भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 421 में से

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पृष्ठ 177

शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं ॥ १४ ॥ तपसश्चानुपूर्व्येण फलमूलाशनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धाः पश्यन्तीह समाहिताः ॥ १५ ॥ फल-मूलका भोजन करनेवाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्याके प्रभावसे ही चित्तको एकाग्र करके तीनों लोकोंकी बातोंको क्रमशः प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ॥ १५ ॥ औषधान्यगदादीनि नानाविद्याश्च सर्वशः । तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥ १६ ॥ आरोग्यकी साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है ॥ १६ ॥ यद्दुरापं दुराम्नायं दुराधर्षं दुरन्वयम् । तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ १७ ॥ जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्याके द्वारा साध्य हो जाता है; क्योंकि तपका प्रभाव दुर्लङ्घ्य है ॥ १७ ॥ सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पगः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात् ततः ॥ १८ ॥ शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करनेवाला और गुरुपत्नीकी शय्यापर सोनेवाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके ही उस महान् पापसे छुटकारा पा सकता है ॥ १८ ॥ मनुष्याः पितरो देवाः पशवो मृगपक्षिणः । यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च ॥ १९ ॥ तपःपरायणा नित्यं सिद्ध्यन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गताः ॥ २० ॥ मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिताः । अहंकारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापतेः ॥ २१ ॥ जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकारसे युक्त हो सकाम कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापतिके लोकमें जाते हैं ॥ २१ ॥ ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृताः । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम् ॥ २२ ॥

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