भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान्, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान्, लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं। जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है ॥ ६—८ ॥ अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ॥ ९ ॥ पृथ्‍वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज—ये पाँचों महाभूत अहंकारसे उत्पन्न होते हैं ॥ ९ ॥ तेषु भूतानि युज्यन्ते महाभूतेषु पञ्चसु । ते शब्दस्पर्शरूपेषु रसगन्धक्रियासु च ॥ १० ॥ उन पाँचों महाभूतों तथा उनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे सम्पूर्ण प्राणी युक्त हैं ॥ १० ॥ महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते । सर्वप्राणभृतां धीरा महदुत्पद्यते भयम् ॥ ११ ॥ स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति । धैर्यशाली महर्षियो! जब पञ्चमहाभूतोंके विनाशके समय प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भयका सामना करना पड़ता है। किंतु सम्पूर्ण लोगोंमें जो आत्मज्ञानी धीर पुरुष है, वह उस समय भी मोहित नहीं होता ॥ ११ १/२ ॥ विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वयम्भूर्भवति प्रभुः ॥ १२ ॥ एवं हि यो वेद गुहाशयं प्रभुं परं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ १३ ॥ आदिसर्गमें सर्वसमर्थ स्वयम्भू विष्णु ही स्वयं अपनी इच्छासे प्रकट होते है। जो इस प्रकार बुद्धिरूपी गुहामें स्थित, विश्वरूप, पुराणपुरुष, हिरण्मय देव और ज्ञानियोंकी परम गतिरूप परम प्रभुको जानता है, वह बुद्धिमान् बुद्धिकी सीमाके पार पहुँच जाता है ॥ १२-१३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्र्वणि गुरुशिष्यसंवादे चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥