अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका उत्तंकसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना तथा दुर्योधनके अपराधको कौरवोंके विनाशका कारण बतलाना उत्तङ्क उवाच ब्रूहि केशव तत्त्वेन त्वमध्यात्ममनिन्दितम् । श्रुत्वा श्रेयोऽभिधास्यामि शापं वा ते जनार्दन ॥ १ ॥ उत्तंकने कहा—केशव! जनार्दन! तुम यथार्थरूपसे उत्तम अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करो। उसे सुनकर मैं तुम्हारे कल्याणके लिये आशीर्वाद दूँगा अथवा शाप प्रदान करूँगा ॥ वासुदेव उवाच तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि भावान् मदाश्रयान् । तथा रुद्रान् वसून् वापि विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ २ ॥ श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मर्षे! आपको यह विदित होना चाहिये कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—ये सभी भाव मेरे ही आश्रित हैं। रुद्रों और वसुओंको भी आप मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ २ ॥ मयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चाप्यहम् । स्थित इत्यभिजानीहि मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ३ ॥ सम्पूर्ण भूत मुझमें हैं और सम्पूर्ण भूतोंमें मैं स्थित हूँ। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। इसमें आपको संशय नहीं होना चाहिये ॥ ३ ॥ तथा दैत्यगणान् सर्वान् यक्षगन्धर्वराक्षसान् । नागानप्सरसश्चैव विद्धि मत्प्रभवान् द्विज ॥ ४ ॥ विप्रवर! सम्पूर्ण दैत्यगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओंको मुझसे ही उत्पन्न जानिये ॥ ४ ॥ सदसच्चैव यत् प्राहुरव्यक्तं व्यक्तमेव च । अक्षरं च क्षरं चैव सर्वमेतन्मदात्मकम् ॥ ५ ॥ विद्वान् लोग जिसे सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त और क्षर-अक्षर कहते हैं, यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ ५ ॥ ये चाश्रमेषु वै धर्माश्चतुर्धा विदिता मुने । वैदिकानि च सर्वाणि विद्धि सर्वं मदात्मकम् ॥ ६ ॥