अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउनमेंसे कोई-कोई (बचे हुए पापकर्मका फल भोगनेके लिये) पुनः पापयोनिसे युक्त चाण्डाल, गूँगे और अटककर बोलनेवाले होते हैं और प्रायः जन्म-जन्मान्तरमें उत्तरोत्तर उच्च वर्णको प्राप्त होते हैं ॥ ३० ॥ शूद्रयोनिमतिक्रम्य ये चान्ये तामसा गुणाः । स्रोतोमध्ये समागम्य वर्तन्ते तामसे गुणे ॥ ३१ ॥ कोई शूद्रयोनिसे आगे बढ़कर भी तामस गुणोंसे युक्त हो जाते हैं और उसके प्रवाहमें पड़कर तमोगुणमें ही प्रवृत्त रहते हैं ॥ ३१ ॥ अभिष्वङ्गस्तु कामेषु महामोह इति स्मृतः । ऋषयो मुनयो देवा मुह्यन्त्यत्र सुखेप्सवः ॥ ३२ ॥ यह जो भोगोंमें आसक्त हो जाना है, यही महामोह बताया गया है। इस मोहमें पड़कर भोगोंका सुख चाहनेवाले ऋषि, मुनि और देवगण भी मोहित हो जाते हैं (फिर साधारण मनुष्योंकी तो बात ही क्या है?) ॥ ३२ ॥ तमो मोहो महामोहस्तामिस्रः क्रोधसंज्ञितः । मरणं त्वन्धतामिस्रस्तामिस्रः क्रोध उच्यते ॥ ३३ ॥ तम (अविद्या), मोह (अस्मिता), महामोह (राग), क्रोध नामवाला तामिस्र और मृत्युरूप अन्धतामिस्र—यह पाँच प्रकारकी तामसी प्रकृति बतलायी गयी है। क्रोधको ही तामिस्र कहते हैं ॥ ३३ ॥ वर्णतो गुणतश्चैव योनितश्चैव तत्त्वतः । सर्वमेतत्तमो विप्राः कीर्तितं वो यथाविधि ॥ ३४ ॥ विप्रवरो! वर्ण, गुण, योनि और तत्त्वके अनुसार मैंने आपसे तमोगुणका पूरा-पूरा यथावत् वर्णन किया ॥ ३४ ॥ कोन्वेतद् बुध्यते साधु कोन्वेतत् साधु पश्यति । अतत्त्वे तत्त्वदर्शी यस्तमसस्तत्त्वलक्षणम् ॥ ३५ ॥ जो अतत्त्वमें तत्त्व-दृष्टि रखनेवाला है, ऐसा कौन-सा मनुष्य इस विषयको अच्छी तरह देख और समझ सकता है? यह विपरीत दृष्टि ही तमोगुणकी यथार्थ पहचान है ॥ ३५ ॥ तमोगुणा बहुविधाः प्रकीर्तिता यथावदुक्तं च तमः परावरम् । नरो हि यो वेद गुणानिमान् सदा स तामसैः सर्वगुणैः प्रमुच्यते ॥ ३६ ॥ इस प्रकार तमोगुणके स्वरूप और उसके कार्यभूत नाना प्रकारके गुणोंका यथावत् वर्णन किया गया तथा तमोगुणसे प्राप्त होनेवाली ऊँची-नीची योनियाँ भी बतला दी गयीं। जो मनुष्य इन गुणोंको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण तामसिक गुणोंसे सदा मुक्त रहता है ॥ ३६ ॥