भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ब्रह्मोवाच एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि । अधीतवान् यथाशक्ति तथैव ब्रह्मचर्यवान् ॥ १ ॥ स्वधर्मनिरतो विद्वान् सर्वेन्द्रिययतो मुनिः । गुरोः प्रियहिते युक्तः सत्यधर्मपरः शुचिः ॥ २ ॥ ब्रह्माजीने कहा—महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत् आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान् बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे ॥ १-२ ॥ गुरुणा समनुज्ञातो भुञ्जीतान्नमकुत्सयन् । हविष्यभैक्ष्यभुक् चापि स्थानासनविहारवान् ॥ ३ ॥ गुरुकी आज्ञा लेकर भोजन करे। भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे। भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे। एक स्थानपर रहे। एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे ॥ ३ ॥ द्विकालमग्निं जुह्वानः शुचिर्भूत्वा समाहितः । धारयीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा ॥ ४ ॥ पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे। सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे ॥ ४ ॥ क्षौमं कार्पासिकं चापि मृगाजिनमथापि वा । सर्वं काषायरक्तं वा वासो वापि द्विजस्य ह ॥ ५ ॥ रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे। अथवा ब्राह्मणके लिये सारा वस्त्र गेरुए रंगका होना चाहिये ॥ ५ ॥ मेखला च भवेन्मौञ्जी जटी नित्योदकस्तथा । यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुब्धो नियतव्रतः ॥ ६ ॥ ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे ॥ ६ ॥ पूताभिश्च तथैवाद्भिः सदा दैवततर्पणम् । भावेन नियतः कुर्वन् ब्रह्मचारी प्रशस्यते ॥ ७ ॥