अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रव्यादा दन्दशूकाश्च कृमिकीटविहंगमाः ॥ २३ ॥ अण्डजा जन्तवश्चैव सर्वे चापि चतुष्पदाः । उन्मत्ता बधिरा मूका ये चान्ये पापरोगिणः ॥ २४ ॥ मग्नास्तमसि दुर्वृत्ताः स्वकर्मकृतलक्षणाः । अवाक्स्रोतस इत्येते मग्नास्तमसि तामसाः ॥ २५ ॥ स्थावर (वृक्ष-पर्वत आदि) जीव, पशु, वाहन, राक्षस, सर्प, कीड़े-मकोड़े, पक्षी, अण्डज प्राणी, चौपाये, पागल, बहरे, गूँगे तथा अन्य जितने पापमय रोगवाले (कोढ़ी आदि) मनुष्य हैं, वे सब तमोगुणमें डूबे हुए हैं। अपने कर्मोंके अनुसार लक्षणोंवाले ये दुराचारी जीव सदा दुःखमें निमग्न रहते हैं। उनकी चित्तवृत्तियोंका प्रवाह निम्न दशाकी ओर होता है, इसलिये उन्हें अर्वाक् स्रोता कहते हैं। वे तमोगुणमें निमग्न रहनेवाले सभी प्राणी तामसी हैं ।। २३— २५ ।। तेषामुत्कर्षमुद्रेकं वक्ष्याम्यहमतः परम् । यथा ते सुकृताँल्लोकाँल्लभन्ते पुण्यकर्मिणः ॥ २६ ॥ इसके पश्चात् मैं यह वर्णन करूँगा कि उन तामसी योनियोंमें गये हुए प्राणियोंका उत्थान और समृद्धि किस प्रकार होती है तथा वे पुण्यकर्मा होकर किस प्रकार श्रेष्ठ लोकोंको प्राप्त होते हैं ।। २६ ।। अन्यथा प्रतिपन्नास्तु विवृद्धा ये च कर्मणः । स्वकर्मनिरतानां च ब्राह्मणानां शुभैषिणाम् ॥ २७ ॥ संस्कारेणोर्ध्वमायान्ति यतमानाः सलोकताम् । स्वर्गे गच्छन्ति देवानामित्येषा वैदिकी श्रुतिः ॥ २८ ॥ जो विपरीत योनियोंको प्राप्त प्राणी हैं, उनके पापकर्मोंका भोग पूरा हो जानेपर) जब पूर्वकृत पुण्य-कर्मोंका उदय होता है, तब वे शुभकर्मोंके संस्कारोंके प्रभावसे स्वकर्मनिष्ठ कल्याणकामी ब्राह्मणोंकी समानताको प्राप्त होते हैं अर्थात् उनके कुलमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ पुनः यत्नशील होकर ऊपर उठते हैं एवं देवताओंके स्वर्गलोकमें चले जाते हैं—यह वेदकी श्रुति है ।। २७-२८ ।। अन्यथा प्रतिपन्नास्ते विबुद्धाः स्वेषु कर्मसु । पुनरावृत्तिधर्माणस्ते भवन्तीह मानुषाः ॥ २९ ॥ वे पुनरावृत्तिशील सकाम धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्य देवभावको प्राप्त हो जानेके अनन्तर जब वहाँसे दूसरी योनिमें जाते हैं तब यहाँ (मृत्युलोकमें) मनुष्य होते हैं ।। २९ ।। पापयोनिं समापन्नाश्चाण्डाला मूकचूचुकाः । वर्णान् पर्यायशश्चापि प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तरम् ॥ ३० ॥