अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंसारमें जो स्त्री, पुरुष, भूत, द्रव्य और गृह आदिमें पृथक्-पृथक् संस्कार होते हैं, वे भी रजोगुणकी ही प्रेरणाके फल हैं ॥ ८ ॥ संतापोऽप्रत्ययश्चैव व्रतानि नियमाश्च ये । आशीर्युक्तानि कर्माणि पौर्तानि विविधानि च ॥ ९ ॥ स्वाहाकारो नमस्कारः स्वधाकारो वषट्क्रिया । याजनाध्यापने चोभे यजनाध्ययने अपि ॥ १० ॥ दानं प्रतिग्रहश्चैव प्रायश्चित्तानि मङ्गलम् । संताप, अविश्वास, सकाम भावसे व्रत-नियमोंका पालन, काम्य कर्म, नाना प्रकारके पूर्त (वापी, कूप-तड़ाग आदि पुण्य) कर्म, स्वाहाकार, नमस्कार, स्वधाकार, वषट्कार, याजन, अध्यापन, यजन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह, प्रायश्चित्त और मंगलजनक कर्म भी राजस माने गये हैं ॥ ९-१० १/२ ॥ इदं मे स्यादिदं मे स्यात्स्नेहो गुणसमुद्भवः ॥ ११ ॥ 'मुझे यह वस्तु मिल जाय, वह मिल जाय' इस प्रकार जो विषयोंको पानेके लिये आसक्तिमूलक उत्कण्ठा होती है, उसका कारण रजोगुण ही है ॥ ११ ॥ अभिद्रोहस्तथा माया निकृतिर्मान एव च । स्तैन्यं हिंसा जुगुप्सा च परितापः प्रजागरः ॥ १२ ॥ दम्भो दर्पोऽथ रागश्च भक्तिः प्रीतिः प्रमोदनम् । द्यूतं च जनवादश्च सम्बन्धाः स्त्रीकृताश्च ये ॥ १३ ॥ नृत्यवादित्रगीतानां प्रसङ्गा ये च केचन । सर्व एते गुणा विप्रा राजसाः सम्प्रकीर्तिताः ॥ १४ ॥ विप्रगण! द्रोह, माया, शठता, मान, चोरी, हिंसा, घृणा, परिताप, जागरण, दम्भ, दर्प, राग, सकाम भक्ति, विषय-प्रेम, प्रमोद, द्यूतक्रीड़ा, लोगोंके साथ विवाद करना, स्त्रियोंके लिये सम्बन्ध बढ़ाना, नाच-बाजे और गानमें आसक्त होना—से सब राजस गुण कहे गये हैं ॥ १२—१४ ॥ भूतभव्यभविष्याणां भावानां भुवि भावनाः । त्रिवर्गनिरता नित्यं धर्मोऽर्थः काम इत्यपि ॥ १५ ॥ कामवृत्ताः प्रमोदन्ते सर्वकामसमृद्धिभिः । अर्वाक्स्रोतस इत्येते मनुष्या रजसा वृताः ॥ १६ ॥ जो इस पृथ्वीपर भूत, वर्तमान और भविष्य पदार्थोंकी चिन्ता करते हैं, धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गके सेवनमें लगे रहते हैं, मनमाना बर्ताव करते हैं और सब प्रकारके भोगोंकी समृद्धिसे आनन्द मानते हैं, वे मनुष्य रजोगुणसे आवृत हैं, उन्हें अर्वाक्स्रोता कहते हैं ॥ १५-१६ ॥ अस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जायमानाः पुनः पुनः ।