भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

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चत्वारिंशोऽध्यायः महत्तत्त्वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा ब्रह्मोवाच अव्यक्तात् पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः । आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथमः सर्ग उच्यते ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—महर्षिगण! पहले अव्यक्त प्रकृतिसे महान् आत्मस्वरूप महाबुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ। यही सब गुणोंका आदि तत्त्व और प्रथम सर्ग कहा जाता है ॥ १ ॥ महानात्मा मतिर्विष्णुर्जिष्णुः शम्भुश्च वीर्यवान् । बुद्धिः प्रज्ञोपलब्धिश्च तथा ख्यातिर्धृतिः स्मृतिः ॥ २ ॥ पर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । तं जानन् ब्राह्मणो विद्वान् प्रमोहं नाधिगच्छति ॥ ३ ॥ महान् आत्मा, मति, विष्णु, जिष्णु, शम्भु, वीर्यवान्, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, ख्याति, धृति, स्मृति—इन पर्यायवाची नामोंसे महान् आत्माकी पहचान होती है। उसके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् ब्राह्मण कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ २-३ ॥ सर्वतःपाणिपादश्च सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः । सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वं व्याप्य स तिष्ठति ॥ ४ ॥ परमात्मा सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥ ४ ॥ महाप्रभावः पुरुषः सर्वस्य हृदि निश्चितः । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ५ ॥ सबके हृदयमें विराजमान परम पुरुष परमात्माका प्रभाव बहुत बड़ा है। अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ उसीके स्वरूप हैं। वह सबका शासन करनेवाला, ज्योतिर्मय और अविनाशी है ॥ ५ ॥ तत्र बुद्धिविदो लोकाः सद्भावनिरताश्च ये । ध्यायिनो नित्ययोगाश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ॥ ६ ॥ ज्ञानवन्तश्च ये केचिदलुब्धा जितमन्यवः । प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंकृताः ॥ ७ ॥ विमुक्ताः सर्व एवैते महत्तत्त्वमुपयान्त्युत । आत्मनो महतो वेद यः पुण्यां गतिमुत्तमाम् ॥ ८ ॥