अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 184, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन । भवन्तं प्लवमासाद्य तीर्णाः स्म कुरुसागरम् ॥ ७ ॥ 'मधुसूदन! हम सभी पाण्डव आपसे सनाथ हैं, आपको ही नौकारूप पाकर हमलोग कौरवसेनारूपी समुद्रसे पार हुए हैं ॥ ७ ॥ विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसत्तम । तथा त्वामभिजानामि यथा चाहं भवन्मतः ॥ ८ ॥ विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। विश्वात्मन्! आप सम्पूर्ण विश्वमें सबसे श्रेष्ठ हैं। मैं आपको उसी तरह जानता हूँ, जिस तरह आप मुझे समझते हैं ॥ ८ ॥ त्वत्तेजः सम्भवो नित्यं भूतात्मा मधुसूदन । रतिः क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो ॥ ९ ॥ 'मधुसूदन! आपके ही तेजसे सदा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति होती है। आप ही सब प्राणियोंके आत्मा हैं। प्रभो! नाना प्रकारकी लीलाएँ आपकी रति (मनोरंजन) हैं। आकाश और पृथिवी आपकी माया है ॥ ९ ॥ त्वयि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणु जङ्गमम् । त्वं हि सर्वं विकुरुषे भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १० ॥ 'यह जो स्थावर-जंगमरूप जगत् है, सब आपहीमें प्रतिष्ठित है। आप ही चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं ॥ १० ॥ पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव मधुसूदन । हसितं तेऽमला ज्योत्स्ना ऋतवश्चेन्द्रियाणि ते ॥ ११ ॥ 'मधुसूदन! पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशकी सृष्टि भी आपने ही की है। निर्मल चाँदनी आपका हास्य है और ऋतुएँ आपकी इन्द्रियाँ हैं ॥ ११ ॥ प्राणो वायुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः । प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते ॥ १२ ॥ 'सदा चलनेवाली वायु प्राण है, क्रोध सनातन मृत्यु है। महामते! आपके प्रसादमें लक्ष्मी विराजमान हैं। आपके वक्षःस्थलमें सदा ही श्रीजीका निवास है ॥ १२ ॥ रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिर्मतिः कान्तिश्चराचरम् । त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनघ ॥ १३ ॥ 'अनघ! आपमें ही रति, तुष्टि, धृति, क्षान्ति, मति, कान्ति और चराचर जगत् है। आप ही युगान्तकालमें प्रलय कहे जाते हैं ॥ १३ ॥ सुदीर्घेणापि कालेन न ते शक्या गुणा मया । आत्मा च परमात्मा च नमस्ते नलिनेक्षण ॥ १४ ॥ 'दीर्घकालतक गणना करनेपर भी आपके गुणोंका पार पाना असम्भव है। आप ही आत्मा और परमात्मा हैं। कमलनयन! आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥