आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)
Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें“गुडुम-गुडुम-गुम! अकस्मात् चारो तरफ विशाल जंगल में तोपो की आवाज होने लगी। यह तोप अंगरेजो की थी। जाल मे पड़ी हुई मछली की तरह कप्तान टॉमस ने सन्तानो को इस जंगल मे घेरकर वध करने का उद्योग किया था। “गुड्डम गुड्डम गुम!” -- अंगरेजों की तोपे गर्जन करने लगी। वह शब्द समूचे जंगल में प्रतिध्वनित होकर सुनाई पड़ने लगा। वह ध्वनि नदी के बांध से टकराकर सुनाई पड़ी। सत्यानन्द ने तुरंत आवाज दी- “देखो, किसकी तोपे है? कई सन्तान तुरंत घोड़े पर चढ़कर देखने के लिए चल पड़े। लेकिन उन लोगो के जंगल से निकलते ही उन पर सावन की बरसात के समान गोले आकर पड़े। अश्वसहित उन सबने वही अपना प्राण त्याग किया। दूर से सत्यानन्द ने देखा, बोल - “पेड़ पर चढ़कर देखो!” उनके कहने के साथ जीवानन्द ने एक पेड़ पर ऊंचे चढ़कर बताया-“अंगरेजो की तोपे!” सत्यानन्द ने पूछा -“अश्वारोही सैन्य है या पदातिक?” जीवानन्द -“दोनो है?” सत्यानन्द - “कितने है?” जीवानन्द – “अन्दाज नही लग सकता। वे सब जंगल की आड़ से बाहर आ रहे है?” सत्यानन्द –“गोरे है या केवल देशी फौज?” जीवानन्द – “गोरे है।” अब सत्यानन्द ने कहा – “तुम पेड़ से उतर आओ।” जीवानन्द पेड़ से उतर आये। सत्यानन्द ने कहा - “तुम दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हो। देखना है, क्या कर सकते हो! जीवानन्द ! आज के सेनापति तुम हो।” जीवानन्द हर्षोत्फुल्ल होकर एक छलांग मे घोड़े पर सवार हो गये। उन्हौने एक बार नवीनानन्द की तरफ ताककर इशारे मे ही कुछ कहा-कोई उसे समझ न सका। नवीनानन्द ने भी इशारे मे ही उत्तर दिया। केवल वे दोनो ही आपस मे समझ गये कि शायद इस जीवन मे यह आखिरी मुलाकात है; पर नवीनानन्द ने दाहिनी भुजा उठाकर लोगो से कहा-“भाइयो! समय है, गाओ -- “जय जगदीश हरे!” दस सहस्र सन्तानो के मिलित कण्ठ ने आकाश, भूमि, वन-प्रांत को कंपा दिया। तोप का शब्द उस भीषण हुंकार मे डूब गया। दस सहस्र सन्तानो ने भुजा उठाकर गाया-- “जय जगदीश हरे! म्लेछ निवहनिधने कलयसि करवालम्“ इसी समय अंगरेजो की गोली-दृष्टि जंगल का भेदन करती हुई सन्तानों पर आकर पड़ने लगी। कोई गाता-गाता छिन्नमस्तक छिन्न-बाहु छिन्न-ह्रतपिण्ड होकर जमीन पर गिरने लगा। लेकिन गाना बन्द न हुआ, वे सब गाते ही रहे – “जय जगदीश हरे!” गाना समाप्त होते ही सब निस्तब्ध हो गये। वह सारा वातावरण – नदी, जंगल, पहाड़ – एकदम निस्तब्ध हो गया। केवल तोपो का गर्जन गोरो के अस्त्रो की झंकार और पद-ध्वनि दूर से सुनाई पड़ने लगी। उस निस्तब्धता को भंग करते हुए सत्यानन्द ने कहा - “भगवान तुम्हारी रक्षा करेगे। तोप कितनी दूरी पर है?” ऊपर से आवाज दी “इसी जंगल के समीप एक छोटा मठ हैं, उसी के पास।” सत्यानन्द –“तुम कौन हो?” ऊपर से आवाज आयी -“मै नवीनानन्द।”