्द हुआ और तुरन्त कप्तान टॉमस मस्तक मे गोली लगने से मरकर गिर पड़ा। यह गोली उसी के एक सिपाही द्वारा चलायी गयी थी। इसके बाद उन सबने आक्रमण किया। अब भवानन्द ने कहा -‘‘आओ भाई! अब कौन ऐसा है जो भीम, नकुल, सहदेव बनकर मेरे साथ मरने को तैयार है?‘' इतना कहते ही जीवानंद, धीरानंद और लगभग पचीस जवान आ पहुंचे। घोर युद्ध हो रहा था। तलवारे रही थी। धीरानंद, भवानंद के पास थे। धीरानंद ने कहा-‘‘भवानंद! क्यो? क्या मरने का किसी का ठेका हैं क्या?‘' यह कहते हुए धीरानंद ने एक गोरे को आहत किया। भवानंद-"यह बात नही? लेकिन मरने पर तो तुम स्त्री-पुत्र का मुंह देखकर दिन बिता न पाओगे!‘' धीरानंद-‘‘दिल की बात कहते हो? अभी भी नही समझे?‘‘ (धीरानंद ने आहत गोरे का वध किया)। भवानंद-‘‘नही‘‘ (इसी समय एक गोरे के आघात से भवानंद का बायां हाथ कट गया।) धीरानंद-"मेरी क्या मजाल थी कि तुम जैसे पवित्रात्मा से यह बाते मै कहता? मै सत्यानंद का गुप्तचर हो कर तुम्हारे पास गया था?‘‘ भवानंद उस समय केवल एक हाथ से युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह क्या? महाराज का मेरे प्रति अविश्वास?‘‘ धीरानंद ने उनकी रक्षा करते हुए कहा- "कल्याणी के साथ तुम्हारी जितनी बाते हुई थी,सब उन्होने स्वयं अपने कानो से सुनी।‘' भवानंद-"यह कैसे?‘‘ धीरानंद-‘‘वे स्वयं वहां उपस्थित थे। सावधान बच्चो! (भवानंद ने एक गोरे द्वारा आहत होकर उसे आहत किया) वे कल्याणी को गीता पढ़ा रहे थे, उसी समय तुम आ गए। सावधान!‘‘ (लेकिन इसी समय भवानंद का दाहिना हाथ भी कट गया।) भवानंद-"मेरी मृत्यु का समाचार उन्हे देना। कहना- मै अविश्वासी नही हूं।‘‘ धीरानंद आंखो से आंसू भरे हुए युद्ध कर रहे थे। बोले-‘‘यह वे जानते है। उन्होने मुझसे कह दिया है कि भवानंद के पास रहना, आज वह मरेगा। मृत्यु के समय उससे कहना कि मै आशीर्वाद देता हूं, परलोक मे तुम्हे बैकुण्ठ प्राप्त होगा।‘‘ भवानंद ने कहा-"संतानो की जय हो ! मुझे एक बार मरते समय 'वन्देमातरम्' गीत तो सुनाओ।‘‘ इस पर धीरानंद की आज्ञा पाकर समस्त उन्मत्त संतानो ने एक साथ 'वन्देमातरम्' गीत गाया। इससे उनकी भुजाओ मे दूना बल आ गया। इतनी देर मे अवशिष्ट गोरो का वध हो चुका था। रणक्षेत्र मे एक भी शत्रु न रह गया। हा! रमणी के रूप-लावण्य !....इस संसार मे तुझे ही धिक्कार हैं ! रण-विजय के उपरान्त नदी तट पर सत्यानंद को घेरकर विजयी सेना विभिन्न उत्सवो मे मत्त हो गयी। केवल सत्यानन्द दुःखी थे, भवानन्द के लिए।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
अब तक संतानो के पास कोई रण-वाद्य नही था। अब न मालूम कहां से हजारो नगाड़े, ढोल, भेरी, शहनाई, तुरी, रामसिंघा, दमामा आ गये। तुमुल ध्वनि से नदी, तटभूमि और जंगल कांप उठा। इस प्रकार संतानो ने बहुत देर तक विजय का उत्सव मनाया। उत्सव के उपरांत सत्यानन्द स्वामी ने कहा-‘‘आज भगवान सदय हुए है; संतानो की विजय हुई है; धर्म की जय हुई है। लेकिन अभी एक बात बाकी है। जो हमलोगो के साथ इस उत्सव में शरीक न हो सके, जिन्होने हमारे उत्सव के लिए प्राण उत्सर्ग किए किए है, उन्हे हम लोगो को भूलना न चाहिए-विशेषतः उस वीराग्रगण्य भवानन्द को, जिसके अदम्य रण-कौशल से आज हमारी विजय हुई है। चलो, उसके प्रति हमलोग अपना अन्तिम कर्त्तव्य कर आएं।‘‘ यह सुनते ही संतानगण बड़े समारोह से ‘वन्देमातरम‘ आदि जय-ध्वनि करते हुए रणक्षेत्र मे पहुंचे। वहां उन लोगो ने चंदन-चिता सजा कर आदरपूर्वक भवानन्द की लाश सुलाई और आग लगा दी। इसके बाद वे लोग उस वीर की प्रदक्षिणा करते हुए ‘वन्देमातरम्‘ का गीत गाते रहे। संतान-सम्प्रदाय विष्णुभक्त है, वैष्णव सम्प्रदाय नही। अतः इनके शव जलाए ही जाते थे। इसके उपरांत उस कानन मे केवल सत्यानन्द, जीवानन्द, महेंद्र, नवीनानन्द और धीरानन्द रह गए। यह पांचो जन परामर्श के लिए बैठ गए। सत्यानन्द ने कहा-‘‘इतने दिनो से हम लोगो ने अपने सर्वकर्म, सर्वसुख त्याग रखे थे, आज यह व्रत सफल हुआ है। अब इस प्रदेश मे यवन सेना नही रह गयी है। जो थोड़ी-बहुत बच गयी है, वह एक क्षण भी हमारे सामने टिक नही सकती। अब तुम लोग क्या परामर्श देते हो?‘‘ जीवानन्द ने कहा-‘‘चलिये, इसी समय चलकर राजधानी पर अधिकार करे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘मेरा भी ऐसा मत है।‘‘ धीरानन्द-‘‘सेना कहां है?‘‘ जीवानन्द-‘‘क्यो, यही सेना!‘‘ धीरानन्द-‘‘यही सेना है कहां? किसी को देख रहे है?‘‘ जीवानन्द-‘‘स्थान-स्थान पर ये लोग विश्राम कर रहे होगे; डंके पर चोट पड़ते ही इकट्ठे हो जाएंगे।‘‘ धीरानन्द-‘‘एक आदमी भी न पा सकेगे।‘‘ सत्यानन्द-‘‘क्यो?‘‘ धीरानन्द-‘‘सब इस समय लूट-पाट मे व्यस्त हैं। इस समय सारे गांव आरक्षित है। मुसलमानो के गांव और रेशम की कोठी लूटने के बाद ही वे लोग घर लौटेंगे। अभी किसी को न पाएंगे, मै देख आया हूं।‘‘ सत्यानन्द दुखी हुए बोले-‘‘जो भी हो, इस समय यह समूचा प्रदेश हमारे अधिकार मे आ गया है। अब यहां कोई हमारा प्रतिद्वन्द्वी नही है। अतएव इस वीरेन्द्र भूमि मे तुम लोग अपना सन्तान-राज्य प्रतिष्ठित करो। प्रजा से कर वसूल करो और सैन्य-संग्रह करो। हिन्दुओ का राज्य हो गया है, यह सुनकर बहुतेरी संतान-सैन्य तुम्हारे झण्डे के नीचे आ जाएगी।‘‘ इस पर जीवानन्द आदि ने सत्यानन्द को प्रणाम किया और कहा-‘‘यदि आज्ञा हो महाराजाधिराज! तो हम लोग इसी जंगल मे आपका सिंहासन स्थापित कर सकते है।‘‘ सत्यानन्द ने अपने जीवन मे यह प्रथम बार क्रोध प्रकट किया बोले-‘‘क्या कहा? क्या मुझे केवल कच्चा घड़ा ही समझ लिया है? हमलोग कोई राजा नही है, हम केवल संन्यासी है। इस प्रदेश के राजा स्वयं बैकुण्ठनाथ है, जहां प्रजातन्त्र-राज्य स्थापित होगा। नगर अधिकारी के बाद तुम्ही लोग कार्यकर्ता होगे। मै तो ब्रह्मचर्य-शक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी स्वीकार न करूंगा। अब तुम लोग अपने-अपने काम मे लगो।‘‘
इस पर चारो व्यक्ति प्रणाम करने के बाद उठ गए। सत्यानंद ने इशारे से महेन्द्र को बैठे रहने के लिए कहा, अतः वे तीनो चले गए। अब सत्यानंद ने महेन्द्र से कहा- "तुम लोगो ने विष्णुमण्डप मे शपथ ग्रहण का सनातन धर्म स्वीकार किया था। भवानन्द और जीवानंद दोनो ने ही प्रतिज्ञा भंग की है। भवानन्द ने स्वीकृत प्रायश्चित कर लिया। हमे इस बात का भय है कि कही जीवानन्द भी किसी दिन प्रायश्चित न कर बैठे। लेकिन मेरा किसी निगूढ़ कारणवश विश्वास है कि वह अभी ऐसा न करेगा। अकेले तुम्ही ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की है। अब संतानो का कार्योद्धार हो गया है। तुम्हारी प्रतिज्ञा थी कि जब तक संतानो का कार्योद्धार न होगा, स्त्री-कन्या का मुंह न देखोगे। अब कार्योद्धार हो चुका है, अतः तुम फिर संसारी हो सकते हो।" महेन्द्र की आंखो से आंसू की धारा बह निकली। बड़े कष्ट से महेन्द्र ने कहा- "महाराज! किसे लेकर संसारी बनूं? स्त्री ने आत्म हत्या कर ली, कन्या कहां है- पता नही! कहां-कहां खोजता फिरूंगा? कुछ भी तो नही जानता।" इस पर सत्यानंद ने नवीनानंद को बुलाकर कहा- "महेद्र, ये नवीनानंद गोस्वामी है- बहुत ही पवित्रचेता और मेरे परम प्रिय शिष्य है। तुम्हारी कन्या की खोज कर देगे।" कहकर सत्यानंद ने शांति से कुछ इशारे से कहा। शांति समझकर प्रणाम कर विदा होना चाहती थी, इसी समय महेद्र ने कहा-"तुम्हारे साथ कहां मुलाकात होगी?" शांति ने कहा- "मेरे आश्रम मे आइये।" यह कहकर शांति आगे-आगे चली। महेद्र भी सत्यानंद की पदवंदना कर विदा हुए, फिर शांति के साथ-साथ उसके आश्रम मे उपस्थित हुए? उस समय काफी रात बीत चुकी थी। फिर भी विश्राम न कर शांति ने नगर की तरफ यात्रा की। सबके चले जाने पर सत्यानंदन भूमि पर प्रणत होकर भगवान की वंदना और याद करने लगे। पौ फट रही थी। इसी समय किसी ने आकर उनके मस्तक का स्पर्श कर कहा- "मैं आ गया हूं।" ब्रह्मचारी ने उठकर और चकित व्यग्रभाव से कहा- "आप आ गए क्या!" जो आए थे उन्होने कहा- "दिन पूरे हो गए।" ब्रह्मचारी ने कहा- "हे प्रभु! आज क्षमा कीजिए। आगामी माघी पूर्णिका को मै आपकी आज्ञा का पालन करूंगा।" उस रात को हरिध्वनि के तुमुल नाद से प्रदेश भूमि परिपूर्ण हो गई। संतानो के दल-के-दल उस रात यत्र- तत्र 'वंदेमातरम' और 'जय जगदीश हरे' के गीत गाते हुए घूमते रहे। कोई शत्रु-सेना का शस्त्र तो कोई वस्त्र लूटने लगा। कोई मृत देह के मुंह पर पदाघात करने लगा, तो कोई दूसरी तरह का उपद्रव करने लगा, कोई गांव की तरफ तो कोई नगर की तरफ पहुंचकर राहगीरो और गृहस्थो को पकड़कर कहने लगा- "वंदेमातरम कहो, नही तो मार डालूंगा।" कोई मैदा-चीनी की दुकान लूट रहा था, तो कोई ग्वालो के घर पहुंचकर हांडी भर दूध ही छीनकर पीता था। कोई कहता- "हम लोग ब्रज के गोप आ पहुंचे, गोपियां कहां है?" उस रात मे गांव- गांव मे, नगर-नगर मे महाकोलाहल मच गया। सभी चिल्ला रहे थे- " मुसलमान हार गये; देश हम लोगो का हो गया। भाइयो! हरि-हरि कहो!"-गांव मे मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे। बहुतेरे लोग दलबद्ध होकर मुसलमानो की बस्ती मे पहुंचकर घरो मे आग लगाने और माल लूटने लगे। अनेक मुसलमान दाढ़ी मुंढ़वाकर देह मे भस्मी रमाकर राम-राम जपने लगे। पूछने पर कहते- "हम हिंदू है।" त्रस्त मुसलमानो के दल-के-दल नगर की तरफ भागे। राज-कर्मचारी व्यस्त हो गए। अवशिष्ट सिपाहियो को
सुसज्जित कर नगर रक्षा के लिए स्थान-स्थान पर नियुक्त किया जाने लगा। नगर के किले मे स्थान-स्थान पर, परिखाओ पर और फाटक पर सिपाही रक्षा के लिए एकत्रित हो गए। नगर के सारे लोग सारी रात जागकर “क्या होगा... क्या होगा?” करते रात बिताने लगे। हिंदू कहने लगे- “आने दो, संन्यासियो को आने दो- हिंदुओ का राज्य- भगवान करे- प्रतिष्ठित हो!” मुसलमान कहे लगे-“इतने रोज के बाद क्या सचमुच कुरानशरीफ झूठा हो गया? हम लोगो ने पांच वक्त नवाज पढ़कर क्या किया, जब हिंदुओ की फतह हुई। सब झूठ है!” इस तरह कोई रोता हुआ, तो कोई हंसता हुआ बड़ी उत्कंठा से रात बिताने लगा। यह खबर कल्याणी के कानो मे भी पहुंची आबाल-वृद्ध-वनिता किसी से भी बात छिपी न रही। कल्याणी ने मन-ही-मन कहा- “जय जगदीश हरे! आज तुम्हारा कार्य सिद्ध हुआ। आज मै स्वामी-दर्शन के लिए यात्रा करूंगी। हे प्रभु! आज मेरी सहायता करो।” गहरी रात को कल्याणी शय्या से उठी और उसने पहले खिड़की खोलकर राह देखी। राह सूनी पड़ी हुई थी- कोई राह मे न था। तब उसने धीरे से दरवाजा खोलकर गौरी देवी का घर त्यागा। शाही राह पर आकर उसने मन-ही-मन भगवान को स्मरण कर कहा- “देव! आज पदचिन्ह का दर्शन करा दो।” कल्याणी नगर के किनारे पहुंची। पहरेवाला ने आवाज दी- “कौन जाता है?” कल्याणी ने डरकर उत्तर दिया- “मै औरत हूं!” पहरेदार ने कहा- “जाने का हुक्म नही है।” वह आवाज जमादार के कान मे पहुंची। उसने कहा- “जाने की मनाही नही है; जाने की मनाही नहीं है।” यह सुनकर पहरेवाले ने कहा- “जाने की मनाही नही है, माई! जाओ, लेकिन आज रात को बड़ी आफत है। कौन जाने माई! किसी आफत मे पड़ जाओ- डाकुओ के हाथ मे पड़ जाओ, मै नही जानता? आज तो न जाना ही अच्छा है।” कल्याणी ने कहा- “बाबा! मै भिखारिन हूं। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। डाकू मुझे पकड़ कर क्या करेगे?” पहरेवाले ने कहा- “उम्र तो है, माई जी! उम्र तो है न! दुनिया मे वही तो जवाहरत है। बल्कि हमी डाकू हो सकते हैं!” कल्याणी ने देखा, बड़ी विपद है; वह धीरे से सरक गयी और फिर तेजी से आगे बढ़ी! पहरेदार ने देखा कि औरत रसिक मिजाज नही थी, लाचार होकर पहरे पर बैठा गांजे का दम लगाकर ही संतुष्ट हो गया। उस रात राह मे दल-के-दल घूम रहे थे। कोई मार-मार कहता है, तो कोई भागो-भागो चिल्लाता है। कोई हंसता है, कोई रोता है, कोई राह मे किसी को देखकर पकड़ लेता है। कल्याणी बड़ी विपदा मे पड़ी। राह मालूम नही, और फिर किसी से पूछ भी नही सकती, केवल छिपती हुई राह चलने लगी। छिपते-छिपते एक विद्रोही दल के हाथ मे पड़ गई। वे लोग चिल्लाकर पकड़ने दौड़े। कल्याणी प्राण लेकर जंगल के अंदर घुसकर भागी। वे सब शोर मचाते हुए पकड़ने के लिए पीछे दौड़े। आखिर एक ने आंचल पकड़ लिया, बोला- “वाह री, चंद्रमुखी!” इसी समय एक और आदमी अकस्मात पहुंच गया और अत्याचारी को उसने एक लाठी जमायी; वह आहत होकर भागा। परित्राणकर्ता का वेश संन्यासियो का था और उसकी छाती ढंकी हुई थी! उसने कल्याणी से कहा- “तुम भय न करो। मेरे साथ आओ- कहां जाओगी?” कल्याणी-“पदचिह्न।” आगंतुक चौंक उठा, विस्मित हुआ; पूछा- “क्या कहा? पदचिह्न?” यह कहकर कल्याणी के दोनो कन्थो पर हाथ रखकर गौर से चेहरा देखने लगा। कल्याणी अकस्मात पुरुष-स्पर्श से भयभीत तथा रोमांचित होकर रोने लगी। इतनी हिम्मत नही हुई कि भाग सके। आगन्तुक ने भरपूर देख लेने के बाद कहा- “ओ हो, पहचान गया! तुम्ही डायन कल्याणी हो?” कल्याणी ने भयविह्वल होकर पूछा-“आप कौन है?”
आगन्तुक ने कहा, "मै तुम्हारा दासानुदास हूं। हे सुन्दरी! मुझ पर प्रसन्न हो।" कल्याणी बड़ी तेजी से वहां से हटकर गर्जन कर बोली- "क्या यह अपमान के लिए ही आपने मेरी रक्षा की थी? देखती हूं, ब्रह्मचारियो का क्या यही धर्म है? आज मैं निःसहाय हूं, नही तो तुम्हारे चेहरे पर लात लगाती।" ब्रह्मचारी ने कहा- "अयि स्मितवदने! मैं बहुत दिनो से तुम्हारे पुष्प समान कोमल शरीर के आलिंगन की कामना कर रहा हूं?" यह कहकर दौड़कर ब्रह्मचारी ने कल्याणी को पकड़ लिया और जबर्दस्ती छाती से लगा लिया। अब कल्याणी खिलखिला कर हंस पड़ी, बोली "यह तुम्हारा कपाल है। पहले ही कह देना था- भाई, मेरी भी यही दशा है।" शान्ति ने पूछा- "क्यो भाई! महेन्द्र की खोज मे चली हो?" कल्याणी ने कहा-"तुम कौन हो? तुम तो सब कुछ जानती हो!" शान्ति बोली- "मै ब्रह्मचारी हूं, सन्तान -सेना का अधिनायक -घोरतर वीर पुरुष! मैं सब जानता हूं आज राह मे सिपाहियो का बहुत हुड़दंग ऊधम है, अतः आज तुम पदचिन्ह जा न सकोगी!" कल्याणी रोने लगी। शान्ति ने त्योरी बदलकर कहा-"डरती क्यो हो? हम अपने नयनबाणो से हजारो का वध कर सकते हैं- चलो, पदचिन्ह चले।" कल्याणी ने ऐसी बुद्धिमती स्त्री की सहायता पाकर मानो हाथ बढ़ाकर स्वर्ग पा लिया। बोली- "तुम जहां कहोगी, वही चलूंगी।" शान्ति कल्याणी को लेकर जंगली राह से चल पड़ी। झ्रध्रह्वघ्रजब आधी रात को शान्ति अपना आश्रम त्यागकर नगर की तरफ चली, तो उस समय जीवानंद वहां उपस्थित थे। शान्ति ने जीवानंद से कहा- "मै नगर की तरफ जाती हूं । महेन्द्र की स्त्री को ले आऊंगी। तुम महेन्द्र से कह रखो कि तुम्हारी स्त्री जीवित है।" जीवानंद ने भवानंद से कल्याणी के जीवन की सारी बाते सुनी थी और उसका वर्तमान वास-स्थान भी सुन चुके थे। क्रमशः ये सारी बाते महेन्द्र को सुनाने लगे। पहले तो महेन्द्र को विश्वास न हुआ। अन्त मे अपार आनंद से अभिभूत अवाक हो रहे। उस रात के बीतने पर सबेरे, शान्ति की सहायता से महेन्द्र के साथ कल्याणी की मुलाकात हुई । निस्तब्ध जंगल के बीच अतिघनी शालतस् श्रेणी की अंधेरी छाया के बीच, पशु-पक्षियो की निद्रा टूटने के पहले उन लोगों का परस्पर मिलन हुआ। म्लान अरण्य मे फूटनेवाली पहली आभामयी किरणे और नक्षत्रराज ही साक्षी थे। दूर शिला-संघर्षिणी नदी का कलकल प्रवाह हो रह था तो कही अरुणोदय की लालिमा से प्रफुल्ल-हृदय कोकिल की कुहू ध्वनि सुनाई पड़ जाती थी। क्रमशः एक पहर दिन चढ़ा। वहां शांति और जीवानंद आये। कल्याणी ने शांति से कहा- "मै आप लोगो के हाथ बिना मूल्य के बिक चुकी हूं। मेरी कन्या का पता लगाकर मेरे उस उपकार को पूर्ण कीजिए।" शांति ने जीवानंद के चेहरे की तरफ देखकर कहा- "मै अब सोऊं गा। आठ पहर बीते, मैं बैठा तक नही । आखिर मैं भी पुरुष हूं!" कल्याणी जरा मुस्कुरा दी। जीवानंद ने महेन्द्र की तरफ देखकर कहा- "यह भार मेरे ऊपर रहा। आप लोग पदचिन्ह की यात्रा कीजिए- वही आपकी कन्या पहुंचा दूंगा!" जीवानंद भैरवीपुर-निवासी बहिन के पास से लड़की लाने चले। पर कार्य सरल न था!
पहले तो निमाई बात ही खा गई। इधर-उधर ताका, फिर एक-बारगी उसका मुंह फूलकर कुप्पा हो गया! इसके बाद वह रो पड़ी, बोली-“लड़की न दूंगी।' निमाई अपनी उल्टी हथेलियो से आंसू पोछने लगी। जीवानंद ने कहा- “अरे बहन! तू रोती क्यों? ऐसा दूर भी तो नही है- न हो, बीच-बीच में उन लोगो के घर जाकर लड़की को देख आया करना।' निमाई ने होठ फुलाकर कहा- “तो तुम लोगो की लड़की है, ले क्यो नही जाते? मुझसे क्या मतलब?" यह कहकर निमाई लड़की को उठा लाई और जीवानंद के पैर के पास पटककर वही बैठकर रोने लगी। अतः जीवानंद और कोई फुसलाने की राह न देखकर इधर-उधर की बाते करने लगे। लेकिन निमाई का क्रोध न गया। निमाई उठकर सुकुमारी के पहनने के कपड़े, उसके खेलने के खिलौने- बोझ के बोझ लाकर जीवानंद के सामने पटकने लगी। सुकुमारी स्वयं उन सबको बटोरने लगी। उसने निमाई से पूंछा- “क्यो मां ! मैं कहां जाऊंगी?" अब निमाई सह न सकी। उसने सुकुमारी को गोद मे उठा लिया ओर चली गयी।द्मद्मद्म पदचिन्ह के नये दुर्ग मे आज बड़े सुख से महेन्द्र, कल्याणी, जीवानंद, शांति निमाई के पति और सुकुमारी – सब एकत्र है। सब आज सुख में विभोर है-आनंदमग्न है। शांति जिस रात कल्याणी को ले आयी, उसी रात उसने कह दिया था कि वह अपने पति महेन्द्र से यह न कहे, कि नीवनानंद जीवानंद की पी है। एक दिन कल्याणी ने उसे अंतःपुर मे बुला भेजा! नवीनानंद अतःपुर मे घुस गया। उसने प्रहरियो की एक न सुनी। शांति ने कल्याणी के पास आकर पूछा-“क्यो बुलाया है?" कल्याणी -“पुरुष-वेश मे कितने दिनो तक रहेगी? न मुलाकात हो पाती है, न बाते होती है। मेरे पति के सामने तुम्हे प्रकट होना पड़ेगा।" नवीनानंद बड़ी चिन्ता मे डूब गये- कुछ देर तक बोले ही नही। अन्त मे बोले-“इनमे अनेक विघ्न है, कल्याणी !“ दोनो मे इसी तरह बाते होने लगी। इधर जो प्रहरी नवीनानंद को जोर देकर अन्तःपुर मे जाने से मना कर रहे थे, उन्होने महेन्द्र से जाकर कहा कि नवीनानंद जबरदस्ती, मना करने पर भी अन्दर चले गये हैं। कौतूहलवश महेन्द्र भी अन्तःपुर मे गये। महेन्द्र ने सीधे कल्याणी के कमरे मे जाकर देखा कि नवीनानंद कमरे मे खड़े हैं और कल्याणी उनके शरीर के बाघम्बर की गांठ खोल रही है। महेन्द्र बड़े अचम्भे मे आए- बहुत ही नाराज हुए। नवीनानंद ने उन्हे देख हंसकर कहा- “क्यो, गोस्वामी जी! सन्तान पर अविश्वास? “ महेन्द्र ने पूछा- “क्या भवानंद विश्वासी थे?" नवीनानंद ने आंखे दिखाकर कहा-“कल्याणी क्या भवानंद के शरीर पर हाथ रखकर बाघ की खाल खोलती थी?" यह कहते हुए शांति ने कल्याणी का हाथ दबाकर पकड़ लिया बाघम्बर खोलने न दिया। महेन्द्र -“तो इससे क्या हुआ?" नवीनानंद-“मुझ पर अविश्वास कर सकते है लेकिन कल्याणी पर कैसे अविश्वास कर सकते है?" अब महेन्द्र अप्रतिभ हुए बोले- “कहां, मै अविश्वास कब करता हूं?" नवीनानंद -“नही तो मेरे पीछे अंतःपुर मे क्यो आ उपस्थित हुए?" महेन्द्र - “कल्याणी से कुछ बाते करनी थी, इसलिए आया हूं।" नवीनानंद -“तो इस समय जाइए! कल्याणी के साथ मुझे भी कुछ बाते करनी है। आप चले जाइए, मै पहले बात करूंगा। आपका तो घर है, आप जब चाहे आकर बात कर सकते है। मैं तो बड़े कष्ट से आ पाया हूं।"
महेन्द्र बेवकूफ बन गये। वे कुछ भी समझा न पाते थे- यह सब बात तो अपराधियो जैसी नही है। कल्याणी का भाव भी विचित्र है। वह भी तो अविश्वासिनी की तरह भागी नही, न डरी, न लज्जित ही हुई, वर्न् मृदु भाव से मुस्करा रही है। वही कल्याणी, जिसने पेड़ के नीचे सहज ही विष खा लिया- वह क्या अपराधिनी हो सकती है?.... महेन्द्र के मन मे यही तर्क-वितर्क हो रहा था। इसी समय शांति ने महेन्द्र की यह दुरवस्था देख, कुछ मुस्कराकर कल्याणी की तरफ एक विलोल कटाक्षपात किया। सहसा अंधकार मिट गया- भला ऐसा कटाक्षपात भी कभी पुरुष कर सकते है। समझ गए कि नवीनानंद कोई स्त्री है। फिर भी शक था। उन्होने साहस बटोरा और आगे बढ़कर एक झटके मे नवीनानंद की दाढ़ी खींच ली- दाढ़ी-मूंछ हाथ मे आ गई। इसी समय अवसर पाकर कल्याणी ने बाघम्बर की गांठ खोल दी पकड़ी जाकर शांति शरमा कर सिर नीचा कर खड़ी रह गई। अब महेन्द्र ने शांति से पूछा- ‘‘तुम कौन हो?‘‘ शांति- ‘‘ श्रीमान नवीनानंद गोस्वामी?‘‘ महेन्द्र- ‘‘ वह तो ठगी थी, तुम तो स्त्री हो!‘‘ शांति- ‘‘ यह तो देखते ही हैं आप!‘‘ महेन्द्र- ‘‘ तब एक बात पूछूं- तुम स्त्री होकर जीवानंद के साथ हर समय क्यो रहती थी?‘‘ शांति- ‘‘ यह बात आप को न बताऊंगी।‘‘ महेन्द्र-‘‘तुम स्त्री हो, यह जीवानंद स्वमी जानते है?‘‘ शांति- ‘‘ जानते है।‘‘ यह सुनकर विशुद्धात्मा महेन्द्र बहुत दुखी हुए। यह देखकर अब कल्याणी चुप न रह सकी, बोली- ‘‘ये जीवानंद स्वामी की धर्मपी शांति देवी है?‘‘ एक क्षण के लिए महेन्द्र का चेहरा प्रसन्न हो उठा। इसके बाद ही उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया। कल्याणी समझ गई, ‘‘ये पूर्ण ब्रह्मचारिणी है।‘‘ उत्तर बंगाल मुसलमानो के हाथ से निकल गया- यह बात मुसलमान मानते नही, दलील पेश करते है कि बहुतेरे डाकुओ का उपद्रव है- शासन तो हमारा ही हैं। इस तरह कितने वर्ष बीत जाते नही कहा जा सकता। लेकिन भगवान की इच्छा से वारेन हेर्टिंग्स इसी समय कलकत्ते मे गवर्नर- जनरल होकर आए। वारेन हेर्टिंग्स मन ही मन सतोष करने वाले आदमी न थे, अन्यथा भारत मे अंग्रेजी साम्राज्य स्थापित कर न पाते। उन्होने तुरंत संतानो के दमनार्थ मेजर एडवर्ड नाम के एक दूसरे सेनापति को खड़ा कर दिया। मेजर ताजा गोरी फौज लेकर तैयार हो गए। एडवर्ड ने देखा कि यह यूरोपीय युद्ध नही है। शत्रुओ की सेना नही, नगर नही, राजधानी नही, दुर्ग नही, फिर भी सब उनके अधीन है। जिस दिन जहां ब्रिटिश सेना का पड़ाव पड़ा, उस रोज वहां ब्रिटिश अधिकार रहा, दूसरे दिन शिविर टूटते ही फिर ‘वन्देमातरम’ की ध्वनि गूंजने लगी। साहब सर पटककर रह गये, पर यह पता न लगा कि एक क्षण मे कहां से टिड्डियो की तरह विद्रोही सेना इकट्ठी हो जाती, ब्रिटिश अधिकृत गांवो को फूंक देती है और रक्षको की छोटी टुकड़ियो का सफाया करने के बाद फिर गायब हो जाती है? बड़ी खोज के बाद उन्हे मालूम हुआ कि पदचिन्ह मे सन्तानो ने दुर्ग -निर्माण कर रखा है उसी दुर्ग पर अधिकार करना युक्तिसंगत समझा। वह खुफियो द्वारा यह पता लगाने लगा कि पदचिन्ह मे कितनी सन्तान-सेना रहती है। उसे जो समाचार मिला, उससे उस समय उसने दुर्ग पर आक्रमण करना उचित समझा। मन-ही-मन उसने एक अपूर्व कौशल की रचना की।
माघी पूर्णिमा सामने उपस्थित थी। उनके शिविर के निकट ही नदी तट पर बहुत बड़ा मेला लगेगा। इस बार मेले की बड़ी तैयारी है। मेले मे सहज ही कोई एक लाख आदमी एकत्र होते हैं। इस बार वैष्णव राजा हुए हैं- शासक हुए हैं, अतः वैष्णवो ने इस बार मेले मे आने का संकल्प कर लिया है। पदचिन्ह के रक्षक भी अवश्य ही मेले मे पहुंचेगे, इसकी कल्पना मेजर ने कर ली। उन्होने निश्चय किया कि पदचिन्ह पर उसी समय आक्रमण कर अधिकार करना चाहिए। यह सोचकर मेजर सने अफवाह उड़ा दी कि वे मेले पर आक्रमण करेगे, उसी दिन वहां तमाम वैष्णव सन्तान इकट्ठे रहेगे, अतः एक बार मे ही उनका समूल विध्वंस होगा- वे वैष्णवो का मेला होने न देगे। यह खबर गांव-गांव मे प्रचारित की गयी। अतः स्वभावतः जो संतान जहां था, वह वही से अस्त्र ग्रहण कर मेले की रक्षा के लिए चल पड़ा। सभी संतानें माघी पूर्णिमा के मेले वाले नदी-तट पर आकर सम्मिलित होने लगे। मेजर साहब ने जो जाल फेका था, वह सही होने लगा। अंगरेजो के सौभाग्य से महेन्द्र ने भी उस जाल मे पांव डाल दिया। महेन्द्र ने पदचिन्ह मे थोड़ी सी सेना छोड़कर शेष सारी सेना के साथ मेले के लिए प्रयाण किया। यह सब होने के पहले ही जीवानंद और शांति पदचिन्ह से बाहर निकल गये थे। उस समय तक युद्ध की कोई बात नही थी, अतः युद्ध की तरफ उनका कोई ध्यान भी न था। माघी पूर्णिमा के दिन पवित्र जल मे प्राण- विसर्जन कर वे लोग अपना प्रायश्चित करेगे, यह पहले से निश्चित हो चुका था। राह मे जाते-जाते उन्होने सुना कि मेले मे समस्त संतानो पर अंगरेजो का आक्रमण होगा तथा भयानक युद्ध होगा। इस पर जीवानंद ने कहा- ‘‘तब चलो, युद्ध मे ही प्राण-विसर्जन करेगे।‘‘ वे लोग जल्दी-जल्दी चले। एक जगह रास्ता टीले के ऊपर से गया था। टीले पर चढ़कर वीर-दम्पति ने देखा कि नीचे थोड़ी दूर पर अंगरेजो का शिविर पड़ा हुआ है। शांति ने कहा- ‘‘मरने की बात इस समय ताक पर रखो, बोली - वन्देमातरम!‘‘ इस पर दोनो ने ही चुपके-चुपके कुछ सलाह की। फिर जीवानंद पास के एक जंगल मे छिप गए। शांति एक दूसरे मे घुसकर अद्भुत काण्ड मे प्रवृत्त हुई। शांति मरने जा रही थी, लेकिन उसने मृत्यु के समय स्त्री-वेश धारण करने का निश्चय किया था। महेन्द्र ने कहा था कि उसका पुरुष वेश ठगैती है, ठगी करते हुए मरना उचित नही। अतः वह साथ मे अपना पिटारा लाई थी। उसमे उसकी पोशाक रहती थी। इस समय नवीनानंद पिटारा खोलकर अपना वेश परिवर्तन करने बैठे। चिकने बालो को पीठ पर फहराए हुए, उस पर खैंर का टीका-फटीका लगाकर नवीन लता-पुष्पो से सर ढंककर शांति खासी-वैष्णवी बन गई। सारंगी उसने हाथ मे ले ली। इस तरह का वह अंगरेज-शिविर पहुंच गई। काली मूंछोवाले सिपाही उसे देखकर पागल हो उठे। चारो तरफ से लोगो ने उसे घेरकर गवाना शुरू किया। कोई ख्याल गवाता, तो कोई टप्पा, कोई गजल। किसी ने दाल दिया, किसी ने चावल, तो किसी ने मिठाई। किसी ने पैसे दिए, तो किसी ने चवन्नी ही दे दी। इसी तरह वैष्णवी अपनी आंखे से शिविर का हाल-चाल देखती घूमने लगी। सिपाहियो ने पूछ-‘‘अब कब आओगी?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘कैसे बताऊं, मेरा घर बड़ी दूर है।‘‘ सिपाहियो ने पूछा-‘‘कितनी दूर?‘‘ वैष्णवी ने कहा-‘‘मेरा घर पदचिन्ह मे है।‘‘
एक सिपाही ने सुना था कि मेजर साहब पदचिन्ह की खबर लिया करते है, तुरंत वह वैष्णवी को मेजर साहब के शिविर मे ले गया। मेजर साहब को देखकर वैष्णवी ने मधुर कटाक्ष का बाण छोड़ा। मेजर साहब का तो सर चक्कर खा गया। वैष्णवी तुरंत खंजड़ी बजाकर गाने लगी- ‘ ‘म्लेच्छ निवहनितमे कलयसि करवालम्‘‘ साहब ने पूछा-‘‘ओ बीबी! तोमारा घड़ कहां?‘‘ बीबी बोली-‘‘मै बीबी नही हूं, वैष्णवी हूं। मेरा घर पदचिन्ह मे है।‘‘ साहब -‘‘ह्रेयर इज दैट एडसिन पेडसिन? होआं ऐ ठो घर हाय?‘‘ बैष्णवी बोली-‘‘घर? है।‘‘ साहब-‘‘घर नई-गर-गर-नई-गड़-‘‘ शांति-‘‘साहब! मै समझ गई, गढ़ कहते हो?‘‘ साहब-‘‘येस-येस, गर-गर....हाय?‘‘ शांति-‘‘गढ़ है-भारी किला है।‘‘ साहब-‘‘केहा आडमी?‘‘ शांति-‘‘गढ़ मे कितने लोग रहते है? करीब बीस-पचीस हजार।‘‘ साहब-‘‘नान्सेस- एक ठो केल्ला मे दो-चार हजर होने सकता। अबी हुई पर हाय कि सब चला गया?‘‘ शांति-‘‘वे सब मेले मे चले जाएंगे!‘‘ साहब-‘‘मेला मे टोम कब आया होआं से?‘‘ शांति-‘‘कल आए है साहब!‘‘ साहब-‘‘ओ लोग आज निकेल गिया होगा?‘‘ शांति मन-ही-मन सोच रही थी कि-‘‘तुम्हारे बाप के श्राद्ध के लिए यदि मैने भात न चढ़ाया, तो मेरी रसिकता व्यर्थ है। कितने स्यार तेरा मुंड खाएंगे, मै देखूंगी।‘‘ प्रकट रूप मे बोली-‘‘साहब! ऐसा हो सकता है, ऐसा हो सकता है। आज चला गया हो सकता है। इतनी खबर मै नही जानती। बैष्णवी हूं, मांगकर खाती हूं-गाना गाती हूं, तब आधा पेट भोजन पाती हूं। इतनी खबर मै क्या जानूं? बकते-बकते गला सूख गया- पैसा दो, मै जाऊं। और अच्छी तरह बख्शीश दो, तो परसो खबर दूं।‘‘ साहब ने झन से एक रुपया फेकते हुए कहा-‘‘परसो नही, बीबी!‘‘ शांति बोली-‘‘दुर बेटा, बैष्णवी कहो, बीबी क्या?‘‘ साहब-‘‘परसू नही, आज रात को खबर मिलने चाही।‘‘ शांति-‘‘बंदूक माथे के पास रखकर नाक मे कड़वा तेल छुड़वाकर सोओ। आज ही मै दस कोस रहा तय कर जाऊं और आज ही फिर लौट आऊं- और तुम्हे खबर दूं? घासलेटी कही के!‘‘ साहब-‘‘घासलेटी किसको बोलता?‘‘ शांति-‘‘जो भारी वीर, जेनरल होता है।‘‘ साहब-‘‘ग्रेट जेनरल हाम होने सकता। हाम-क्लाइव का माफिक। लेकिन आज ही हमको खबर मेलना चाही। सौ रूपी बख्शीश देगा।‘‘ शांति-‘‘सौ दो, हजार दो, बीस हजार दो-पर आज रात भर मे मै इतना नही चल सकती।‘‘ साहब-‘‘घोड़े पर?‘‘ शांति-‘‘घोड़ा चढ़ना जानती तो तुम्हारे तंबू मे आकर भीख मांगती?‘‘
साहब-“एक दूसरा आदमी ले जाएगा।” शांति-“गोद मे बैठाकर ले जाएगा? मुझे लज्जा नही है?” साहब-“केया मुस्किल! पान सौ रूपी देगा।” शांति-“कौन जाएगा-तुम खुद जाएगा?” इस पर एडवर्ड ने पास मे खड़े एक युवक अंग्रेज को दिखाकर कहा-“लिंडले, तुम जाओ!” लिंडले ने शांति का रूप-यौवन देखकर कहा-“बड़ी खुशी से!” इसके बाद बड़ा जानदार अरबी घोड़ा सजकर आ गया, लिंडले भी तैयार हो गया। शांति को पकड़कर वह घोड़े पर बैठने चला। शांति ने कहा-“छिः, इतने आदमियो के सामने? क्या मुझे लज्जा नही है? आगे चलो, बाहर चलकर घोड़े पर चढ़ेगे।” लिंडले घोड़े पर चढ़ गया। घोड़ा धीरे-धीरे चला, शांति पीछे-पीछे पैदल चली। इस तरह वे लोग छावनी के बाहर आए। शिविर के बाहर एकांत आने पर शांति लिंडले के पैर पर पांव रखकर एक छलांग मे पीठ पर पहुंच गई। लिंडले ने हंसकर कहा-“तुम तो पक्क घुड़सवार है!” शांति-“हम लोग ऐसे पक्के घुड़सवार है कि तुम्हारे साथ चढ़ने मे लज्जा लगती है। छीः, रकाब के सहारे तुम लोग चढ़ते हो?” मारे शान के लिंडले ने रकाब से पैर निकाल लिया। इसी समय शांति ने पीछे से लिंडले को गला पकड़ कर छक्क दिया। वह तड़ाक से घोड़े पर से गिरा। घोड़ा भी भड़क उठा। फिर क्या था! शांति ने एक एंड लगाई और घोड़ा हवा से बाते करने लगा। शांति चार वर्ष तक सन्तानो के साथ रहकर पक्की घुड़सवार हो गई थी। बिना सीखे क्या जीवानंद का साथ दे सकती थी? लिंडले का पैर टूट गया और वह कराहने लगा। शांति हवा मे उड़ती जाती थी। जिस वन मे जीवानंद छिपे हुए थे, वहां पहुंचकर शांति ने जीवानंद को सारा समाचार सुनाया। जीवानंद ने कहा-“तो मै शीघ्र जाकर महेंद्र को सतर्क करूं। तुम मेले मे जाकर सत्यानंद को खबर दो। तुम घोड़े पर जाओ, ताकि प्रभु शीघ्र समाचार पा सके।” इस तरह दोनो आदमी दो तरफ रवाना हुए। यह कहना व्यर्थ है कि शांति फिर नवीनानंद के रूप मे हो गई। एडवर्ड भी पक्क अंग्रेज जनरल था। छोटी घाटी मे उसके आदमी थे-शीघ्र ही उन्हे खबर मिली कि उस वैष्णवी ने लिंडले को घोड़े से गिराकर स्वयं रास्ता लिया। सुनते ही एडवर्ड ने हुक्म दिया-“टेट उखाड़ो-उस शैतान का पीछा करो!” खटाखट तम्बुओ के खूंटो पर हथौड़े पड़ने लगे। मेघरचित अमरावती की तरह सवार घोड़ो पर और पदातिक पैदल चलने को तैयार हो गए। हिंदू, मुसलमान, मद्रासी, गोरे, बंदूक कंधे पर लिए मच-मच चल पड़े। तापे खच्चरो द्वारा खींची जाकर घर्र-घर्र करती चल पड़ी। इधर महेंद्र संतान-सेना के साथ मेले की तरफ अग्रसर हुए। उसी दिन शाम को महेंद्र ने सोचा अंधेरा हो चला, अब शिविर डलवा देना चाहिए। उसी समय पड़ाव डाल देना ही उचित जान पड़ा। संतानो का शिविर कैसा? पेड़ के तनो से लगकर छाया मे सब चित-पट सो रहे। हरिचरणामृत पान कर डकार ली उन्होने। जो कुछ भूख बाकी थी, स्वप्न मे वैष्णवी के अधर-रस का पान कर उसे पूरा करने लगे। जहां पड़ाव पड़ा था, वहां बहुत सुंदर आम-कानन के पास ही एक बड़ा टीला था। महेंद्र ने सोचा कि इसी टीले पर यदि पड़ाव पड़े तो कितना सुखद हो! मन मे हुआ कि टीले
को देख लेना चाहिए। यह सोचकर महेंद्र घोड़े पर चढ़कर धीरे-धीरे टीले पर चढ़ने लगे। अभी तक टीले पर आधा ही चढ़े थे, कि उनकी संतान-सेना मे एक युवक वैष्णव आ पहुंचा। उसने संतानो से कहा-"चलो, टीले पर चढ़ चले।" उसके समीप जो सैनिक खड़े थे, उन्होने पूछा-"क्यो?" यह सुनकर वह योद्धा एक छोटी चट्टान पर खड़ा हो गया, उसने ललकारकर कहा-"आओ, वीरो ! आज इसी टीले पर चढ़कर चांदनी का आनंद और मधुर वन्य पुष्पो का सौरभ-पान करते हुए शत्रुओ से बदला ले....युद्ध करे।" संतानो ने देखा कि यह योद्धा और कोई नही, हमारे सेनापति जीवानंद है। इस पर सारी सेना-"हरे मुरारे!" कहती हुई गगनभेदी जयोल्लास से हुंकार करती हुई, भालो पर बोझा दे उठ खड़ी हुई और जीवानंद के पीछे-पीछे टीले पर चढ़ने लगी। एक ने सजा हुआ घोड़ा जीवानंद को लाकर दिया। दूर से महेंद्र ने जो यह देखा, तो विस्मित हुए। सोचने लगे- यह क्या? बिना कहे ये सब क्यो चले आ रहे है। यह सोचकर महेंद्र ने तुरंत घोड़े का मुंह फिराया और एंड लगाते ही धूल बादल उड़ाते हुए नीचे आए। संतान-वाहिनी के अग्रवर्ती जीवानंद को देखकर उन्होने पूछा-"यह क्या आनंद?" जीवानंद ने हंसकर उत्तर दिया-"आज बड़ा आनंद है। टीले के उस पार एडवर्ड पहुंच गए है। टीले पर जो पहले पहुंचेगा, उसी की जीत होगी।" इसके बाद जीवानंद ने संतान सेना से कहा-"पहचानते हो? मैं जीवानंद हूं। मैने सहस्र-सहस्र शत्रुओ का वध किया है।" तुमुल निनाद से दिगन्त कांप उठा। सैनिको ने एक स्वर से कहा-"पहचानते है, हम अपने सेनापति को पहचानते है।" जीवानंद-"बोलो, हरे मुरारे!" जंगल का कोना-कोना कांप उठा, प्रतिध्वनित हुआ-"हरे मुरारे" जीवानंद-"वीरो ! टीले के उस पार शत्रु है। आज ही इस स्तूप के ऊपर, विमल चांदनी मे संतानो का महार ण होगा। जल्दी चढ़ो- जो पहले चढ़ेगा, उसी की जीत होगी। बोलो-बन्देमातरम्" फिर प्रतिध्वनि हुई-"वन्देमातरम्-" धीरे-धीरे संतान-सेना पर्वत शिखर पर चढ़ने लगी। किंतु उन लोगो ने सहसा देखा कि महेंद्र बड़ी ही तेजी से उतरे चले आ रहे हैं। उतरते हुए महेंद्र ने महानिदान किया। देखते- देखते पर्वत-शिखर पर नीलाकाश मे अंग्रेजो की तोपे आ लगी। उच्च स्वर में वैष्णवी सेना ने गाया- "तुमी विद्या तुमी भक्ति, तभी मां बाहुते शक्ति, त्वं हि प्राणः शरीरे!"... लेकिन इसी समय अंग्रेजो की तोपे गर्जन कर उठी- आग उगलने लगी, उस महानिनाद मे गीत की आवाज गायब हो गई। बार-बार 'गुड़म-गुड़म' करती हुई अंग्रेजो की तोपे गर्जन पर संतान-सेना का नाश करने लगी। खेत मे जैसे फसल काटी जाती है, उसी तरह संतान-सेना कटने लगी। यह ऊपर की भयानक मार संतान-सेना न सह सकी, तुरंत भाग खड़ी हुई- जिसे जिधर राह मिली, वह उधर ही भागा। इस पर "हुर्र, हुर्र" करती हुई ब्रिटिश वाहिनी संतानो का समूल नाश करने के लिए उतरने लगी। संगीने चढ़कर, पर्वत से गिरनेवाली भयंकर शिला की तरह, शिक्षित गोरी फौज संतानो को खदेड़ती हुई तीव्र वेग से उतरने लगी। जीवानंद ने महेंद्र को सामने देखकर कहा-"बस आज अंतिम दिन है। आओ यही मरे।"