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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

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जनार्दन! अपने शिष्य काश्यपके ऊपर प्रसन्न होकर उन सिद्ध महर्षिने परासिद्धिके सम्बन्धमें विचार करके जो उपदेश किया, उसे बताता हूँ, सुनो ।। २८ ।। सिद्ध उवाच विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः । गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोके च संस्थितिम् ।। २९ ।। सिद्धने कहा—तात काश्यप! मनुष्य नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके केवल पुण्यके संयोगसे इस लोकमें उत्तम फल और देवलोकमें स्थान प्राप्त करते हैं ।। २९ ।। न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः । स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात् पुनः पुनः ।। ३० ।। जीवको कहीं भी अत्यन्त सुख नहीं मिलता। किसी भी लोकमें वह सदा नहीं रहने पाता। तपस्या आदिके द्वारा कितने ही कष्ट सहकर बड़े-से-बड़े स्थानको क्यों न प्राप्त किया जाय, वहाँसे भी बार-बार नीचे आना ही पड़ता है ।। ३० ।। अशुभा गतयः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात् । काममन्युपरीतेन तृष्णया मोहितेन च ।। ३१ ।। मैंने काम-क्रोधसे युक्त और तृष्णासे मोहित होकर अनेक बार पाप किये हैं और उनके सेवनके फलस्वरूप घोर कष्ट देनेवाली अशुभ गतियोंको भोगा है ।। ३१ ।। पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः । आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः ।। ३२ ।। बार-बार जन्म और बार-बार मृत्युका क्लेश उठाया है। तरह-तरहके आहार ग्रहण किये और अनेक स्तनोंका दूध पीया है ।। ३२ ।। मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः । सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयानघ ।। ३३ ।। अनघ! बहुत-से पिता और भाँति-भाँतिकी माताएँ देखी हैं। विचित्र-विचित्र सुख- दुःखोंका अनुभव किया है ।। प्रियैर्विवासो बहुशः संवासश्चाप्रियैः सह । धननाशश्च सम्प्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद् धनम् ।। ३४ ।। कितनी ही बार मुझसे प्रियजनोंका वियोग और अप्रिय जनोंका संयोग हुआ है। जिस धनको मैंने बहुत कष्ट सहकर कमाया था, वह मेरे देखते-देखते नष्ट हो गया है ।। ३४ ।। अवमानाः सुकष्टाश्च राजतः स्वजनात् तथा । शारीरा मानसा वापि वेदना भृशदारुणाः ।। ३५ ।।