अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो ब्रह्मचारी सदा नियमपरायण होकर श्रद्धाके साथ शुद्ध जलसे नित्य देवताओंका तर्पण करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है ॥ ७ ॥ एवं युक्तो जयेल्लोकान् वानप्रस्थो जितेन्द्रियः । न संसरति जातीषु परं स्थानमाश्रितः ॥ ८ ॥ इसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले उत्तम गुणोंसे युक्त जितेन्द्रिय वानप्रस्थी पुरुष भी उत्तम लोकोंपर विजय पाता है। वह उत्तम स्थानको पाकर फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता ॥ ८ ॥ संस्कृतः सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान् । ग्रामात्रिष्क्रम्य चारण्ये मुनिः प्रव्रजितो वसेत् ॥ ९ ॥ वानप्रस्थ मुनिको सब प्रकारके संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर वनमें निवास करना चाहिये ॥ ९ ॥ चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत् । अरण्यगोचरो नित्यं न ग्रामं प्रविशेत् पुनः ॥ १० ॥ वह मृगचर्म अथवा वल्कल-वस्त्र पहने। प्रातः और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे ॥ १० ॥ अर्चयन्नतिथीन् काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम् । फलपत्रावरैर्मूलैः श्यामाकेन च वर्तयन् ॥ ११ ॥ अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे। जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा सावाँ खाकर जीवन-निर्वाह करे ॥ ११ ॥ प्रवृत्तमुदकं वायुं सर्वं वानेयमाश्रयेत् । प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रितः ॥ १२ ॥ बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे। अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमशः उपर्युक्त वस्तुओंका आहार करे ॥ १२ ॥ समूलफलभिक्षाभिरर्चेदतिथिमागतम् । यद् भक्ष्यं स्यात् ततो दद्याद् भिक्षां नित्यमतन्द्रितः ॥ १३ ॥ यदि कोई अतिथि आ जाय तो फल-मूलकी भिक्षा देकर उसका सत्कार करे। कभी आलस्य न करे। जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे ॥ १३ ॥ देवतातिथिपूर्वं च सदा प्राश्नीत वाग्यतः । अस्पर्धितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रयः ॥ १४ ॥ नित्य प्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे, उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे। मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, हलका भोजन करे, देवताओंका सहारा