अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः ।। ४३ ।। महाप्राज्ञ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम जिस वस्तुको पानेकी इच्छासे मेरे पास आये हो, उसके प्राप्त होनेका यह समय आ गया है ।। ४३ ।। अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः । अचिरात् तु गमिष्यामि तेनाहं त्वामचूचुदम् ।। ४४ ।। तुम्हारे आनेका उद्देश्य क्या है, इसे मैं जानता हूँ और शीघ्र ही यहाँसे चला जाऊँगा। इसीलिये मैंने स्वयं तुम्हें प्रश्न करनेके लिये प्रेरित किया है ।। ४४ ।। भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण । परिपृच्छस्व कुशलं भाषेयं यत् तवेप्सितम् ।। ४५ ।। विद्वन्! तुम्हारे उत्तम आचरणसे मुझे बड़ा संतोष है। तुम अपने कल्याणकी बात पूछो। मैं तुम्हारे अभीष्ट प्रश्नका उत्तर दूँगा ।। ४५ ।। बहु मन्ये च ते बुद्धिं भृशं सम्पूजयामि च । येनाहं भवता बुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप ।। ४६ ।। काश्यप! मैं तुम्हारी बुद्धिकी सराहना करता और उसे बहुत आदर देता हूँ। तुमने मुझे पहचान लिया है, इसीसे कहता हूँ कि बड़े बुद्धिमान् हो ।। ४६ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि षोडशोऽध्यायः ।। १६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६ ।।