अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इस प्रकार सत्त्वगुण तो व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। ब्रह्मर्षियो! इस तत्त्वको समझो। अब मैं तुमलोगोंसे आगेकी बात बताता हूँ ।। १६ ।। सहस्रेणापि दुर्मेधा न बुद्धिमधिगच्छति । चतुर्थेनाप्यथांशेन बुद्धिमान् सुखमेधते ।। १७ ।। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे हजार उपाय करनेपर भी ज्ञान नहीं होता और जो बुद्धिमान् है वह चौथाई प्रयत्नसे भी ज्ञान पाकर सुखका अनुभव करता है ।। १७ ।। एवं धर्मस्य विज्ञेयं संसाधनमुपायतः । उपायज्ञो हि मेधावी सुखमत्यन्तमश्नुते ।। १८ ।। ऐसा विचारकर किसी उपायसे धर्मके साधनका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि उपायको जाननेवाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुखका भागी होता है ।। १८ ।। यथाध्वानमपाथेयः प्रपन्नो मनुजः क्वचित् । क्लेशेन याति महता विनश्येदन्तरापि च ।। १९ ।। जैसे कोई मनुष्य यदि राह-खर्चका प्रबन्ध किये बिना ही यात्रा करता है तो उसे मार्गमें बहुत क्लेश उठाना पड़ता है अथवा वह बीचहीमें मर भी सकता है ।। १९ ।। तथा कर्मसु विज्ञेयं फलं भवति वा न वा । पुरुषस्यात्मनिःश्रेयः शुभाशुभनिदर्शनम् ।। २० ।। ऐसे ही (पूर्वजन्मोंके पुण्योंसे हीन पुरुष) योगमार्गके साधनमें लगनेपर योगसिद्धिरूप फल कठिनतासे पाता है अथवा नहीं भी पाता। पुरुषका अपना कल्याण-साधन ही उसके पूर्वजन्मके शुभाशुभ-संस्कारोंको बतानेवाला है ।। २० ।। यथा च दीर्घमध्वानं पद्भ्यामेव प्रपद्यते । अदृष्टपूर्वं सहसा तत्त्वदर्शनवर्जितः ।। २१ ।। जैसे पहले न देखे हुए दूरके रास्तेपर जब मनुष्य सहसा पैदल ही चल पड़ता है (तो वह अपने गन्तव्य स्थानपर नहीं पहुँच पाता), यही दशा तत्त्वज्ञानसे रहित अज्ञानी पुरुषकी होती है ।। २१ ।। तमेव च यथाध्वानं रथेनेहाशुगामिना । गच्छत्यश्वप्रयुक्तेन तथा बुद्धिमतां गतिः ।। २२ ।। ऊर्ध्वं पर्वतमारुह्य नान्त्ववेक्षेत भूतलम् । किंतु उसी मार्गपर घोड़े जुते हुए शीघ्रगामी रथके द्वारा यात्रा करनेवाला पुरुष जिस प्रकार शीघ्र ही अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है तथा वह ऊँचे पर्वतपर चढ़कर नीचे पृथिवी की ओर नहीं देखता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंकी गति होती है ।। २२ १/२ ।। रथेन रथिनं पश्य क्लिश्यमानमचेतनम् ।। २३ ।। यावद् रथपथस्तावद् रथेन स तु गच्छति । क्षीणे रथपदे विद्वान् रथमुत्सृज्य गच्छति ।। २४ ।।