भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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कहकर पुकारा है। तुम माता होकर हम संतानो का कार्य सिद्ध करो। जिससे हमारा कार्योद्धार हो वही करो- जीवानन्द की प्राण-रक्षा करना, अपनी रक्षा करना ! यही कहकर सत्यानन्द-हरे मुरारे, मधुकैटभारे ? गाते हुए चले गये। क्रमशः सन्तान सम्प्रदाय में समाचार प्रचारित हुआ कि सत्यानन्द आ गये है और सन्तानो से कुछ कहना चाहते है। अतः उन्होने सबको बुलवाया है। यह सुनकर दल-के-दल सन्तान लोग आकर उपस्थित होने लगे। चांदनी रात मे नदी-तट पर देवदारु के वृहत् जंगल मे आम, पनस, ताड़, वट, पीपल, बेल, शाल्मली आदि पेड़ो के नीचे करीब दस सहस्र सन्तान आ उपस्थित हुए। सब आपस में सत्यानन्द के लौट आने का समाचार सुनकर महाकोलाहल करने लगे। सत्यानन्द किसलिए वहां गये थे- यह साधारण लोग जानते न थे। अफवाह थी कि वे सन्तानो की मंगलकामना से प्रेरित होकर हिमालय पर्वत पर तपस्या करने ोलगये थे। सब आपस मे कानाफूसी करने लगे- "महाराज की तपस्या सिद्ध हो गयी है- अब हम लोगो का राज्य होगा।" इस पर बड़ा कोलाहल होने लगा। कोई चीत्कार करने लगा-मारो-मारो, पापियो को मारो। कोई कहता-‘‘जय-जय ! महाराज की जय ! कोई गाने लगा- हरे मुरारे मधुकैटभारे ! किसी ने "वंदेमारम" गाना गाया। कोई कहता- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि तुच्छ बंगाली होकर भी मै रणक्षेत्र मे शरीर उत्सर्ग करूंगा।" कोई कहता-- "भाई ! ऐसा कौन दिन होगा कि अपना ही धर्म हम स्वयं भोग करेगे।" इस तरह दस सहस्र मनुष्यो के कण्ठ-स्वर से निकली गगनभेदी ध्वनि जंगल, प्रान्त, नदी, वृक्ष, पहाड़ सब कांप उठे। एकाएक शब्द हुआ- वन्देमातरम और लोगो ने देखा कि ब्रह्मचारी सत्यानन्द सन्तानो के मध्य आकर खड़े हो गये। इस समय दस सहस्र-मस्तक उसी चांदनी मे वनभूमि पर प्रणत हो गये। बहुत ही ऊंचे स्वर मे, जलद गंभीर शब्दो मे सत्यानन्द ने दोनों हाथ उठाकर कहा- "शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, वनमाली बैकुण्ठनाथ जो केशिमथन मधु-मुर-नरकमर्दन, लोक-पालक है वे तुम लोगो के बाहुओ मे बल प्रदान करे, मन मे भक्ति दे, धर्म मे शक्ति दे ! तुम सब लोग मिलकर एक बार उनका गुणगान करो।" इस पर दस सहस्र कण्ठो से एक साथ गान होने लगा। "जय जगदीश हरे। प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदं विदित विहिवमखेदम जय जगदीश हरे।" इसके उपरान्त सत्यानन्द महाराज उन लोगो को पुनः आशीर्वाद प्रदान कर बोले- "संतानो ! तुम लोगो से आज मुझे कुछ विशेष बात कहनी है। टॉमस नाम के एक विधर्मी दुराचारी ने अनेक संतानो का नाश किया है। आज रात हम लोग उसका ससैन्य वध करेगे ! जगदीश्वर की ऐसी ही आज्ञा है। तुम लोग क्या चाहते हो ?" भयानक हर्षध्वनि से जंगल विदीर्ण उठा- "अभी मारेंगे ! बताओ, चलो, उन सबको दिखा दो। मारो ! मारो ! शत्रुओं का नाश करो?" इसी तरह के शब्द दूर के पहाड़ो से टकराकर प्रतिध्वनित होने लगे। इस पर सत्यानन्द फिर कहने लगे- "उसके लिए हम हम लोगो को जरा धैर्य धारण करना पड़ेगा। शत्रुओ के पास तोप है; बिना तोप के उनके साथ युद्ध हो नही सकता। विशेषतः वे सब वीर-जाति के है। हमारे पदचिन्ह दुर्ग से 17 तोपे आ रही है। तोपो के पहुंचते ही हम लोग युद्ध आरंभ करेंगे। यह देखो, प्रभात हुआ चाहता है। ब्रह्ममुहूर्त के 4 बजते ही....लेकिन यह क्या' --