अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिर्विकारः प्रलयः प्रधानं प्रभवाप्ययौ ॥ २३ ॥ अनुद्रिक्तमनूनं वाप्यकम्पमचलं ध्रुवम् । सदसच्चैव तत् सर्वमव्यक्तं त्रिगुणा स्मृतम् । ज्ञेयानि नामधेयानि नरैरध्यात्मचिन्तकैः ॥ २४ ॥ प्रकृतिको तम, व्यक्त, शिव, धाम, रज, योनि, सनातन, प्रकृति, विकार, प्रलय, प्रधान प्रभव, अप्यय, अनुद्रिक्त, अनून, अकम्प, अचल, ध्रुव, सत्, असत्, अव्यक्त और त्रिगुणात्मक कहते हैं। अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले लोगोंको इन नामोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतो यो वेद सर्वाणि गतींश्च केवलाः । विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववित् स मुच्यते सर्वगुणैर्निरामयः ॥ २५ ॥ जो मनुष्य प्रकृतिके इन नामों, सत्त्वादि गुणों और सम्पूर्ण विशुद्ध गतियोंको ठीक-ठीक जानता है, वह गुण-विभागके तत्त्वका ज्ञाता है। उसके ऊपर सांसारिक दुःखोंका प्रभाव नहीं पड़ता। वह देह-त्यागके पश्चात् सम्पूर्ण गुणोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ॥ २५ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥