भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 421 में से

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विदितो मे सुदुर्धर्ष नारदाद् देवलात् तथा । कृष्णद्वैपायनाच्चैव तथा कुरुपितामहात् ॥ १५ ॥ 'दुर्धर्ष परमेश्वर! मैंने देवर्षि नारद, देवल, श्रीकृष्णद्वैपायन तथा पितामह भीष्मके मुखसे आपके माहात्म्यका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ १५ ॥ त्वयि सर्वं समासक्तं त्वमेवैको जनेश्वरः । यच्चानुग्रहसंयुक्तमेतदुक्तं त्वयानघ ॥ १६ ॥ एतत् सर्वमहं सम्यगाचरिष्ये जनार्दन । 'सारा जगत् आपमें ही ओत-प्रोत है। एकमात्र आप ही मनुष्योंके अधीश्वर हैं। निष्पाप जनार्दन! आपने मुझपर कृपा करके जो यह उपदेश दिया है, उसका मैं यथावत् पालन करूँगा ॥ १६ १/२ ॥ इदं चाद्भुतमत्यन्तं कृतमस्मत्प्रियेप्सया ॥ १७ ॥ यत्पापो निहतः संख्ये कौरव्यो धृतराष्ट्रजः । 'हमलोगोंका प्रिय करनेकी इच्छासे आपने यह अत्यन्त अद्भुत कार्य किया कि धृतराष्ट्रके पुत्र कुरुकुलकलंक पापी दुर्योधनको (भैया भीमके द्वारा) युद्धमें मरवा डाला ॥ १७ १/२ ॥ त्वया दग्धं हि तत्सैन्यं मया विजितमाहवे ॥ १८ ॥ भवता तत्कृतं कर्म येनावाप्तो जयो मया । 'शत्रुकी सेनाको आपने ही अपने तेजसे दग्ध कर दिया था। तभी मैंने युद्धमें उसपर विजय पायी है। आपने ही ऐसे-ऐसे उपाय किये हैं, जिनसे मुझे विजय सुलभ हुई है ॥ १८ १/२ ॥ दुर्योधनस्य संग्रामे तव बुद्धिपराक्रमैः ॥ १९ ॥ कर्णस्य च वधोपायो यथावत् सम्प्रदर्शितः । सैन्धवस्य च पापस्य भूरिश्रवस एव च ॥ २० ॥ 'संग्राममें आपकी ही बुद्धि और पराक्रमसे दुर्योधन, कर्ण, पापी सिन्धुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाके वधका उपाय मुझे यथावत् रूपसे दृष्टिगोचर हुआ ॥ १९-२० ॥ अहं च प्रीयमाणेन त्वया देवकिनन्दन । यदुक्तस्तत् करिष्यामि न हि मेऽत्र विचारणा ॥ २१ ॥ 'देवकीनन्दन! आपने प्रेमपूर्वक प्रसन्नताके साथ मुझे जो कार्य करनेके लिये कहा है, उसे अवश्य करूँगा; इसमें मुझे कुछ भी विचार नहीं करना है ॥ २१ ॥ राजानं च समासाद्य धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । चोदयिष्यामि धर्मज्ञ गमनार्थं तवानघ ॥ २२ ॥ रुचितं हि ममैतत्त्वे द्वारकागमनं प्रभो । अचिरादेव द्रष्टा त्वं मातुलं मे जनार्दन ॥ २३ ॥

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