अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजा और स्वजनोंकी ओरसे मुझे कई बार बड़े-बड़े कष्ट और अपमान उठाने पड़े हैं। तन और मनकी अत्यन्त भयंकर वेदनाएँ सहनी पड़ी हैं ।। ३५ ।। प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधबन्धाश्च दारुणाः । पतनं निरये चैव यातनाश्च यमक्षये ।। ३६ ।। मैंने अनेक बार घोर अपमान, प्राणदण्ड और कड़ी कैदकी सजाएँ भोगी हैं। मुझे नरकमें गिरना और यमलोकमें मिलनेवाली यातनाओंको सहना पड़ा है ।। ३६ ।। जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः । लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया ।। ३७ ।। इस लोकमें जन्म लेकर मैंने बारंबार बुढ़ापा, रोग, व्यसन और राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंके प्रचुर दुःख सदा ही भोगे हैं ।। ३७ ।। ततः कदाचिन्निर्वेदान्निराकाराश्रितेन च । लोकतन्त्रं परित्यक्तं दुःखार्तेन भृशं मया ।। ३८ ।। इस प्रकार बारंबार क्लेश उठानेसे एक दिन मेरे मनमें बड़ा खेद हुआ और मैं दुखोंसे घबराकर निराकार परमात्माकी शरण ली तथा समस्त लोकव्यवहारका परित्याग कर दिया ।। ३८ ।। लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः । ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादात्मनो मया ।। ३९ ।। इस लोकमें अनुभवके पश्चात् मैंने इस मार्गका अवलम्बन किया है और अब परमात्माकी कृपासे मुझे यह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है ।। ३९ ।। नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम् । आसिद्धेराप्रजासर्गादात्मनोऽपि गताः शुभाः ।। ४० ।। अब मैं पुनः इस संसारमें नहीं आऊँगा। जबतक यह सृष्टि कायम रहेगी और जबतक मेरी मुक्ति नहीं हो जायगी, तबतक मैं अपनी और दूसरे प्राणियोंकी शुभगतिका अवलोकन करूँगा ।। ४० ।। उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमा । इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः ।। ४१ ।। ब्रह्मणः पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशयः । नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परंतप ।। ४२ ।। द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मुझे यह उत्तम सिद्धि मिली है। इसके बाद मैं उत्तम लोकमें जाऊँगा। फिर उससे भी परम उत्कृष्ट सत्यलोकमें जा पहुँचूँगा और क्रमशः अव्यक्त ब्रह्मपद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लूँगा। इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये। काम-क्रोध आदि शत्रुओंको संताप देनेवाले काश्यप! अब मैं पुनः इस मर्त्यलोकमें नहीं आऊँगा ।। ४१-४२ ।। प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते ।