भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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अब सत्यानन्द ने कहा - "तुम लोग दस हजार हो, तुम्हारी विजय होगी! क्या देखते हो छीन लो तोपे !' यह सुनते ही अश्वारोही जीवानन्द ने आवाज दी - "आओ भाइयो,मारो !' इस पर दस सहस्र सन्तान सेना, अश्वारोही और पदतिक, तीर की तरह धावा बोलती आगे बढ़ी। पदातिको के कन्धे पर बन्दूक, कमर मे तलवार और हाथ मे भाले थे। बहुत-से सन्तानो ने बिना युद्ध किये ही गिरकर प्राण- त्याग किया। एक ने जीवानन्द से कहा - "जीवानन्द ! अनर्थक प्राणि-हत्या से क्या फायदा है?'' जीवानन्द ने मुड़कर देखा, कहने वाले भवानन्द थे। जीवानन्द ने पूछा - "तब क्या करने को कहते हो?" भवानन्द - "वन के अन्दर रहकर वृक्षो का आश्रय लेकर अपनी प्राण-रक्षा करे। तोपो के सामने खुले मैदान मे बिना तोप की सन्तानसेना एक क्षण भी टिक न सकेगी। लेकिन जंगल मे पेड़ो की आड़ लेकर हम लोग बहुत देर तक युद्ध कर सकते है !' जीवानन्द - "तुम ठीक कहते हो ! लेकिन प्रभु की आज्ञा है कि तोप छीन जाए। अतः हम लोग तोप छीनके ही जाएंगे। " भवानन्द - "किसकी हिम्मत है कि तोप छीन सके। लेकिन यदि जाना ही है, तो तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द - "यह न होगा, भवानन्द! आज मेरे मरने का दिन है।' भवानन्द - "आज मेरे मरने का दिन है !' जीवानन्द - "मुझे प्रायश्चित करना होगा।' भवानन्द - "तुम निष्पाप हो, तुम्हे प्रायश्चित की जरूरत नही। मेरा चरित्र कलुषित है; मुझे ही मरना होगा। तुम ठहरो, मै जाता हूं।' जीवानन्द --" भवानन्द, तुमसे क्या पाप हुआ है, मै नही जानता; लेकिन तुम्हारे रहने से सन्तानो का उद्धार होगा। मै जाता हूं।' भवानन्द ने चुप होकर फिर कहा --"मरना होगा तो आज ही मरेगे, जिस दिन जरूरत होगी,उसी दिन मरेगे। मृत्यु के लिए मुझे समय-काल की जरूरत नही !' जीवानन्द - "तब आओ !' इस बात पर भवानन्द सबके आगे हुए। दल-के-दल, एक-एक-कर सन्तान गोले खाकर मरकर गिरने लगे। सन्तान-सैन्य बिखरने लगी। तीर की तरह आगे बढ़ते हुए सन्तान गोला खाकर कटे वृक्ष की तरह नीचे गिरते थे। सैकड़ो लाशे पट गयी। इसी समय भवानन्द ने चिल्लाकर कहा - "आज इस तरंग मे संतानो को कूदना है कौन आता है भाई?' इस पर सहस्र-सहस्र कण्ठो से आवाज आयी- "वन्देमातरम् !' दनादन गोले आ रहे थे। तीर गिर रहे थे, लेकिन संतान सैन्य तीर की तरह आगे बढ़ती ही जाती थी। सबका लक्ष्य तोप छीनना था। इसके बाद तो दस हजार सन्तान सैन्य 'वन्देमातरम्' गाती हुई, अपने भाले आगे कर तीर की तरह तोपों पर जा पड़ी। यद्यपि वे लोग गोले और गोलियो की बौछार से क्षत-विक्षत हो चुके थे, लेकिन पलटे नही, भागे नही घनघोर युद्ध शुरू हो गया। लेकिन इसी समय रण-कुशल टॉमस की आज्ञा से एक सेना बन्दूको पर संगीने चढ़ाकर पीछे से निकलकर संतानो के दाहिने बाजू पर गिरी। अब जीवानन्द ने कहा-" भवानन्द ! तुम्हारी ही बात ठीक थी। अब सन्तान-सैन्य को नाश करने की जरूरत नही लौटाओ इन्हे !' भवानन्द - "अब कैसे लौट सकते है? अब तो जो पीछे पलटेगा, वही मारा जाएगा।' जीवानन्द - "सामने और दाहिने से आक्रमण हो रहा है। आओ, धीरे-धीरे बाएं होकर निकल चले।' भवानन्द - "बाएं घूमकर कहां जाओगे? बाएं नदी है - वर्षा से भरी हुई नदी। इधर गोले से बचोगे, तो नदी