अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः चराचर प्राणियोंके अधिपतियोंका, धर्म आदिके लक्षणोंका और विषयोंकी अनुभूतिके साधनोंका वर्णन तथा क्षेत्रज्ञकी विलक्षणता ब्रह्मोवाच मनुष्याणां तु राजन्यः क्षत्रियो मध्यमो गुणः । कुञ्जरो वाहनानां च सिंहश्चारण्यवासिनाम् ॥ १ ॥ अविः पशूनां सर्वेषामहिस्तु बिलवासिनाम् । गवां गोवृषभश्चैव स्त्रीणां पुरुष एव च ॥ २ ॥ ब्रह्माजीने कहा—महर्षियो! मनुष्योंका राजा तो रजोगुणसे युक्त क्षत्रिय है। सवारियोंमें हाथी, बनवासियोंमें सिंह, समस्त पशुओंमें भेड़ और बिलमें रहनेवालोंमें सर्प, गौओंमें बैल एवं स्त्रियोंमें पुरुष प्रधान है ॥ १-२ ॥ न्यग्रोधो जम्बुवृक्षश्च पिप्पलः शाल्मलिस्तथा । शिंशपा मेषशृङ्गश्च तथा कीचकवेणवः ॥ ३ ॥ एते द्रुमाणां राजानो लोकेऽस्मिन् नात्र संशयः । बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषशृंग (मेढ़ासिंगी) और पोले बाँस—ये इस लोकमें वृक्षोंके राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है ॥ ३ १/२ ॥ हिमवान् पारियात्रश्च सह्यो विन्ध्यस्त्रिकूटवान् ॥ ४ ॥ श्वेतो नीलश्च भासश्च कोष्ठवांश्चैव पर्वतः । गुरुस्कन्धो महेन्द्रश्च माल्यवान् पर्वतस्तथा ॥ ५ ॥ एते पर्वतराजानो गणानां मरुतस्तथा । सूर्यो ग्रहाणामधिपो नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ॥ ६ ॥ हिमवान्, पारियात्र, सह्य, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान् पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान् पर्वत—ये सब पर्वत पर्वतोंके अधिपति हैं। गणोंके मरुद्गण, ग्रहोंके सूर्य और नक्षत्रोंके चन्द्रमा अधिपति हैं ॥ ४—६ ॥ यमः पितॄणामधिपः सरितामथ सागरः । अम्भसां वरुणो राजा मरुतामिन्द्र उच्यते ॥ ७ ॥ यमराज पितरोंके और समुद्र सरिताओंके स्वामी हैं। वरुण जलके और इन्द्र मरुद्गणोंके स्वामी कहे जाते हैं ॥ ७ ॥ अर्कोऽधिपतिरुष्णानां ज्योतिषामिन्दुरुच्यते ।