भारतकोश
आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

जय जगदीश हरे !‘‘ गोस्वामी विरचित स्तोत्र को जिस समय सारंगी की मधुर ध्वनि पर कोमल स्वर से शांति गाने लगी, उस समय वह स्वर-लहरी वायुमण्डल पर इस तरह तरंगित हो उठी, जिस तरह जल मे अवगाहन करने पर स्रोत वाहिनी नदी मे धार कुण्डलाकार होकर लहराने लगती है। शांति गाने लगी ! ‘ ‘निन्दसि यज्ञविधेरहः श्रुतिजात सदस्य हृदय दर्शित पशुघातम, केशव धुत बुद्ध शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ इसी समय किसी ने बाहर से गंभीर स्वर मे-मेघगर्जन के समान गंभीर स्वर मे गाया ! ‘‘म्लेच्छ निवहनिधने कलयसि करवालम् धूमकेतुमिव किमपि करालम् केशवधृत कल्कि शरीर जय जगदीश हरे !‘‘ शांति ने भक्ति-भाव से प्रणत होकर सत्यानन्द के पैरों की धूलि ग्रहण की और बोली- ‘‘प्रभो ! मेरा ऐसा कौन-सा भाग्य है कि श्री पादपद्मो का यहां दर्शन मिला। आज्ञा दीजिये, मुझे क्या करना होगा ?‘‘ यह कहकर शांति ने फिर स्वर-लहरी छेड़ी ! ‘‘भवचरणप्रणता वयमिति भावय कुरु कुशल प्रणतेषु ।‘‘ सत्यानन्द ने कहा-‘‘तुम्हे मैं पहचानता न था, बेटी ! रस्सी की मजबूती न जानकर मैने उसे खीचा था। तुम मेरी अपेक्षा ज्ञानी हो। इसका उपाय तुम्ही कहो। जीवानन्द से न कहना कि मैं सब कुछ जानता हूं। तुम्हारे प्रलोभन से वे अपनी जीवन-रक्षा कर सकेगे-इतने दिनो से कर ही रहे है ऐसा होने से मेरा कार्योद्धार हो जाएगा ।‘‘ शांति के उन विशाल लोल कटाक्षों मे निदाघ-कादम्बिनी मे विराजित बिजली के सामान घोर रोष प्रकट हुआ। उसने कहा- ‘‘यह क्या कहते है महाराज ! मैं और मेरे पति एक आत्मा है। मरना होगा तो वे मरेगे ही, इसमे मेरा नुकसान ही क्या है। मैं भी तो साथ मरूंगी ! उन्हे स्वर्ग मिलेगा तो क्या मुझे स्वर्ग न मिलेगा ?‘‘ ब्रह्मचारी ने कहा-देवी ! मैं कभी हारा न था, आज तुमसे तर्क मे हार मानता है। मां ! मैं तुम्हारा पुत्र है- संतान पर स्नेह रखो। जीवानन्द के प्राणो की रक्षा करो। इसी से मेरा कार्योद्धार होगा। बिजली हंसी। शांति ने कहा-मेरे स्वामी धर्म मेरे स्वामी के ही हाथ हैं। मैं उन्हे धर्म से विरत करनेवाली कौन हूं? इहलोक मे स्त्री का देवता पति है : किंतु परकाल मे सबका पिता धर्म होता है। मेरे समीप मेरे पति बड़े हैं उनकी अपेक्षा मेरा धर्म बड़ा है-उससे भी बढ़कर मेरे लिए पति का धर्म है। मैं अपने धर्म को जिस दिन चाहूं जलांजलि दे सकती हूं, लेकिन क्या स्वामी के धर्म को जलांजलि दे सकती हूं? महाराज ! तुम्हारी आज्ञा पर मरना होगा तो मेरे स्वामी मरेगे, मैं मना नही कर सकती। इस पर ब्रह्मचारी ने ठंडी सांस भरकर कहा-‘ ‘मां ! इस घोर व्रत मे बलिदान ही है। हम सबको बलिदान चढ़ाना पड़ेगा। मैं मरूंगा जीवानन्द, भवानन्द-सभी मरेगे, शायद तुम भी मरोगी। किन्तु देखो, कार्य पूरा करके ही मरना होगा, बिना कार्य के मरना किस काम का? मैंने केवल जन्मभूमि को ही मां माना था और किसी को भी मां नही कहा, क्योकि सुजला-सुफला माता के अतिरिक्त मेरी और कोई माता नही। अब तुम्हे भी मां