भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः श्रीकृष्णका अर्जुनके साथ हस्तिनापुर जाना और वहाँ सबसे मिलकर युधिष्ठिरकी आज्ञा ले सुभद्राके साथ द्वारकाको प्रस्थान करना वैशम्पायन उवाच ततोऽभ्यनोदयत् कृष्णो युज्यतामिति दारुकम् । मुहूर्तादिव चाचष्ट युक्तमित्येव दारुकः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने दारुकको आज्ञा दी कि ‘रथ जोतकर तैयार करो।’ दारुकने दो ही घड़ीमें लौटकर सूचना दी कि ‘रथ जुत गया’ ॥ १ ॥ तथैव चानुयात्रादि चोदयामास पाण्डवः । सज्जयध्वं प्रयास्यामो नगरं गजसाह्वयम् ॥ २ ॥ इसी प्रकार अर्जुनने भी अपने सेवकोंको आदेश दिया कि ‘सब लोग रथको सुसज्जित करो। अब हमें हस्तिनापुरकी यात्रा करनी है’ ॥ २ ॥ इत्युक्ताः सैनिकास्ते तु सज्जीभूता विशाम्पते । आचख्युः सज्जमित्येवं पार्थायामिततेजसे ॥ ३ ॥ प्रजानाथ! आज्ञा पाते ही सम्पूर्ण सैनिक तैयार हो गये और महान् तेजस्वी अर्जुनके पास जाकर बोले—‘रथ सुसज्जित है और यात्राकी सारी तैयारी हो गयी’ ॥ ततस्तौ रथमास्थाय प्रयातौ कृष्णपाण्डवौ । विकुर्वाणौ कथाश्चित्राः प्रीयमाणौ विशाम्पते ॥ ४ ॥ राजन्! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन रथपर बैठकर आपसमें तरह-तरहकी विचित्र बातें करते हुए प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे चल दिये ॥ ४ ॥ रथस्थं तु महातेजा वासुदेवं धनंजयः । पुनरेवाब्रवीद् वाक्यमिदं भरतसत्तम ॥ ५ ॥ भरतभूषण! रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार महातेजस्वी अर्जुन बोले— ॥ ५ ॥ त्वत्प्रसादाज्जयः प्राप्तो राज्ञा वृष्णिकुलोद्वह । नियताः शत्रवश्चापि प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ॥ ६ ॥ ‘वृष्णिकुलधुरन्धर श्रीकृष्ण! आपकी कृपासे ही राजा युधिष्ठिरको विजय प्राप्त हुई है। उनके शत्रुओंका दमन हो गया और उन्हें निष्कण्टक राज्य मिला ॥ ६ ॥