अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तत्रिंशोऽध्यायः रजोगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल ब्रह्मोवाच रजोऽहं वः प्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तमाः । निबोधत महाभागा गुणवृत्तं च राजसम् ॥ १ ॥ ब्रह्माजीने कहा—महाभाग्यशाली श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं तुम लोगोंसे रजोगुणके स्वरूप और उसके कार्यभूत गुणोंका यथार्थ वर्णन करूँगा। ध्यान देकर सुनो ॥ १ ॥ सन्तापो रूपमायातः सुखदुःखे हिमातपौ । ऐश्वर्यं विग्रहः संधिर्हेतुवादोऽरतिः क्षमा ॥ २ ॥ बलं शौर्यं मदो रोषो व्यायामकलहावपि । ईर्ष्येप्सा पिशुनं युद्धं ममत्वं परिपालनम् ॥ ३ ॥ वधबन्धपरिक्लेशाः क्रयो विक्रय एव च । निकृन्त छिन्धि भिन्धीति परमर्मावकर्तनम् ॥ ४ ॥ उग्रं दारुणमाक्रोशः परच्छिद्रानुशासनम् । लोकचिन्तानुचिन्ता च मत्सरः परिभावनः ॥ ५ ॥ मृषा वादो मृषा दानं विकल्पः परिभाषणम् । निन्दा स्तुतिः प्रशंसा च प्रस्तावः पारधर्षणम् ॥ ६ ॥ परिचर्यानुशुश्रूषा सेवा तृष्णा व्यपाश्रयः । व्यूहो नयः प्रमादश्च परिवादः परिग्रहः ॥ ७ ॥ संताप, रूप, आयास, सुख-दुःख, सर्दी, गर्मी, ऐश्वर्य, विग्रह, सन्धि, हेतुवाद, मनका प्रसन्न न रहना, सहनशक्ति, बल, शूरता, मद, रोष, व्यायाम, कलह, ईर्ष्या, इच्छा, चुगली खाना, युद्ध करना, ममता, कुटुम्बका पालन, वध, बन्धन, क्लेश, क्रय-विक्रय, छेदन, भेदन और विदारणका प्रयत्न, दूसरोंके मर्मको विदीर्ण कर डालनेकी चेष्टा, उग्रता, निष्ठुरता, चिल्लाना, दूसरोंके छिद्र बताना, लौकिक बातोंकी चिन्ता करना, पश्चात्ताप, मत्सरता, नाना प्रकारके सांसारिक भावोंसे भावित होना, असत्य भाषण, मिथ्या दान, संशयपूर्ण विचार, तिरस्कारपूर्वक बोलना, निन्दा, स्तुति, प्रशंसा, प्रताप, बलात्कार, स्वार्थबुद्धिसे रोगीकी परिचर्या और बड़ोंकी शुश्रूषा एवं सेवावृत्ति, तृष्णा, दूसरोंके आश्रित रहना, व्यवहार- कुशलता, नीति, प्रमाद (अपव्यय), परिवाद और परिग्रह—ये सभी रजोगुणके कार्य हैं ॥ २ —७ ॥ संस्कारा ये च लोकेषु प्रवर्तन्ते पृथक्पृथक् । नृषु नारीषु भूतेषु द्रव्येषु शरणेषु च ॥ ८ ॥