अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये ।। ६ ।। असच्च सदसच्चैव यद् विश्वं सदसत् परम् । मत्तः परतरं नास्ति देवदेवात् सनातनात् ।। ७ ।। असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मुझ सनातन देवाधिदेवसे पृथक् नहीं है ।। ७ ।। ओङ्कारप्रमुखान् वेदान् विद्धि मां त्वं भृगूद्वह । यूपं सोमं चरुं होमं त्रिदशाप्यायनं मखे ।। ८ ।। होतारमपि हव्यं च विद्धि मां भृगुनन्दन । अध्वर्युः कल्पकश्चापि हविः परमसंस्कृतम् ।। ९ ।। भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये। यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन-सामग्री भी मुझे ही जानिये। भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य—ये सब मेरे ही स्वरूप हैं ।। उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे । प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः ।। १० ।। स्तुवन्ति विश्वकर्माणं सततं द्विजसत्तम । मम विद्धि सुतं धर्ममग्रजं द्विजसत्तम ।। ११ ।। मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम् । बड़े-बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं। ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त-कर्ममें शान्तिपाठ तथा मंगलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना-रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है। मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है ।। १०-११ १/२ ।। तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः ।। १२ ।। बह्वीः संसरमाणो वै योनीर्वर्तामि सत्तम । धर्मसंरक्षणार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। १३ ।। तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव । भार्गव! उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप-कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ। साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन-उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ ।। १२-१३ १/२ ।। अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रोऽथ प्रभवाप्ययः ।। १४ ।।