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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान् उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं ।। २२ ।। ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतयः सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमाः ।। २३ ।। जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं ।। २३ ।। ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृताः । अव्यक्तं प्रविशन्तीह महतां लोकमुत्तमम् ।। २४ ।। किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात् ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है ।। २४ ।। अव्यक्तादेव सम्भूतः समसंज्ञां गतः पुनः । तमोरजोभ्यां निर्मुक्तः सत्त्वमास्थाय केवलम् ।। २५ ।। फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ।। २५ ।। निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं सृजति निष्कलम् । क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद् यस्तं वेद स वेदवित् ।। २६ ।। जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ।। चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयतः । यच्चित्तं तन्मयो वश्यं गुह्यमेतत् सनातनम् ।। २७ ।। मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है—यह सनातन गोपनीय रहस्य है ।। २७ ।। अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् । निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत ।। २८ ।। अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है ।। २८ ।। द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम् ।। २९ ।। दो अक्षरका पद ‘मम’ (यह मेरा है—ऐसा भाव) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद ‘न मम’ (यह मेरा नहीं है—ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है ।। २९ ।। कर्म केचित् प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नराः ।