भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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सप्तदशोऽध्यायः काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन वासुदेव उवाच ततस्तस्योपसंगृह्य पादौ प्रश्नान् सुदुर्वचान् । पप्रच्छ तांश्च धर्मान् स प्राह धर्मभृतां वरः ॥ १ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ काश्यपने उन सिद्ध महात्माके दोनों पैर पकड़कर जिनका उत्तर कठिनाईसे दिया जा सके, ऐसे बहुत-से धर्मयुक्त प्रश्न पूछे ॥ १ ॥ काश्यप उवाच कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते । कथं कष्टाच्च संसारात् संसरन् परिमुच्यते ॥ २ ॥ काश्यपने पूछा—महात्मन्! यह शरीर किस प्रकार गिर जाता है? फिर दूसरा शरीर कैसे प्राप्त होता है? संसारी जीव किस तरह इस दुःखमय संसारसे मुक्त होता है? ॥ २ ॥ आत्मा च प्रकृतिं मुक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति । शरीरात्श्च निर्मुक्तः कथमन्यत् प्रपद्यते ॥ ३ ॥ जीवात्मा प्रकृति (मूल विद्या) और उससे उत्पन्न होनेवाले शरीरका कैसे त्याग करता है? और शरीरसे छूटकर दूसरेमें वह किस प्रकार प्रवेश करता है? ॥ ३ ॥ कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः । उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्यावतिष्ठते ॥ ४ ॥ मनुष्य अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल कैसे भोगता है और शरीर न रहनेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं? ॥ ४ ॥ ब्राह्मण उवाच एवं संचोदितः सिद्धः प्रश्नांस्तान् प्रत्यभाषत । आनुपूर्व्येण वार्ष्णेय तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥ ब्राह्मण कहते हैं—वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! काश्यपके इस प्रकार पूछनेपर सिद्ध महात्माने उनके प्रश्नोंका क्रमशः उत्तर देना आरम्भ किया। वह मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ ५ ॥ सिद्ध उवाच