भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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आयुःकीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते । शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः ॥ ६ ॥ आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते । बुद्धिव्र्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥ ७ ॥ सिद्धने कहा—काश्यप! मनुष्य इस लोकमें आयु और कीर्तिको बढ़ानेवाले जिन कर्मोंका सेवन करता है, वे शरीर-प्राप्तिमें कारण होते हैं। शरीर-ग्रहणके अनन्तर जब वे सभी कर्म अपना फल देकर क्षीण हो जाते हैं, उस समय जीवकी आयुका भी क्षय हो जाता है। उस अवस्थामें वह विपरीत कर्मोंका सेवन करने लगता है और विनाशकाल निकट आनेपर उसकी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥ ६-७ ॥ सत्त्वं बलं च कालं च विदित्वा चात्मनस्तथा । अतिवेलमुपाश्नाति स्वविरुद्धान्यनात्मवान् ॥ ८ ॥ वह अपने सत्त्व (धैर्य), बल और अनुकूल समयको जानकर भी मनपर अधिकार न होनेके कारण असमयमें तथा अपनी प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करता है ॥ ८ ॥ यदायमतिकृशानि सर्वाण्युपनिषेवते । अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते न वा भुङ्क्ते कदाचन ॥ ९ ॥ अत्यन्त हानि पहुँचानेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, उन सबका वह सेवन करता है। कभी तो बहुत अधिक खा लेता है, कभी बिलकुल ही भोजन नहीं करता है ॥ ९ ॥ दुष्टान्नामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च । गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीर्णेऽपि वा पुनः ॥ १० ॥ कभी दूषित खाद्य अन्न-पानको भी ग्रहण कर लेता है, कभी एक-दूसरेसे विरुद्ध गुणवाले पदार्थोंको एक साथ खा लेता है। किसी दिन गरिष्ठ अन्न और वह भी बहुत अधिक मात्रामें खा जाता है। कभी-कभी एक बारका खाया हुआ अन्न पचने भी नहीं पाता कि दुबारा भोजन कर लेता है ॥ १० ॥ व्यायाममतिमात्रं च व्यवायं चोपसेवते । सततं कर्मलोभाद् वा प्राप्तं वेगं विधारयेत् ॥ ११ ॥ अधिक मात्रामें व्यायाम और स्त्री-सम्भोग करता है। सदा काम करनेके लोभसे मल- मूत्रके वेगको रोके रहता है ॥ ११ ॥ रसाभियुक्तमन्नं वा दिवा स्वप्नं च सेवते । अपक्वानागते काले स्वयं दोषान् प्रकोपयेत् ॥ १२ ॥ रसीला अन्न खाता और दिनमें सोता है तथा कभी-कभी खाये हुए अन्नके पचनेके पहले असमयमें भोजन करके स्वयं ही अपने शरीरमें स्थित वात-पित्त आदि दोषोंको कुपित कर देता है ॥ १२ ॥ स्वदोषकोपनाद् रोगं लभते मरणाान्तिकम् ।