अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रेत्य भाविकमीहन्ते ऐहलौकिकमेव च । ददति प्रतिगृह्णन्ति तर्पयन्त्यथ जुह्वति ॥ १७ ॥ ऐसे लोग इस लोकमें बार-बार जन्म लेकर विषयजनित आनन्दमें मग्न रहते हैं और इहलोक तथा परलोकमें सुख पानेका प्रयत्न किया करते हैं। अतः वे सकाम भावसे दान देते हैं, प्रतिग्रह लेते हैं तथा तर्पण और यज्ञ करते हैं ॥ १७ ॥ रजोगुणा वो बहुधानुकीर्तिता यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरोऽपि यो वेद गुणानिमान् सदा स राजसैः सर्वगुणैर्विमुच्यते ॥ १८ ॥ मुनिवरो! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे नाना प्रकारके राजस गुणों और तदनुकूल बर्तावोंका यथावत् वर्णन किया। जो मनुष्य इन गुणोंको जानता है, वह सदा इन समस्त राजस गुणोंके बन्धनोंसे दूर रहता है ॥ १८ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीता पर्वणि गुरुशिष्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीता पर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥