भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियोंमें स्वर्णविभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं ।। १५-१६ ।। धर्मकामाश्च राजानो ब्राह्मणा धर्मसेतवः । तस्माद् राजा द्विजातीनां प्रयतेत स्म रक्षणे ।। १७ ।। राजा धर्म-पालनके इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्मके सेतु हैं। अतः राजाको चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणोंकी रक्षाका प्रयत्न करे ।। १७ ।। राज्ञां हि विषये येषामवसीदन्ति साधवः । हीनास्ते स्वगुणैः सर्वैः प्रेत्य चोन्मार्गगामिनः ।। १८ ।। जिन राजाओंके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंको कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणोंसे हीन हो जाते और मरनेके बाद नीच गतिको प्राप्त होते हैं ।। १८ ।। राज्ञां हि विषये येषां साधवः परिरक्षिताः । तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते सुखं प्रेत्य च भुञ्जते ।। १९ ।। प्राप्नुवन्ति महात्मान इति वित्त द्विजर्षभाः । द्विजवरो! जिनके राज्यमें श्रेष्ठ पुरुषोंकी सब प्रकारसे रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोकमें आनन्दके भागी होते हैं और परलोकमें अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो ।। १९ १/२ ।। अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि नियतं धर्मलक्षणम् ।। २० ।। अहिंसा परमो धर्मो हिंसा चाधर्मलक्षणा । प्रकाशलक्षणा देवा मनुष्याः कर्मलक्षणाः ।। २१ ।। अब मैं सबके नियत धर्मके लक्षणोंका वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्मका लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओंका और यज्ञ आदि कर्म मनुष्योंका लक्षण है ।। २०-२१ ।। शब्दलक्षणमाकाशं वायुस्तु स्पर्शलक्षणः । ज्योतिषां लक्षणं रूपमापश्च रसलक्षणाः ।। २२ ।। शब्द आकाशका, वायु स्पर्शका, रूप तेजका और रस जलका लक्षण है ।। २२ ।। धारिणी सर्वभूतानां पृथिवी गन्धलक्षणा । स्वरव्यञ्जनसंस्कारा भारती शब्दलक्षणा ।। २३ ।। गन्ध सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका लक्षण है तथा स्वर-व्यंजनकी शुद्धिसे युक्त वाणीका लक्षण शब्द है ।। २३ ।। मनसो लक्षणं चिन्ता चिन्तोक्ता बुद्धिलक्षणा । मनसा चिन्तितानर्थान् बुद्ध्या चेह व्यवस्यति ।। २४ ।। बुद्धिर्हि व्यवसायेन लक्ष्यते नात्र संशयः ।